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यशवंत सिन्हा ने बवाल मचाया लेकिन बेटा भी काम ना आया!

यशवंत सिन्हा ने अपने लेख में भले ही अरुण जेटली की कमियां गिनाईं हों लेकिन उनके बेटे जयंत सिन्हा का कहना है कि आजकल अर्थव्यवस्था के आकलन का तरीका ठीक नहीं है

Updated On: Sep 28, 2017 11:41 AM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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यशवंत सिन्हा ने बवाल मचाया लेकिन बेटा भी काम ना आया!

एक दिन अचानक बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल हो चुके यशवंत सिन्हा की अंतरात्मा जागती है...और वो कहते हैं कि अगर आज वो चुप रह गए तो देश के प्रति अपना फर्ज नहीं निभा पाएंगे. एक अखबार के संपादकीय में यशवंत सिन्हा ने यह लिखकर बवाल मचा दिया कि फाइनेंस मिनिस्टर ने अर्थव्यवस्था की जो खराब हालत की है, उस पर अब खुलकर बोलना पड़ेगा. सिन्हा ने न सिर्फ अपने मन की बात कही बल्कि यह भी कह दिया कि यही बात बीजेपी के कई लोगों के मन में है, लेकिन वो खुलकर बोल नहीं पा रहे हैं.

यशवंत सिन्हा ने भले ही कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए अरुण जेटली को जिम्मेदार बताया हो लेकिन उनके बेटे जयंत सिन्हा भी इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं. पिता की तरह जयंत सिन्हा ने टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने लेख में कहा है कि 'अर्थव्यवस्था के ढांचे में बदलाव से नए भारत को बनाने की कोशिश हो रही है जिससे लोगों को अच्छी नौकरियां मिलेंगी.'

उन्होंने यह भी लिखा है कि 'हाल के दिनों में जो लेख लिखे गए हैं, उनमें तथ्यों की कमी है. एक या दो तिमाही के नतीजों से अर्थव्यस्था का आकलन ठीक नहीं. नई अर्थव्यवस्था पारदर्शी और दुनिया के साथ चलने वाली है. GST, नोटबंदी और डिजिटल पेमेंट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर है.'

ऐसा कहने वाले यशवंत सिन्हा पहले नहीं हैं. इसके पहले सुब्रमण्यम स्वामी ने भी अर्थव्यवस्था की बदहाली पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. सिन्हा और स्वामी अर्थव्यवस्था को लेकर जो बात कह रहे हैं, वो गलत नहीं है. लेकिन पूरी तरह सही हो, ऐसा भी नहीं है.

यशवंत सिन्हा का लेख पढ़ें तो साफ पता चलता है कि उन्हें अर्थव्यवस्था की बदहाली का दुख कम है. उनकी ज्यादा दिलचस्पी अरुण जेटली को नाकाबिल साबित करने पर रही. सिन्हा हों या फिर स्वामी...दोनों ने आलोचनाओं में कोई कमी नहीं छोड़ी है. लेकिन यह नहीं बताया कि अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को बढ़ाने के लिए सरकार को किस दिशा में कदम उठाना चाहिए.

कोई उपाय क्यों नहीं बताते?

यशवंत सिन्हा तो बीजेपी सरकार में वित्त मंत्री भी रह चुके हैं. ऐसे में उनसे यह अपेक्षा ज्यादा थी कि वह अरुण जेटली की रणनीतियों पर उंगली उठाने के साथ कुछ ऐसी नीतियां भी बताएं, जिससे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके. सिन्हा ने जिस तरह से लेख लिखा है, उससे उनकी नाराजगी साफ जाहिर है. लेकिन उनके तेवर से ऐसा नहीं लगता कि इसकी वजह सिर्फ अर्थव्यवस्था है.

यशवंत सिन्हा खुद भी वित्त मंत्री रहे हैं. 1998 से लेकर 2002 तक उन्होंने वित्त मंत्रालय का कामकाज संभाला था. कैबिनेट के हालिया फेरबदल से पहले उनके बेटे जयंत सिन्हा भी वित्त राज्य मंत्री थे. अब वे एविएशन के राज्य मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. वित्त मंत्रालय के मुकाबले एविएशन कम महत्वपूर्ण मंत्रालय है. तो क्या जयंत को उनके खराब परफॉर्मेंस की वजह से वित्त मंत्रालय से हटाया गया? इस बात का कोई पक्का सबूत तो नहीं है. लेकिन जैसा कि सरकार कहती रही है कि वह परफॉर्मेंस के हिसाब से काम बांटती है तो क्या जयंत के काम से अरुण जेटली खुश नहीं थे.

राजनीतिक विश्लेषक हर्षवर्धन के मुताबिक, 'मोदी सरकार से यशवंत सिन्हा की नाराजगी 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ही शुरू हो गई थी. उस वक्त बीजेपी ने टिकट बंटवारे की यह शर्त रखी थी कि हर परिवार से सिर्फ एक शख्स को टिकट दिया जाएगा.' इस शर्त की वजह से तब यशवंत सिन्हा ने अपने बेटे जयंत सिन्हा को आगे कर दिया. नतीजतन यशवंत सिन्हा सक्रिय राजनीति से दूर होकर मार्गदर्शक मंडल में शामिल हो गए. अब अर्थव्यवस्था के कमजोर आंकड़ों ने सिन्हा को सरकार और खासतौर पर अरुण जेटली पर सीधा हमले करने का मौका दे दिया. अपने लेख में यशवंत सिन्हा ने बार-बार अरुण जेटली को कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए जिम्मेदार बताया है.

फिस्कल ईयर 2017-18 की पहली तिमाही में आर्थिक ग्रोथ 5.7 फीसदी रही. नोटबंदी से पहले यह 7.1 फीसदी थी. अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा झटका नोटबंदी से लगा है. लेकिन जानकारों का कहना है कि नोटबंदी मुख्य रूप से प्रधानमंत्री का फैसला था. ब्लैकमनी पर काबू पाने के लिए सरकार ने नोटबंदी की थी. उस वक्त मार्केट से ब्लैकमनी निकलने के कारण अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो गई थी.

हालांकि पीएम के इस कदम की आलोचना करने वालों का कहना है कि नोटबंदी नाकाम हो गई. साथ ही यह भी दलील दी जाती है कि सरकार ब्लैकमनी पर लगाम लगाने में भी कामयाब नहीं हुई है. इस पर राजनीतिक विश्लेषक हर्षवर्धन का कहना है, ‘ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं. अगर नोटबंदी की वजह से अर्थव्यवस्था की रफ्तार थमी है तो इसका सीधा अर्थ है कि ब्लैकमनी पर लगाम लगा है और निवेश में कमी आई है. ऐसा नहीं हो सकता कि नोटबंदी भी नाकाम हो और ब्लैकमनी में कोई कमी भी ना आई हो और अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी कम हो गई हो.’

रिफॉर्म तो खूब हुए

अब जीएसटी की बात करें. जीएसटी लागू होने की वजह से भी अर्थव्यवस्था की रफ्तार कम हुई है, लेकिन यह काफी सालों से चली आ रही एक प्रक्रिया था. इस प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाना अरुण जेटली की कामयाबी ही मानी जाएगी. इसका अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा है लेकिन यह बात करते हुए यह भूलना नहीं चाहिए कि यह सदी का सबसे बड़ा रिफॉर्म है.

अपने लेख में यशवंत सिन्हा ने यह भी कहा है कि जेटली एकसाथ चार-चार मंत्रालय संभाल रहे थे. इनमें वित्त मंत्रालय, डिफेंस, कॉरपोरेट अफेयर्स और विनिवेश विभाग था. हालांकि नए बदलाव में डिफेंस मिनिस्ट्री अब निर्मला सीतारमण के पास है. सिन्हा ने कहा अब उनके पास तीन मंत्रालय है और इन तीनों के साथ न्याय जेटली जैसा सुपरमैन भी नहीं कर सकता.

रिफॉर्म के लिहाज से देखें तो पीएम मोदी और फाइनेंस मिनिस्टर ने एक के बाद एक कई रिफॉर्म किए हैं. इसी सरकार में ईज ऑफ डुइंग बिजनेस, जीएसटी, रेरा लॉन्च किया गया है. अगर हम एनपीए की बात करें तो मोदी सरकार को विरासत में लाखों करोड़ों का एनपीए मिला था. साल 2009 से लेकर 2013 के बीच बैंकों का एनपीए 7 से 8 लाख करोड़ रुपए था. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा टेलीकॉम और पावर सेक्टर था. मार्केट से ब्लैकमनी निकलने के कारण निवेश कम हो गया. पहले से ही एनपीए के बोझ सह रहे बैंक नए लोन देने से बचने लगे.

कहां चूकी सरकार

इन सबके बीच मोदी सरकार सिर्फ पेट्रोलियम की कीमतों पर ही चूकी है. हर्षवर्धन कहते हैं, ‘सरकार को यह समझना होगा कि आम आदमी आंकड़ों को नहीं समझता. ऐसे में केंद्र सरकार चाहे बार-बार यह दोहराए कि राज्यों के शुल्क लगाने के कारण पेट्रोल महंगा हुआ है. लेकिन आम आदमी इसके लिए केंद्र को ही जिम्मेदार ठहराएगा.’ ऐसे में यह एक मोर्चा है जहां सरकार सीधे-सीधे आम आदमी के निशाने पर आई है. लेकिन यशवंत सिन्हा के लेख से ऐसा लगता है कि जेटली अपने काम में पूरी तरह नाकाम हुए हैं.

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