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पितृ पक्ष 2018: जानिए श्राद्ध कर्म करने की पूरी विधि, न करें इसमें कोई भूल

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है. यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है

Updated On: Sep 23, 2018 09:12 AM IST

Ashutosh Gaur

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पितृ पक्ष 2018: जानिए श्राद्ध कर्म करने की पूरी विधि, न करें इसमें कोई भूल

सनातनधर्म से जुड़े मनुष्यों को प्रबल इच्छा रहती है कि 'मेरी संतान जो हो वह मरने के बाद तर्पण और पिंड दान से मुझे तृप्त करें.' पुत्र शब्द की व्याख्या जहां पर की गई है, उसका भाव यह है कि पुन्नाम नरक से पिता को बचाने वाला ही पुत्र होता है.

नास्तिकता से या चंचलता से जो पुरुष तर्पण नहीं करता, उनके पितृ पिपासित होते हैं और देह से निकले अपवित्र जल को पीते हैं. विष्णु पुराण में आया है कि श्राद्ध काल में भक्ति और विनम्र चित्त से उत्तम ब्राह्मणों को यथा शक्ति भोजन कराएं और इससे असमर्थ होने पर, जो श्राद्ध में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कच्चा धान्य और थोड़ी भी दकचिन देगा, उसका श्राद्ध भी उत्तम होगा. अगर इसमें भी असमर्थ हो तो केवल 8 तिलों से जलांजलि देनी चाहिए. अगर यह भी नहीं कर सकते तो कहीं से गौ का चारा लाकर प्रीति और श्रद्धा पूर्वक गौ को खिला दें. सभी वस्तुओं के आभाव में एकांत में सूर्य आदि दिक्पालों से हाथ उठाकर उच्चस्वर से कहें कि मेरे पास श्राद्ध कर्म के योग्य न वित्त है और न कोई सामग्री है, इसलिए मैं अपने पितृगण को नमस्कार करता हूं, वे मेरी भक्ति से ही तृप्ति का लाभ लें.

श्राद्ध रहस्यपूर्ण, सोपपत्तिक और विज्ञानपूर्ण

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की तिथि में सभी पित्रों के श्राद्ध किए जाते हैं. उसमें विज्ञान यह है कि इन दिनों चंद्रमा अन्य महीनों की अपेक्षा पृथ्वी के पास होता है. इसी कारण उसकी आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी और उसमें अधिष्ठित प्राणियों पर विशेष रूप से पड़ता है. तब जितने सुक्ष्म-शरीरयुक्त जीव चंद्रलोक के ऊपरी भाग में स्थित पितृलोक में जाने के लिए बहुत समय से चल रहे होते हैं या चल पड़े होते हैं, उनका उद्देश्य करके उनके संबंधियों के जरिए प्रदत्त पिंड अपने अन्तर्गत सोम के अंश से उन जीवों को आप्यायित करके उनमें विशिष्ठ शक्ति उत्त्पन्न करके उन्हें शीघ्र और अनायास ही यानि बिना अपनी मदद के ही पितृलोक में प्राप्त करा दिया करते हैं. तब वे पितृ भी उनकी ऐसी सहायता पाकर उन्हें हृदय से समृद्धि और वंशवृद्धि का आर्शीवाद देते हैं.

प्रतिवर्ष क्षयाह के मास और तिथि में श्राद्ध किया जाता है. उसमें कारण यह है कि तिथि चंद्रमास के और चंद्रगति के अनुसार होती है. उसमें चंद्र लोक में वे पितृ उसी मार्ग और स्थान को प्राप्त हुए थे. तब वे सुक्ष्माग्नि से प्राप्त कर लेते है और उस श्राद्ध के सुक्ष्मांश को अनायास प्राप्त कर लेते हैं.

दिनांक------- तिथि 24 सितंबर- पूर्णमासी श्राद्ध 25 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध 26 सितंबर- द्वितीया श्राद्ध 27 सितंबर- तृतीया श्राद्ध 28 सितंबर- चतुर्थी श्राद्ध 29 सितंबर- पंचमी श्राद्ध 30 सितंबर- षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर- सप्तमी श्राद्ध 2 अक्टूबर- अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर- नवमी श्राद्ध 4 अक्टूबर- दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर- एकदशी श्राद्ध 6 अक्टूबर- द्वादशी श्राद्ध 7 अक्टूबर- त्रयोदशी श्राद्ध 8 अक्टूबर- चतुर्दशी/अमावस्या श्राद्ध 9 अक्टूबर- मातामह श्राद्ध

श्राद्ध विधि

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है. यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो मान्यता है कि वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है. शास्त्रसम्मत मान्यता यही है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए. श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दिया ही जाता है साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सकें तो बहुत पुण्य मिलता है. इसके साथ-साथ गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु-पक्षियों के लिए भी भोजन का एक अंश जरूर डालना चाहिए.

श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले जिसके लिए श्राद्ध करना है उसकी तिथि का ज्ञान होना जरूरी है. जिस तिथि को मृत्यु हुई हो उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए. लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति होती है कि हमें तिथि पता नहीं होती तो ऐसे में आश्विन अमावस्या का दिन श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ होता है क्योंकि इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है. दूसरी बात यह भी महत्वपूर्ण है कि श्राद्ध करवाया कहां पर जा रहा है. यदि संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए. यदि यह संभव न हो तो घर पर भी इसे किया जा सकता है. जिस दिन श्राद्ध हो उस दिन ब्राह्मणों को भोज करवाना चाहिए.भोजन के बाद दान दक्षिणा देकर भी उन्हें संतुष्ट करें.

श्राद्ध पूजा दोपहर के समय शुरू करनी चाहिए. योग्य ब्राह्मण की सहायता से मंत्रोच्चारण करें और पूजा के पश्चात जल से तर्पण करें. इसके बाद जो भोग लगाया जा रहा है उसमें से गाय, कुत्ते, कौवे आदि का हिस्सा अलग कर देना चाहिए. इन्हें भोजन डालते समय अपने पितरों का स्मरण करना चाहिए. मन ही मन उनसे श्राद्ध ग्रहण करने का निवेदन करना चाहिए.

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