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पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए गया में पिंडदान का है विशेष महत्व

गया के पंडों के पास वहां जाने वाले लोगों का पूरा लेखा-जोखा होता है. उनके पास आप अपने दादा-परदादा के नाम को देखकर अचरज में पड़ जाएंगे

Gyan prakash Singh Updated On: Sep 05, 2017 10:54 AM IST

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पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए गया में पिंडदान का है विशेष महत्व

पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए गया में पिंडदान का विशेष महत्व है. लेकिन ऐसा क्या है गया में जिसका वर्णन पुराणों में भी मिलता है. एक असुर भी अगर सत्य की राह पर चले तो देवाताओं की तरह पूजनीय हो जाता है. गया की महत्ता भी ऐसे ही एक असुर के कारण है जो अपने सत्य तप के बल पर आज भी प्रासंगिक है.

गया बिहार राज्य का एक जिला है. प्राचीन काल से ही गया मोक्ष और मुक्ति का एक पवित्र स्थान माना गया है. गरुड़ पुराण की बात करें तो पता चलता है कि बहुत समय पहले एक असुर हुआ जिसका नाम गयासुर था जो अपने सत्य और तप के बल से लोगों को बिना मरे ही स्वर्ग भेजने लगा.

गयासुर के छूने मात्र से लोगों को मुक्ति मिलने लगी. इस बात से देवता बहुत चिंतित हुए. देवताओं के राजा इंद्र भगवान विष्णु के पास गए और प्रार्थना किया कि गयासुर के इस काम से प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा. भगवान विष्णु गयासुर के पास आए और कहा कि मुझे तुम्हारे प्राण चाहिए. गयासुर खुशी-खुशी अपने प्राण देने को तैयार हो गया.

गया में पिंडदान से पितृ दोष से मिलती है मुक्ति

गयासुर की इस दानशीलता से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर वरदान दिए कि जो भी अपनी पूर्वजों की मुक्ति के लिए गया में पिंडदान करेगा उसके पूर्वजों को अन्य योनियों में नहीं भटकना पड़ेगा और उसे पितृ दोष से भी मुक्ति मिल जाएगी.

गया फल्गु नदी के किनारे बसा हुआ है. यहां के पिंडदान का महत्व रामायण में भी लिखा हुआ मिलता है. जब श्री राम वनवास में थे तो उन्हें समाचार प्राप्त होता है कि राजा दसरथ की मृत्यु हो गयी. बड़ा पुत्र होने के कारण पिंडदान करना उनका धर्म था.

ऋषियों से पिंडदान के बारे में पूछने पर श्री राम को बताया गया कि फल्गु नदी के किनारे गया नामक स्थान पर पिंडदान करने पर पूर्वजों को अवश्य ही देवलोक मिलता है. ऐसा जान कर श्री राम जी ने गया में अपने पिता राजा दशरथ के नाम से पिंडदान करने का निश्चय किया.

लक्ष्मण और सीता जी के साथ श्री राम चन्द्र फल्गु नदी के किनारे पहुचें. और पिंडदान के लिए जरुरी सामान लेने के लिए लक्ष्मण के साथ चले गए. पिंडदान का उचित मुहूर्त निकलता जा रहा था. जब सीता जी ने देखा की अब श्री राम को आने में देर होगी तो उन्होंने फल्गु नदी से बालू निकाल कर राजा दशरथ के नाम से पिंडदान कर दिया.

वाल्मीकि रामायण में इस घटना का वर्णन है. जो इस बात पर बल देती है कि बेटा या बेटी कोई भी पिंडदान कर सकता है. वैसे तो भारत वर्ष में कई जगह पिंडदान करने की परंपरा रही है लेकिन जो महत्व गया में पिंडदान को दिया जाता है वह अन्य स्थान को नहीं है.

पंडों के पास होता है पूरा लेखा-जोखा और जानकारियां

गया के पंडों के पास वहां जाने वाले लोगों का पूरा लेखा-जोखा होता है. वहां जाने पर आप अपने दादा-परदादा के नाम को देखकर अचरज में पड़ जाएंगे. वहां के पंडे इन जानकारियों को अपनी विरासत मानते हैं और बहुत संभाल के रखते हैं.

अपने पूर्वजों के नाम वहां देखकर आपको इस बात का एहसास होगा कि आपकी उन्नति और अपने पूर्वजों के आत्मशांति के लिए आपके पूर्वज गया में पिंडदान कर चुके हैं. जिन बातों को आपका मन तर्क की कसौटी पर परख रहा था वास्तव में वो प्यार और श्रद्धा का विषय था.

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