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नवरात्रि स्पेशल: वो आवाज, जिसने जागरण को इंडस्ट्री बना दिया

चंचल वो शख्स हैं, जिन्होंने भक्ति को सुर दिए, एक अलग तरह का बाजार दिया, जगराता को अलग पहचान दी

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Sep 23, 2017 10:19 AM IST

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नवरात्रि स्पेशल: वो आवाज, जिसने जागरण को इंडस्ट्री बना दिया

नवरात्र आते हैं, तो एक आवाज गूंजती है. उत्तर भारत में मां शेरां वाली का जयकारा लगते ही उस नाम की चर्चा होती है. वो आवाज बिल्कुल अलग है. उसमें एक तीखापन है. ऐसा लगता है, मानो वो आवाज दिल को छूते हुए सीधे मां शेरांवाली तक पहुंचती है. चाहे चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है हो या फिर ओ जंगल के राजा मेरी मैया को लेके आजा.. मां दुर्गा के भजन और भेंट की बात हो तो नरेंद्र चंचल को भूल ही नहीं सकते.

चंचल वो शख्स हैं, जिन्होंने भक्ति को सुर दिए, एक अलग तरह का बाजार दिया. जगराता को अलग पहचान दी. जगराता यानी मां का जागरण, जहां देर शाम शुरू होकर मां की भेंट पूरी रात गाई जाती हैं. नरेंद्र चंचल ने उसे एक ग्लैमर दिया. आज नवरात्रों में उत्तर भारत के हर गली-मोहल्लों में जगराते सुने जा सकते हैं. इनमें नरेंद्र चंचल के सस्ते किस्म के क्लोन उसी आवाज में मां को याद करने की और लोगों को जगाए रखने की कोशिश में लगे रहते हैं.

चंचल ऐसे गायक हैं, जिनका नाम शास्त्रीय संगीत के साथ नहीं जोड़ा जाता. लोक संगीत के साथ भी नहीं. फिल्म संगीत के साथ भी कोई बहुत मजबूत नाता नहीं रहा. लेकिन तीनों तरह के संगीत में इनका दखल रहा है. उनका नाता ऐसे संगीत से है, जिसे उन्होंने घर और मोहल्ले से उठाकर इंडस्ट्री बना दिया.

मां के भजन को सुनकर हुआ गायन का शौक

16 अक्टूबर 1940 को अमृतसर के नमकमंडी में नरेंद्र चंचल का जन्म हुआ था. मां का नाम कैलाशवती और पिता चेतराम. बचपन में मां को मातारानी के भजन गाते सुनते थे, जहां से उन्हें संगीत का शौक हुआ. शैतान बहुत थे. स्कूल जाने का मन नहीं होता था. घंटों ताश खेला करते थे. कहा जाता है कि उनकी चंचलता की वजह से उनके हिंदी के शिक्षक उन्हें चंचल कहने लगे, जो बाद में उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ लिया.

बैसाखी के मेले में सुनकर राज कपूर ने गवाया फिल्म में गाना

मां से पहला सबक सीखने के बाद उन्होंने प्रेम त्रिखा से संगीत सीखा. उन्होंने फिल्मों में गाने की कोशिश की. इस दौरान भजन गाने लगे थे. लेकिन इस बीच कुछ समय के लिए उनकी आवाज चली गई. आवाज वापस मिली, तो उन्होंने फिर गाना शुरू किया. इस बीच राज कपूर से उनकी मुलाकात हुई. राज कपूर अपनी फिल्म बॉबी के लिए एक अलग किस्म की आवाज तलाश रहे थे. दरअसल, राज कपूर ने उन्हें बैसाखी के मेले में गाते सुना था. वहीं तय कर लिया कि बॉबी में गवाएंगे. 1973 में उन्हें फिल्म बॉबी के लिए गाया – बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो...

उसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में गाया. बेनाम और रोटी, कपड़ा और मकान अहम हैं. फिर आई फिल्म आशा, जिसमें भेंट थी, चलो बुलावा आया है. इस भेंट के बगैर आज भी कोई नवरात्रि पूरी नहीं होती. फिल्मों में बीच-बीच में गाते चंचल ने जैसे माता की भेंटों में अपना संसार ढूंढ लिया. इससे उन्हें बेशुमार इज्जत और शोहरत मिली. कहा जाता है कि अब भी वो हर साल वैष्णो देवी जरूर जाते हैं.

दरी से स्टेज से होते हुए जागरण को बनाया इंडस्ट्री

नरेंद्र चंचल ने एक इंटरव्यू में कहा कि एक वक्त माता के जागरण दरी पर होते थे, आज एक इंडस्ट्री है. यकीनन इस इंडस्ट्री को बनाने में उनका बड़ा योगदान है. छोटे से परिवार से आए नरेंद्र चंचल आज ऐशो आराम के साथ रहते हैं. उन्हें अच्छा पहनने का हमेशा से शौक रहा. गुरबत के दिनों में उन्होंने कुछ दिन ड्राई क्लीनर की दुकान पर काम किया. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि जो 10-15 दिन वहां काम किया, अच्छे कपड़े देखता रहता था कि किसी दिन मेरे पास भी ऐसे कपड़े होंगे.

वो दौर था कि उनके पास पहनने के लिए ढंग की चप्पल तक नहीं थी. लेकिन माता के जागरण ने सब बदल दिया. वो सबसे ज्यादा व्यस्त गायक बन गए. शायद यह जागरण की ही आदत है कि वो रात दो बजे से पहले नहीं सोते. सुबह सात बजे फिर उठकर अखबार पढ़ते हैं और सो जाते हैं. बाहर का खाना उन्हें पसंद नहीं है. यहां तक कि हवाई यात्रा में भी पत्नी के हाथ के बने पराठे और घीया की सब्जी ले जाना पसंद करते हैं.

तो उनका जीवन मां की भेंट, पसंदीदा गैजेट्स और घर के खाने के साथ चलता रहा. अब वो एक एनजीओ भी चलाते हैं. इसमें क्लॉथ बैंक है, जहां कपड़े इकट्ठे करके जरूरतमंदों को दिए जाते हैं. झुग्गी-झोंपड़ी के बच्चों को संगीत और डांस सिखाया जाता है. उनकी किताब है, जिसका नाम है मिडनाइट सिंगर. वाकई उनकी जिंदगी रात की गायकी से जुड़ी है, जो उनकी भाषा में दरी से शुरू हुई थी, फिर स्टेज पर पहुंची और आज इंडस्ट्री है.

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