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विवादास्पद FRDI बिल: लोगों का बढ़ा डर तो सरकार ने दी सफाई

अरुण जेटली ने कहा, अभी इस बिल पर चर्चा हो रही है अगर यह आम लोगों के हित में नहीं है तो इससे कदम वापस खींचा जा सकता है

Kumud Das Updated On: Dec 08, 2017 10:11 AM IST

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विवादास्पद FRDI बिल: लोगों का बढ़ा डर तो सरकार ने दी सफाई

15 दिसंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकार फाइनेंशियल रेजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल (FRDI) को पारित करवाने की तैयारी में है. इससे बैंक में पैसे जमा करने वालों की जान सांसत में है. उन्हें फिक्र सता रही है कि कहीं बैंकों के डूबे कर्ज की कीमत उनसे ना वसूली जाए.

FRDI बिल लोकसभा में इसी साल अगस्त में पेश किया गया था. अब पूरी संभावना है कि 15 दिसंबर से शुरू होने वाले शीतकालीन सत्र में इसे सदन पटल पर रखा जाएगा. विधेयक में डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन को समाप्त करने का प्रस्ताव किया गया है. इस कॉरपोरेशन की स्थापना 1960 के दशक में हुई थी.

बिल से क्यों बढ़ गया है डर?

कॉरपोरेशन इस बात की गारंटी देता है कि बैंक अगर दिवालिया हो जाए तो जमाकर्ता को 1 लाख रुपए तक की रकम का भुगतान किया जाएगा. आखिरी बार सरकार ने इस पर 1993 में पुनर्विचार किया था. लेकिन प्रस्तावित विधेयक में गांरटीशुदा भुगतान के मसले पर कुछ नहीं कहा गया है. इस वजह से जमाकर्ताओं को बैंक में रखी गई अपनी राशि को लेकर भय सता रहा है.

जमाकर्ताओं की चिंता बढ़ाने वाली एक बात ये भी है कि प्रस्तावित विधेयक में फाइनेंशियल रिकंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन के गठन का प्रावधान है. इस कॉरपोरेशन के जरिए वित्तीय संस्थाओं को बेल-इन ( संकटकालीन वित्तीय सहायता) देने की बात की गई है. साथ ही इसमें जमाकर्ताओं की जमाराशि की सुरक्षा की भी बात कही गई है.

लेकिन यहां मुख्य बात है कि जमाराशि की सुरक्षा की गारंटी कितनी रकम के लिए है. इस मुद्दे पर विधेयक एक बार फिर से चुप है. अगर सरकार को मौजूदा 1 लाख रुपए तक की जमाराशि के भुगतान की गारंटी पर पुनर्विचार करना है तो फिर चिंता की असली बात यहीं छुपी है. इसके अतिरिक्त प्रस्तावित विधेयक का सेक्शन 52 बैंकों के दिवालिया होने की स्थिति में जमाकर्ता को उनके जायज दावे से वंचित करता है.

क्या है विधेयक का मकसद?

सरकार ने सरकारी बैंकों के रिकैपिटलाइजेशन (पुनर्पूंजीकरण) के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपए देने का वादा किया है. दिवालिया और शोधन अक्षमता संहिता (इन्सोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) के जरिए बैंकों का उनके डूबे हुए कर्ज के एवज में हेयरकट ( संपदा के मोल में कमी) किया जाना है. जाहिर है, कोई भी आसानी से अनुमान लगा सकता है कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर बैंकों के पुनर्पूंजीकरण (रिकैपिटलाइजेशन) का भार छोटे जमाकर्ताओं के कंधे पर डालना चाहती है.

reserve bank of india

सरकार की पहलकदमी पर प्रतिक्रिया देते हुए टैक्स प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन की कार्यकारी समिति के सदस्य अजित जैन का कहना है, 'जमाकर्ता अपनी रकम रखने के लिहाज से बैंकों को सबसे सुरक्षित जगह मानते हैं. लेकिन प्रस्तावित विधेयक के कारण उनकी जमाराशि खतरे में है और यह बात सरकार के लोकतांत्रिक स्वभाव के विपरीत है.'

अजित जैन ने कहा, 'मुझे इससे नोटबंदी के दिनों की याद आ रही है जब सरकार ने पाबंदी लगा दी थी कि जमाकर्ता एक दिन में बस 10,000 रुपए ही निकाल सकते हैं. यह बात मेरी समझ से परे है कि सरकार इस विधेयक के जरिए हासिल क्या करना चाहती है.' जमाकर्ताओं की चिन्ता को भांपकर विपक्षी कांग्रेस ने विधेयक को गरीब-विरोधी करार दे दिया है.

बजट में क्या कहा था जेटली ने?

केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 2016 की फरवरी के अपने बजट भाषण में कहा था कि सरकार एक ऐसी रूपरेखा बनाना चाहती है जिससे बैंकिंग की संस्थाओं के बरताव में बेहतर अनुशासन कायम हो साथ ही सरकार सार्वजनिक धन की हिफाजत के लिए कड़े प्रावधान बनाना चाहती है.

वित्तमंत्री के ऐसा कहने के बाद 2016 के मार्च में सेबी के मौजूदा चेयरमैन अजय त्यागी की अध्यक्षता में एक समिति बनी. अजय त्यागी उस वक्त आर्थिक मामलों के विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर थे. 2016 के सितंबर महीने में इस समिति ने प्रावधानों का एक मसौदा पेश किया. लोगों को बिल के मसौदे पर राय देने के लिए 20 दिन का वक्त दिया गया. मसौदे पर जारी चर्चा की प्रक्रिया पिछले साल 14 अक्तूबर के दिन खत्म हो गई. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक को जून में पारित किया और इसे अगस्त में संसद में पेश किया गया.

चिंता में पड़े जमाकर्ताओं को दिल जीतने के लिए केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ट्वीट किया है कि प्रस्तावित एफआरडीआई बिल स्थायी समिति के पास लंबित है. उन्होंने कहा है कि सरकार का मकसद वित्तीय संस्थाओं और जमाकर्ताओं के हितों की पूरी हिफाजत करना है और सरकार अपने इस मकसद को लेकर वचनबद्ध है.

क्या होता है अब तक?

फिलहाल जारी चलन के मुताबिक अगर कोई बैंक बंद हो जाय या उसे भारी घाटा उठाना पड़े तो ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) पेशकदमी करता है. वह डूबने या भारी घाटा उठाने वाले बैंक को या तो अपने में मिला लेता है या फिर जिन बैंकों की माली हालत अच्छी है उन्हें ऐसी बैंक का अधिग्रहण करने की इजाजत दी जाती है.

अधिग्रहण करने वाला बैंक डूबे हुए बैंक की सारी लायबिलिटी का भार वहन करता है. जमाकर्ताओं की हिफाजत के लिए आरबीआई क्या कदम उठाता है. इसकी एक मिसाल है ग्लोबल ट्रस्ट बैंक (जीटीबी) के साथ 2004 में पेश आया वाकया. जीटीबी के वित्तीय संकट की हालत में आने पर आरबीआई ने इसे ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में मिला दिया था.

इस तरह के बेल-इन प्रावधान साइप्रस में 2013 में इस्तेमाल किए गए. वहां के तकरीबन 50 फीसद जमाकर्ताओं को भारी घाटा उठाना पड़ा. इन जमाकर्ताओं का बीमा नहीं था. बहरहाल, भारत के बैंकिंग इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ है.

क्या कर सकते हैं बैंक?

विधेयक को लेकर जमाकर्ताओं की बड़ी चिंता यह है कि कहीं उनकी रकम के सहारे बैंकों को उबारने का काम ना किया जाय. ऐसे में मुख्य सवाल यह उठता है कि आखिर यह होगा कैसे? बैंक जमाकर्ता के प्रति अपनी लायबिलिटी में कमी कर सकते हैं. ऐसा करने के लिए वे जमाराशि को लंबे समय तक के लिए लॉक कर सकते हैं या फिर कह सकते हैं कि जमाकर्ता अपनी जमाराशि पर जोखिम उठाने के लिए तैयार रहें.

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अगर ऐसा होता है तो इसके साथ एक अच्छी बात यह होगी कि जमाकर्ता की रकम जो अमूमन छोटी बचत के रूप में होती है, उसे एफडी में बदला जा सकता है. या फिर उसे प्रतिभूति (सिक्योरिटिज) का रूप दिया जा सकता है. और ऐसे में जमाकर्ता को अपनी जमाराशि पर ज्यादा बेहतर रिटर्न हासिल हो सकेगा.

फिलहाल बैंकों में छोटी बचत पर इंटरेस्ट रेट बहुत कम है. छोटी बचत अमूमन ‘कासा’ यानि करेंट अकाउंट और सेविंग अकाउंट की श्रेणी में आती है. बैंक करेंट अकाउंट पर सूद के नाम पर एक पाई नहीं खर्च करते. लेकिन एफडी करने वाले ग्राहकों को बैंक दोगुने से ज्यादा ब्याज देते हैं. इन सबमें बुरी बात यह है कि जमाकर्ता की जमाराशि बैंकों में फंसी रहेगी और जरूरत पर उसे निकाला नहीं जा सकेगा.

जैसा कि वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा है, बिल में अभी बहुत सुधार किए जाने हैं. बिल की फिलहाल एक संसदीय पैनल समीक्षा कर रहा है. वित्तमंत्री ने यह भी कहा कि बिल में जो प्रावधान विवादास्पद जान पड़ रहे हैं, उनपर सरकार अपने कदम वापस भी खींच सकती है.

क्या है बैंकों का कहना?

बैंकर्स इस बात को सिरे से खारिज कर रहे हैं कि बिल संसद में पारित होकर अगर अधिनियम का रूप लेता है तो बैंक जमाकर्ताओं की रकम ले लेंगे. एक सरकारी बैंक के शीर्ष स्तर के अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि कोई भी लोकतांत्रिक सरकार ऐसा नहीं करना चाहेगी. अधिकारी ने कहा, 'देश में ऐसा कभी नहीं हुआ, यहां तक कि निजी बैंकों के विलय की स्थिति में भी ऐसा नहीं हुआ.'

बैंकर के मुताबिक एफआरडीआई एक प्रगतिशील विधेयक है और इस पर अभी संसद में चर्चा होनी है. इसलिए, जमाकर्ताओं की रकम बैंकों में सुरक्षित रहेगी. यह पूछने पर कि बिल में किस मुद्दे का समाधान किया गया है, बैंकर का जवाब था, 'चिटफंड के लिए अभी हमारे पास कोई नियमन (रेग्युलेशन) नहीं हैं इसलिए मुझे लगता है कि विधेयक में इसी गंभीर मुद्दे का समाधान किया जाएगा.'

वित्तीय समावेशन की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जन-धन योजना तथा एक साल पहले हुए नोटबंदी के फैसले के कारण बड़ी संख्या में लोग बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े हैं. इस कारण, विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के लिए विधेयक के उद्देश्य स्पष्ट करना जरूरी होगा. साथ ही, जमाकर्ताओं के भय को दूर करने के लिए विधेयक के विवादित प्रावधानों को हटाना जरूरी है. सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि जमाकर्ताओं की राशि बैंकों में सुरक्षित है और उनकी मेहनत की गाढ़ी कमाई को बैंक किसी भी सूरत में दबाकर नहीं बैठ सकते.

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