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पितृ पक्ष 2018: जानिए क्यों, कैसे और कब करते हैं श्राद्ध, इस दिन करने से होगा लाभ

हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है. मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती.

Updated On: Sep 22, 2018 09:01 AM IST

Ashutosh Gaur

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पितृ पक्ष 2018: जानिए क्यों, कैसे और कब करते हैं श्राद्ध, इस दिन करने से होगा लाभ

हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है. मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह प्रेत योनि के रूप में इस संसार में ही रह जाता है. इस वर्ष पितृ पक्ष 24 सितम्बर 2018 से प्रारम्भ हो कर 9 अक्टूबर 2018 को पूर्ण हो रहे हैं.

कब होता है पितृ पक्ष?

यह पक्ष और इसके कर्म सभी वेदोक्त एवं शास्त्रोक्त है. श्रद्धा के साथ मन्त्र का उच्चारण करके इस लोक से मृतक हुए, नित्य पितृ, नैमित्तिक पितृ प्रेत आदि की योनि को प्राप्त पिता, पितामह, आदि कुटुम्बियों की तृप्त्यर्थ शास्त्रविधि के अनुसार जो क्रिया की जाती है उसका नाम श्राद्ध पक्ष है. श्राद्ध पक्ष को ही पितृ पक्ष भी कहते हैं. पितृ पक्ष भाद्रपद की पूर्णिमा से ही शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलते हैं.

पितृ पक्ष का महत्त्व

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए. हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है. मान्यता है कि अगर पितृ रुष्ट हो जाए तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है. संतान-हीनता के दोष के लिए में कुंडली में इसके लिए विशेष रूप से देखा जाता है. ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए.

श्राद्ध क्या है, क्यों करते हैं ?

हिन्दूजाति इस लोक के साथ ही साथ परलोक पर भी दृष्टि रखती है; इसीलिए इसमें पिता, पितामह और प्रपितामह की सद्गति तथा तृप्ति के लिए श्राद्ध क्रिया नियत है .जीवित लोगों की तो सेवा हुआ ही करती है, उनमें हमारी श्रद्धा भी होती है, पर श्राद्ध शब्द तो पारिभाषिक है. इसमें श्रद्धा का मधुर भाव निहित है. अपने जिन माता पिता आदि से हमें शरीर प्राप्त हुआ, हमारा लालन पालन हुआ, यदि उनके नाम से हम एक विशेष पात्र का सत्कार न करें, तो यह हमारी कृतघ्नता होगी. उनके नाम से दान करने पर परलोकगत उनकी आत्मा तृप्त हो जाती है. वह शांति और उन्नति को प्राप्त करता है. श्राद्धानुष्ठान के यथावत होने पर प्रेतयोनि से प्रेतत्व हट जाता है.

मनःसंकल्प के जरिए विधि और श्रद्धापूर्वक की हुई श्राद्ध आदि क्रियाएं भी चंद्र लोक स्थित पितरों को प्राप्त हो कर उन्हें प्रसन्न कर दिया करती हैं. चंद्रमा मन का अधिष्ठाता है. वह हमारे मन में संकल्प से की हुई क्रिया को नित्य पितरों के जरिए सुक्ष्मता से अपने लोक में खींचकर हमारे पितरों को तृप्त कर दिया करता है. मन के जरिए दिए हुए अन्न जल को वह सुचं रूप से आकृष्ट करता है. श्राद्ध पिता, पितमाह और प्रपितामह इन तीनों का होता है. श्राद्ध में सदाचारी, तपस्वी, विद्वान, स्वाध्यायशील, सद्ब्राह्मण को ही भोजन कराना चाहिए, ऐसा मनुस्मृति मे कथन है.

क्या दिया जाता है श्राद्ध में?

श्राद्ध में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है. साथ ही पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है. श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है. श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए. श्राद्ध पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत 50 वर्ष की आयु या उससे अधिक आयु वाली महिलाओं को ही करना चाहिए.

किस तारीख में करना चाहिए श्राद्ध?

सरल शब्दों में समझा जाए तो श्राद्ध दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना है. अगर किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है. इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है.

इस विषय में कुछ विशेष मान्यता भी है जो इस प्रकार से हैं:

- पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है. - जिन परिजनों की अकाल मृत्यु हुई यानि किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है. - साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है. - जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है. इस दिन को सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है.

शास्त्रों के अनुसार, अपने पितृगणों का श्राद्ध कर्म करने के लिए एक साल में 96 अवसर मिलते हैं. इनमें साल के बारह महीनों की 12 अमावस्या तिथि को श्राद्ध किया जा सकता है. साल की 14 मन्वादि तिथियां, 12 व्यतिपात योग, 12 संक्रांति, 12 वैधृति योग और 15 महालय शामिल हैं. इनमें पितृ पक्ष का श्राद्ध कर्म उत्तम माना गया है.

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