हिमाचल प्रदेश: क्यों मिलने जा रही है बीजेपी को इतनी बड़ी जीत?

मतदाता एक ना एक पार्टी को इस अंदाज में सत्ता की बागडोर थमा रहा है कि बाकी पार्टियां खेल के मैदान में नहीं बल्कि दर्शक-दीर्घा में बैठी नजर आ रही हैं

Yashwant Deshmukh

हिमाचल प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसा खास है तो जरूर है कि बात रोजमर्रा के एंटी-इनकंबेंसी की हदों में ना रहकर उससे कहीं आगे जाती लग रही है.

देश में बीते कुछ सालों से या कह लीजिए 2014 के बाद से चुनाव के नतीजों का मिजाज चौंकाने वाला रहा है. इसकी शुरुआत तेलंगाना में टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) की जीत के साथ हुई जहां कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और वह एकदम से तीसरे स्थान पर जा पहुंची. वोटों को एकतरफा उड़ा ले जाने वाला ऐसा ही चुनाव कुछ तटवर्ती राज्यों मे नजर आया जब ममता बनर्जी और जयललिता ने दोबारा सत्ता की बागडोर संभाली, साथ ही पिनराई विजयन केरल में मुख्यमंत्री बने.


नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में वोटों की धानी फसल काटी और यूपी तथा उत्तराखंड में तो उसने जीत ही हासिल नहीं की बल्कि एक तरह से पूरी बिसात पलट दी.

यह कहना तो खैर एक भूल है कि बीजेपी को हर जगह और हर वक्त एक-सी भारी-भरकम जीत हासिल हो रही है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की भारी-भरकम जीत किसी भूकंप से कम नहीं थी और बिहार के चुनावी नतीजे भी बीजेपी के लिए चौंकाने वाले रहे. साथ ही, पंजाब में कांग्रेस दस साल के बाद फिर से सत्ता पर काबिज हुई.

इनमें केरल को छोड़ दें तो किसी भी राज्य के बारे में नहीं कहा जा सकता कि वहां लोगों ने सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ (यानि एंटी-इनकंबेंसी) में मतदान किया. यह बात तो उत्तराखंड के बारे में भी नहीं कही जा सकती क्योंकि वहां बीजेपी को जो भारी जीत मिली उसकी व्याख्या एंटी-इनकंबेंसी के जुमले के सहारे नहीं की जा सकती.

2014: कुल 8 राज्य; 5 एनडीए ने जीते, 1 कांग्रेस के खाते में, 2 राज्यों में तीसरे मोर्चे की पार्टियां जीतीं

2015: कुल 2 राज्य ; दोनों में तीसरे मोर्चे की पार्टियों की जीत

2016: कुल 5 राज्य; 1 राज्य में एनडीए की जीत, 1 में कांग्रेस को कामयाबी, 3 राज्यों में तीसरे मोर्चे की पार्टियां जीती

2017: कुल 5 राज्य; 2 राज्यों में एनडीए की जीत, 3 राज्यों में कांग्रेस को कामयाबी (ध्यान दें; गोवा और मणिपुर में जीत कांग्रेस की हुई थी लेकिन कांग्रेस ने सरकार बनाने का मौका गंवाया और बागडोर बीजेपी के हाथ में आ गई)

जीत के मामले में बीजेपी-विपक्षी दलों का आंकड़ा 50:50 का

बीते तीन सालों में 20 राज्यों में चुनाव हुए हैं. इनमें 8 राज्यों में बीजेपी/एनडीए को जीत हासिल हुई है. शेष 12 राज्यों में विपक्षी दलों की जीत हुई है. अगर बीजेपी की जीत की झोली में हम गोवा और मणिपुर को भी जोड़ दें तो भी आंकड़ा 10-10 की बराबरी पर आ टिकता है. सो, प्रचलित धारणा के उलट बीते तीन सालों में भारत में हुए चुनावों का नतीजों के लिहाज से रुझान बीजेपी और विपक्षी दलों के बीच 50:50 का रहा है.

जाहिर है, जीत एकतरफा बीजेपी की नहीं हुई. लेकिन पंजाब को छोड़ दें (क्योंकि यहां कांग्रेस कैप्टन अमरिंदर सिंह की लोकप्रियता के कंधे पर सवार होकर सत्ता में लौटी. साथ ही, ऐन चुनावी वक्त में यह देखकर कि आम आदमी पार्टी खालिस्तान समर्थक कुछ तत्वों के साथ खिचड़ी पका रही है, आरएसएस के कुछ कार्यकर्ताओं ने जमीनी गणित को समझते हुए कांग्रेस की मदद की); तो बाकी राज्यों के चुनाव देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए उस अपमानजनक हार का दुख बढ़ाने वाले ही साबित हुए जिसकी शुरुआत 2014 के लोकसभा चुनावों में हुई थी.

तो फिर सवाल बनता है कि इन चुनावों में अगर कुछ खास है तो उस खास को क्या नाम दिया जाए? इस सवाल का जवाब छुपा है चुनावी जनादेश के मिजाज में, हर जगह पार्टियों को भारी-भरकम जीत हासिल हुई है. तथ्य ये है कि एक ना एक तरीके से ये जनादेश एकतरफा साबित हुए हैं. चुनावी लड़ाई में हार-जीत के बीच जितना बड़ा अंतर हमने बीते तीन सालों में देखा है वह अप्रत्याशित है. दिल्ली में 70 में से 67 सीटें आम आदमी पार्टी ने झटक लीं. उत्तरप्रदेश में बीजेपी को 300 से भी ज्यादा सीटें मिलीं.

मतदाता हर वह कुछ कर रहा है जिससे जनादेश निर्णायक साबित हो, वह किन्हीं पार्टियों के बीच अधर में डोलता हुआ ना नजर आए. बेशक जम्मू-कश्मीर मे त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी लेकिन वहां भी जम्मू में बीजेपी को एकतरफा कामयाबी मिली तो पीडीपी को घाटी में. महाराष्ट्र में जनादेश त्रिशंकु की सी स्थिति में दिखा लेकिन यह जनादेश अपने मिजाज के लिहाज से पूरा का पूरा कांग्रेस के खिलाफ था. तो, फिर कह सकते हैं कि भारतीय मतदाता जनादेश को लेकर ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट होता जा रहा है. वह अपना फैसला एक ना एक पार्टी की तरफ निर्णायक ढंग से सुना रहा है, फैसले के लिहाज से अधबीच रहने की हालत अब नहीं है.

हिमाचल प्रदेश को लेकर हमारे चुनाव-सर्वेक्षण के निष्कर्षों की व्याख्या भी इसी नुक्ते से की जा सकती है. लेकिन मैंने इस लेख की शुरुआत में ही अर्ज किया था कि हिमाचल प्रदेश के चुनाव को एंटी-इनकंबेंसी की हद में बांधकर नहीं देखा जा सकता. संयोग कहिए कि सर्वेक्षण के निष्कर्ष पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में हुए हाल के चुनाव के नतीजों से मिलते-जुलते जान पड़े रहे हैं, कम से कम सीटों के आंकड़े के हिसाब से.

नोटबंदी से बीजेपी को चुनावी फायदा

एक दिलचस्प बात यह दिख रही है कि 2014 के बाद से जिन राज्यों में बीजेपी ने जीत हासिल की है वहां उसे 2014 के लोकसभा चुनावों की तुलना में कम वोट मिले हैं (कहीं कहीं तो उसके वोटों में 10 प्रतिशत की कमी आई है) लेकिन नोटबंदी के बाद बीजेपी को ना सिर्फ अपना वोट-प्रतिशत बढ़ाने में कामयाबी मिली है, बल्कि उसने जीती गई सीटों की तादाद भी बढ़ाई है.

यहां तक कि पंजाब जैसे सूबे में जहां बीजेपी के लिए संभावनाएं एकदम ना के बराबर दिख रही थीं और सहयोगी शिरोमणि अकाली दल लोगों के बीच अपनी साख गंवा चुकी थी, बीजेपी को कदम टिकाए रखने भर की जमीन हासिल हो गई जबकि माना जा रहा था कि वह धराशाई हो जाएगी. यूपी और उत्तराखंड के बाद हिमाचल प्रदेश के लक्षण भी यही कह रहे हैं कि सूबे में बीजेपी को भारी-भरकम जीत हासिल होगी. अगर हिमाचल प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी से लोगों के आए दिन की उकताहट की बात होती तो वहां विपक्षी दल को साधारण बहुमत की जीत हासिल होती और बीजेपी हिमाचल प्रदेश में विपक्षी पार्टी है.

लेकिन सी-वोटर ट्रैकर के नतीजे बता रहे हैं कि हिमाचल प्रदेश में बीजेपी को धमाकेदार जीत मिलने जा रही है. भारत में चुनावों की फिलहाल यही रीत हो चली है. मतदाता एक ना एक पार्टी को इस अंदाज में सत्ता की बागडोर थमा रहा है कि बाकी पार्टियां खेल के मैदान में नहीं बल्कि दर्शक-दीर्घा में बैठी नजर आ रही हैं.