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UPA सरकार में बांटे गए 'अंधाधुंध कर्ज' के कारण देश के सामने आई फंसे कर्ज की समस्या: अरुण जेटली

अरुण जेटली ने कहा, जिस तरह वृद्धि तेज करने के लिए 28-31 प्रतिशत की दर से कर्ज वितरण में वृद्धि की गई, उसके दुष्परिणाम आगे चलकर दिखने ही थे

Updated On: Aug 28, 2018 10:59 AM IST

Bhasha

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UPA सरकार में बांटे गए 'अंधाधुंध कर्ज' के कारण देश के सामने आई फंसे कर्ज की समस्या: अरुण जेटली

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को  कहा कि यूपीए के दौरान उच्च आर्थिक वृद्धि के आंकड़े और बैंकों के फंसे कर्जों (एनपीए) की बाढ़ दरअसल 2008 के वैश्विक ऋण संकट से पहले और बाद में दिए गयए अंधाधुंध कर्ज की वजह से है.

यूपीए सरकार के दौरान आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़ों को लेकर सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी दल कांग्रेस में जुबानी जंग के बीच जेटली ने कहा कि उस समय की वृद्धि अंधाधुंध ऋण के बलबूते थी. बैंकों ने उस समय अव्यावहारिक परियोजनाओं को ऋण दिया, जिसके कारण बैंकिंग प्रणाली में एनपीए 12 प्रतिशत पहुंच गया है. उन्होंने कहा कि इन्हीं वजहों से 2012-13 और 2013-14 में  आर्थिक समस्याएं खड़ी हुईं.

जेटली ने सोमवार शाम को भारतीय बैंक संघ (आईबीए) की सालाना आम बैठक को वीडिया कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि जिस तरह वृद्धि तेज करने के लिए 28-31 प्रतिशत की दर से कर्ज वितरण में वृद्धि की गई, उसके दुष्परिणाम आगे चलकर दिखने ही थे.

उन्होंने कहा, 'अगर हम हर साल बैंक ऋण को 31 या 28 प्रतिशत बढ़ाकर आर्थिक वृद्धि तेज करने का तिकड़म कर रहे हैं तो इतिहास इससे निश्चित रूप से अंधाधुंध कर्ज बांटना ही कहेगा और इसका भविष्य में बुरे परिणाम दिखना स्वाभाविक है.'

बैंको को भी ठहराया समस्या का जिम्मेदार

उन्होंने एनपीए की समस्या के लिए बैंकों को भी दोषी ठहराते हुए कहा कि उस समय कमजोर परियोजनाओं को लोन दिए गए. इसके चलते उन लोन खातों में समस्या पैदा हुई और बैंकों ने उसको नजरअंदाज किया और उन्हीं संकटग्रस्त खातों को बार-बार नए कर्ज देते रहे.

उन्होंने कहा कि उससे भी बढ़कर दूसरी गलती यह हुई कि हमने ऋणों को नया करना शुरू किया और उसका परिणाम है कि अब हमें उनकी वसूली के लिए कोई सही रास्ता तलाशना पड़ रहा है.

जेटली ने कहा कि मजबूत वृहत आर्थिक बुनियाद के बैगर लंबे समय तक उच्च आर्थिक वृद्धि दर हासिल नहीं की जा सकती.

उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था का प्रबंधन ठीक रखने के लिए राजकोषीय सूझबूझ के साथ आर्थिक वृद्धि हासिल करने का प्रयास होना चाहिए और लोन देने की दर भी तार्किक रखी जानी चाहिए.

इससे पहले 17 अगस्त को नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन की एक समिति ने वास्तविक क्षेत्र की वृद्धि दर पर जारी रिपोर्ट में आधार वर्ष 2011-12 पर आधारित नई जीडीपी श्रृंख्ला के अनुरूप तैयार की गयी पिछले वर्षों की कड़ियों में 2006-07 में आर्थिक वृद्धि 10.8 प्रतिशत दिखायी गयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार मनमोहन सिंह सरकार के दस साल के कार्यकाल में औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि 8.1 प्रतिशत रही जबकि मोदी सरकार के चार साल में यह आंकड़ा 7.3 प्रतिशत है.

इस रिपोर्ट को लेकर कांग्रेस और बीजेपी की ओर से अपने-अपने तर्क और दावे दिए जा रहे हैं. इसमें एक तर्क यह भी है यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में पूरी दुनिया की वृद्धि दर तेज थी.

इस बीच, सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि आयोग की समिति की यह रिपोर्ट आधिकारिक आंकड़ा नहीं है. अधिकृत आंकड़े बाद में जारी किए जाएंगे.

 

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