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आम बजट: तमाम शोर-शराबे के बीच उत्साहित क्यों नहीं आम आदमी?

टैक्स चोरी रोकने और रोजगार बढ़ाने की बातों के बीच असली निगाह सस्ता और महंगा होने पर रहती है

Updated On: Jan 31, 2018 06:20 PM IST

Bikram Vohra

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आम बजट: तमाम शोर-शराबे के बीच उत्साहित क्यों नहीं आम आदमी?

संसद में सालाना बजट पेश होने से कई दिन पहले से ही लोग काफी उत्साहित नजर आते हैं. जब तक बजट पेश नहीं हो जाता है, तब तक हर तरफ कयासों के बाजार गर्म रहते हैं. बजट का नाम सुनते ही निष्क्रिय और शांत बैठे अर्थशास्त्री अचानक क्रियाशील और वाचाल हो उठते हैं. वित्तीय विशेषज्ञ अपने आंकड़ों, भविष्यवाणियों और पूर्वानुमानों से हमें मंत्रमुग्ध कर देते हैं.

आपकी तरह मुझे भी यह गहमागहमी और सरगर्मी बेहद पसंद है. हालांकि मुझे इस बात की ज़रा भी भनक नहीं है कि ये सब हो क्या रहा है. लेकिन, मैं एक बहुत बड़ा ढोंगी हूं. मैं बखूबी यह दिखावा कर सकता हूं कि मैं भी आपकी तरह समझदार और अक्लमंद हूं. मैं अपनी भाव-भंगिमा से ये भी जाहिर कर सकता हूं कि बजट को लेकर मैं भी आपकी तरह विचारमग्न हूं.

मैं जानता हूं कि बजट पेश करते वक्त वित्त मंत्री मध्यावधि राजकोषीय नीति (फिस्कल पॉलिसी) और राजकोषीय नीति के उपायों (फिस्कल पॉलिसी स्ट्रैटजी) का ब्यौरा देंगे. इसके अलावा वित्त मंत्री फिस्कल रिस्पॉन्सबिलटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट 2003 के तहत व्यापक आर्थिक ढांचे की रुपरेखा (मैक्रो इकनॉमिक फ्रेमवर्क) का विवरण भी देंगे. आम बजट से जुड़े यह खास और भारी-भरकम शब्द भले ही दूसरे लोगों के पल्ले पड़ते हों, लेकिन मुझे जरा भी समझ में नहीं आते हैं. मुझे तो मैक्रो स्टेटमेंट के बारे में भी रत्ती भर जानकारी नहीं है.

क्या बजट में कुछ सस्ता भी होता है

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यह सालाना कवायद मुझे तो ऊपर की ओर उठते और नीचे की ओर गिरते तीरों के निशान वाली अबूझ पहेली नजर आती है. बजट पेश होने के साथ ही तीरों के यह निशान लगभग हर अखबार, पत्रिका और टीवी स्क्रीन पर नजर आने लगते हैं. जो कि ईंधन (पेट्रोलियम पदार्थ), रसोई गैस, सिगरेट, टीवी, फ्रिज और खाने-पीने की चीजों की तस्वीरों के साथ चिपके दिखाई पड़ते हैं. आसान शब्दों में कहें तो, तीरों के निशान वाले ग्राफिक्स से मुझे मालूम पड़ता है कि इस साल कौन सी चीज़ महंगी हुई है और कौन सी चीज़ सस्ती. हालांकि बजट में अब सस्ता तो कुछ भी नहीं होता. लिहाजा तीरों वाले ग्राफिक्स देखकर मैं हर साल गहरे दुख में डूब जाता हूं, क्योंकि मुझे पता होता है कि जेब ढीली होने के साथ अब जिंदगी कुछ और मुश्किल होने वाली है.

मैं यह स्वीकार करता हूं कि बजट से संबंधित हर बात से मैं बुरी तरह से भयभीत हूं. आखिरकार, वे राजकोषीय संचालन (फिस्कल ऑपरेशंस) के लिए एक एकीकृत और अनिवार्य दृष्टिकोण को रेखांकित करते हैं. अब इससे ज्यादा महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है. मुझे नहीं पता कि पिछले साल का बजट कैसा रहा था. मुझे किसी ने नहीं बताया है कि पिछले बजट में शिक्षा के लिए जो 4000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, वे वास्तव में शिक्षा पर खर्च हुए भी या नहीं. क्या पिछले साल की गई घोषणा के मुताबिक सशस्त्र बलों के लिए 60 अरब डॉलर के हथियार खरीदे गए. पिछले बजट में किए गए कौन-कौन से वादे पूरे हुए हैं, इसका कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है. लिहाजा पिछले बजट के मुकाबले नए बजट का मूल्यांकन कर पाना संभव नहीं है. इसलिए हमें अगले 'संतुलित' बजट के साथ आंखें मूंदकर कदमताल करते हुए चलना ही होगा.

कई और भी हैं बजट

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वैसे हमारे पास चुनने के लिए कई सारे अन्य बजट भी हैं. जैसे कि राजकोषीय घाटे का बजट, जो कि मेरी मासिक स्थिति की तरह हमेशा डांवाडोल और खस्ताहाल नजर आता है. लेकिन मुझे लगता है कि सरकार के पास भी एक क्रेडिट कार्ड है, जिसमें से जरूरत से ज्यादा (सीमा से अधिक) रकम निकाली जा चुकी है. राजकोषीय या वित्तीय घाटे को पूरा करने की सरकार की इच्छा हमेशा अधूरी ही रहती है. या फिर मजबूत और बलवान बजट, जो कि फिल्म दंगल की याद दिलाए. या फिर गरीबपरस्त (गरीबोन्मुखी) बजट, जो कि गरीबों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया हो. हालांकि गरीबपरस्त बजट से असल गरीबों और वंचित लोगों का खास भला नहीं होने वाला है. वैसे एक बात तय है कि राहुल गांधी, उनकी पार्टी कांग्रेस और विपक्ष के बाकी सभी नेता अगले बजट की आलोचना करने में ज़रा भी देर नहीं लगाएंगे. पूरा विपक्ष एक सुर में बजट को गरीब विरोधी और अमीरों को फायदा पहुंचाने वाला कहकर नकार देगा.

या फिर ग्रामीण उन्मुख बजट भी हो सकता है, जिसमें कि कृषि क्षेत्र पर अनिवार्य रूप से खास ध्यान दिया गया हो. लेकिन एक बात निश्चित है कि आखिर में किसान भी ग्रामीण उन्मुख बजट से नाखुश ही नजर आएंगे. 'लोकप्रिय' (पॉपुलर) बजट भी लोगों को सहज हज़म नहीं होते हैं. वास्तव में लोकप्रिय बजट का समर्थन सिर्फ टीवी पर ही दिखाई पड़ता है. भौंडे और हास्यप्रद टीवी टॉक शो पर सरकार के प्रवक्ता लोकप्रिय बजट का गुणगान करते नजर आते हैं. वहीं लोकप्रिय (पॉपुलर) बजट और लोकलुभावन (पॉपुलिस्ट) बजट में अंतर होता है. बजट के लोकलुभावन होने की दलील सरकार विरोधी पैनलिस्ट देते हैं. मज़े की बात यह है कि लोकलुभावन बजट की दलील भी भौंडे टीवी टॉक शो में दी जाती है.

हमारे ऊपर मुद्रास्फीति का भी आरोप है, जो कि सब्सिडी बढ़ाने के लिए उतनी ही अनिवार्य है. हालांकि मुझे नहीं पता कि इसका क्या अर्थ होता है, लेकिन यह ज्ञानपूर्ण लग रहा है. उसके बाद बात आती है राजकोषीय एकीकरण (फिस्कल कंसॉलिडेशन) की, जो ऐसी धारणा बना देता है कि हमारे टूटे हुए कप की मरम्मत तो की जा सकती है, लेकिन वहां दरार (चटखी हुई जगह) हमेशा दिखाई देगी.

टैक्स के मोर्चे पर आम आदमी को कभी भी पर्याप्त राहत नहीं मिलती है. इस मुद्दे पर कोई भी कभी भी खुश नजर नहीं आता है. ऐसे में यह बजट भी पिछले कई निराशाजनक बजटों जैसा ही होगा. क्योंकि एक निराशाजनक बजट एक खास मकाम से आता है. 'अनुमान लगाने योग्य' बजट और 'विचार से परे बजट' की श्रेणी में रखकर देखा जाय तो, इस बजट में कुछ भी नया देखने को नहीं मिलेगा. यानी बजट में कुछ नया और अलग तलाशने वालों के हाथ निराशा ही लगेगी.

ऐसी आशा और आकांक्षा व्यक्त की जा रही है कि यह बजट देश की अर्थव्यवस्था को जरूरी गति प्रदान करेगा. हालांकि हम में से कोई नहीं जानता है कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए यह अतिरिक्त बल आता कहां से है. यह कहना पर्याप्त होगा कि विकास की ज्वाला फिर से प्रज्वलित होगी और आर्थिक वृद्धि नई ऊंचाई छुएगी.

वित्त मंत्रालय में परंपरागत हलवा सेरेमनी हो चुकी है. वित्त मंत्री अरुण जेटली हलवा चख चुके हैं. अब बजट पेश करते वक्त वह कुछ इस अंदाज में बोलते नजर आएंगे :

व्यापार के लिए भारत के दरवाजे अब खुल गए हैं. टैक्स चोरी करने वालों पर हमारी कार्रवाई जारी रहेगी. बुनियादी ढांचे पर निवेश से विकास को प्रोत्साहन मिलेगा. अर्थव्यवस्था अब पटरी पर लौट रही है. हम 50 लाख नौकरियां और रोजगार के नए अवसर पैदा करने का प्रयास करेंगे. कांग्रेस ने पिछले दस सालों के शासन में जो कबाड़ा किया है उसे तीन साल में दुरुस्त करना आसान नहीं है.

लेकिन वित्त मंत्री की इनमें से कोई भी बात मैं नहीं सुनूंगा. क्योंकि मेरी नजर तो 'ऊपर' और 'नीचे' होते तीरों पर रहेगी.

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