S M L

पुत्रदा एकादशी: संतान के लिए उत्तम है ये व्रत, इन चीजों का रखें खास खयाल

एकादशी का व्रत करने वाले लोगों को दश्मी को प्याज, लहसुन नहीं खाना चाहिए. एकादशी को व्रत रखने के बाद द्वादशी को भगवान विष्णु को अर्घ्य देकर व्रत पूरा करना चाहिए

Updated On: Aug 21, 2018 11:58 AM IST

FP Staff

0
पुत्रदा एकादशी: संतान के लिए उत्तम है ये व्रत, इन चीजों का रखें खास खयाल

श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी इस साल 22 अगस्त को पड़ रही है. कई लोग इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से भी जानते हैं. संतान प्राप्ती के लिए पुत्रदा एकाशी का व्रत सबसे उत्तम माना गया है. जिन लोगों के पास संतान हैं वै भी इस व्रत को अपनी संतान के अच्छे भविष्य और अच्छे जीवन के लिए करते हैं.

इस एकादशी को पवित्र एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. मान्यता है कि जो भी इस व्रत को श्रद्धा से करता है उसके पूर्व जन्म के सभी पाप कट जाते हैं और संतान, धन संपत्ति का सुख प्राप्त होता है.

ऐसे रखें एकादशी का व्रत

एकादशी का व्रत रखने के लिए सुबह उठकर स्नान करके नए वस्त्र धारण करें. फिर भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने बैठकर देसी घी का दीपक जलाएं और पीले पुष्प अर्पित करें. इसके बाद श्रद्धा भाव से व्रत कथा पढ़ें. साथ ही इस दिन विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ भी जरूर करें.

ये व्रत श्रावण मास में पड़ता है, इसलिए भगवान शिव और देवी लक्ष्मी को भी प्रस्न्न करने के लिए ये व्रत उत्तम माना गया है. बताया जाता है कि एकादशी का व्रत करने वाले लोगों को दश्मी को प्याज, लहसुन नहीं खाना चाहिए. एकादशी को व्रत रखने के बाद द्वादशी को भगवान विष्णु को अर्घ्य देकर व्रत पूरा करना चाहिए.

एकादशी कथा

प्राचीन काल में एक नगर में राजा महिजीत राज करते थे. निःसंतान होने के कारण राजा बहुत दुःखी थे. मंत्रियों से राजा का दुःख देखा नहीं गया और वह लोमश ऋषि के पास गये. ऋषि से राजा के निःसंतान होने का कारण और उपाय पूछा. महाज्ञानी लोमश ऋषि ने बताया कि पूर्व जन्म में राजा को एकादशी के दिन भूखा प्यासा रहना पड़ा. पानी की तलाश में एक सरोवर पर पहुंचे तो एक ब्यायी गाय वहां पानी पीने आ गई. राजा ने गाय को भगा दिया और स्वयं पानी पीकर प्यास बुझाई. इससे अनजाने में एकादशी का व्रत हो गया और गाय के भगान के कारण राजा को निःसंतान रहना पड़ रहा है. लोमश ऋषि ने मंत्रियों से कहा कि अगर आप लोग चाहते हैं कि राजा को पुत्र की प्राप्ति हो तो श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत रखें और द्वादशी के दिन अपना व्रत राजा को दान कर दें.

मंत्रियों ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया और दान कर दिया. इससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई. इस कारण पवित्रा एकादशी को पुत्रदा एकादशी भी कहा जाता है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi