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वीआईपी संस्कृति: 'हर भारतीय विशेष है' तो सिर्फ लाल बत्ती पर रोक काफी नहीं

गाड़ियों की लाल बत्ती पर रोक तो ठीक है, लेकिन ये गहरी वीआईपी संस्कृति पर शायद ही कोई बड़ी चोट है

Akshaya Mishra

'हर भारतीय विशेष है, हर भारतीय एक वीआईपी है,' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को ट्वीट किया. हमें अब तक इस पर रवींद्र गायकवाड की कोई प्रतिक्रिया नहीं सुनाई दी है. जिन्हें याद नहीं उन्हें बता दें कि वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सैंडलमार राजनीतिक नेता हैं.

जिन्होंने कुछ हफ्ते पहले एक फ्लाइट पर कथित रूप से अपने साथ वीआईपी की तरह बर्ताव नहीं होने का आरोप लगाते हुए एयर इंडिया के एक कर्मचारी को सैंडल से पीटा था.


उनका अभिमानी, आक्रामक आचरण देश की वीआईपी संस्कृति के साथ होने वाली खराबी की कहानी कहता है. उनसे प्रधानमंत्री के इन शब्दों का जवाब 'हर भारतीय विशेष है' सुनना दिलचस्प होगा.

वीआईपी संस्कृति पर लालबत्ती प्रतिबंध कोई बड़ा चोट नहीं  

वाहनों के ऊपर लाल बत्ती पर प्रतिबंध लगा देना ठीक है, लेकिन यह गहरी रूढ़िवादी संस्कृति पर शायद ही कोई बड़ी चोट है जिसने लाल बत्ती को देश में सामाजिक और बाकी हर किस्म की प्रतिष्ठा का चिन्ह बना रखा है.

संदेश के लिहाज से कैबिनेट का निर्णय सही है. यहां तक कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीश भी लाल बत्ती का उपयोग नहीं करेंगे, ये सुनना कानों को कितना सुहाता है.

ऐसे सजे हुए वाहनों में जाने वाले लोग न केवल यातायात में बाधा डालते हैं बल्कि ये भी जाहिर करते हैं कि वे अन्य भारतीयों से बेहतर हैं. यह लोकतंत्र के दिल में बसने वाले समानता के विचार का खुलेआम मजाक है.

अधिकार इस देश में भेदभाव का नया स्रोत है जहां सामाजिक समीकरणों को बड़े पैमाने पर ऊंचे-नीचे पद के नजरिए से जाना जाता है. इसे अक्सर धर्म द्वारा स्वीकार भी किया जाता है और तब उसका नतीजा बनती है असमानता.

हालांकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, अब तक अनदेखा किए गए लोगों के लिए आरक्षण और नाइंसाफी को हटाने के लिए कानून कुछ हद तक सामूहिक विरासत के रूप में मिली असमानता को कम करने में कामयाब रहे हैं, अधिकार अब एक नई गड़बड़ बन कर सामने आए हैं जिन्हें सुधार की दरकार है. हमने आधिकारिक स्थिति के आधार पर एक नई जाति व्यवस्था बना रखी है.

लाल बत्ती [तस्वीर: पीटीआई]ये भी पढ़ें: 'लालबत्ती नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार है'

गायकवाड सांसद नहीं होते तो क्या वे बच निकलते?

रवींद्र गायकवाड का जिक्र यहां इस मायने में अहम है क्योंकि उनका मामला कार्यालय के दुरुपयोग और पदाधिकार से पैदा होने वाले अभिमान के मामलों में से एक है. अगर वो सांसद नहीं होते तो क्या वो इसी तरह व्यवहार करते?

अगर वो अपने अधिकार के पद पर न होते तो क्या इस तरह बच निकलते जैसे अभी निकल गए? जाहिर है, बिलकुल नहीं.

उनको लेकर साफ बात करना ठीक होगा. इस मिजाज से बर्ताव करने वाले वो इकलौते सार्वजनिक प्रतिनिधि नहीं हैं. ये तो बहुत आम बात है. हमारे सभी सरकारी कार्यलयों में अहंकार साफ नजर आता है जहां क्लर्क साधारण लोगों को नफरत की निगाहों से देखते हैं.

अधिकारी उच्च मानवों के रूप में व्यवहार करते हैं और चपरासी बेशर्मी से रिश्वत मांगते हैं क्योंकि वे अधिकारियों तक पहुंच रखते हैं. पुलिस अधिकारी स्वयं ही कानून बन जाते हैं और यहां तक कि वकीलों और डॉक्टर भी अपने स्तर का दुरुपयोग करते हैं

कार्यालय निरापद होने, और बड़े पैमाने पर कहें तो सत्ता के नशे को जन्म देते हैं. सत्ता कई तरीकों से प्रदर्शित की जाती है, उनमें से एक लाल बत्ती भी है. लेकिन इस संपूर्ण द्वेषी और स्वार्थी व्यवस्था का ये बहुत ही छोटा सा हिस्सा है.

इसे रोकना एक अच्छे सन्देश के तौर पर अच्छा है, लेकिन पद से पैदा होने वाली सत्ता और विशेषाधिकार की भावना को ध्वस्त करना ज्यादा बड़ी चुनौती है. गायकवाड के मामले में एक अच्छा कदम ये होता कि उनको दिए जाने वाले सभी तरह के विशेष अधिकार खत्म करके उन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया जाता.

वीआईपी संस्कृति हर सार्वजनिक जगहों से खत्म होनी चाहिए 

कानून निष्पक्ष होना चाहिए, कानून में किसी को भी बेहतर या कमतर मानकर बर्ताव नहीं होना चाहिए. अगर सरकार साफ तौर पर ये सन्देश देती तो ये एक महान समतावादी कदम होता. इसके अलावा जन-प्रतिनिधियों, अधिकारियों और सभी प्राधिकार रखने वाले लोगों के साथ विशेष दर्जे वाला व्यवहार भी रोका जाना चाहिए.

सभी भारतीय विशेष हैं और बराबर हैं, इसलिए इसकी कोई जरूरत नहीं है कि कुछ लोगों को सुपर स्पेशल बना दिया जाए. इस प्रकार मंदिरों, सार्वजनिक समारोहों, रेलगाड़ियों और इस तरह के दूसरे स्थानों में लोगों के लिए कोई विशेष प्रवेश द्वार नहीं रखे जाने चाहिए.

किसी मंत्री जी को पहुंचने में देर हो रही है, सिर्फ इस वजह से किसी विमान की उड़ान में देर क्यों की जाए?

एक तथाकथित महत्वपूर्ण व्यक्ति को हर जगह कतार में आगे कूद जाने की अनुमति क्यों दी जाए? उनकी सेवा के लिए ढेर सारे लोगों को क्यों लगा दिया जाए? ये तो साफ तौर पर गलत है. इसलिए इसको रोकना ही होगा.

प्रधानमंत्री मोदी की बात करें तो यदि वो वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने को लेकर गंभीर हैं, तो उनको हर किस्म के जन-पदाधिकारियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही बाहरी और अंदरुनी विशेषाधिकारों पर चोट करनी ही होगा.