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मुहर्रम 2017: दुनिया में इकलौता है काशी के दूल्हे का जुलूस

दूल्हे के इस जुलूस में शिया और सुन्नी की एकता की मिसाल देखने को मिलती है

FP Staff Updated On: Oct 01, 2017 09:39 PM IST

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मुहर्रम 2017: दुनिया में इकलौता है काशी के दूल्हे का जुलूस

लगभग छह सदी से अधिक पुराना है काशी में मुहर्रम पर निकलने वाला दूल्हे का जूलूस. अंगारों पर चलता हुआ, ताजियों को सलामी देता हुआ. मजहबी दीवारों को तोड़ता हुआ. मान्यता ऐसी कि मुसलमानों के साथ ही हिंदू भी इस जुलूस को प्रति आस्था रखते हैं, इसे देखने के लिए जुटते हैं. कहते हैं गंगा किनारे जंगल में घोड़े की नाल मिली थी जिस पर हज़रत इमाम हुसैन के भतीजे हज़रत कासिम के खास निशान बने थे. हज़रत कासिम हज़रत इमाम हुसैन के बड़े भाई हज़रत इमाम हसन के बेटे थे.

नाल शिवाला में लाकर रख दी गई और तब से ही शिवाला से हर साल मुहर्रम पर दूल्हे का जुलूस निकलता है. लोग मानते हैं कि जैसे जुलूस में दूल्हे के सिर पर यह नाल रखी जाती है, उस पर सवारी आ जाती है, तब वह आम इंसान से बेहद पाक हो जाता है. इस जुलूस में एक लाख से अधिक लोग शरीक होते हैं. इसकी खासियत यही है कि पूरी दुनिया में इकलौता दूल्हे का जुलूस काशी में ही उठता है.

नाल पर इमाम हसन के बेटे हज़रत कासिम के निशान माने जाते हैं

मान्यता है कि लगभग 650 साल पहले एक ब्राह्मण जंगल से होकर गुजर रहा था. उसने जंगल में 'या हुसैन या हुसैन' की आवाज सुनी. ढूंढने पर उसे वहां घोड़े की एक नाल मिली जिसमें से वो आवाज आ रही थी. वो यह देखकर खासा हैरान हुआ. बड़ी हिम्मत कर वो वहां से नाल ले आया और शिवाला के मुसलमानों को दे दिया. शिवाला के आलिम हुसैन रिजवी बताते हैं कि नाल पर जो निशान मिले थे वो इमाम हसन के बेटे हज़रत कासिम के माने जाते हैं.

बताया जाता है कि उस वक्त उस नाल से तीन नाल तैयार की गई थी. उसे शिवाला के ही एक इमामबाड़े में रखा गया था. उस वक्त के लोग बताया करते थे कि आशूरा यानी मुहर्रम के दिन जो ओरिजिनल नाल थी वो बेहद सुर्ख हो जाया करती थी. उसमें से 'या हुसैन या हुसैन' की आवाज आती थी. कुछ ही दिन में इस नाल की मान्यता पूरे देश में फैल गई. चूंकि इसे हज़रत कासिम के ही घोड़े की नाल माना गया इसलिए उसके बाद शिवाला से कासिम की याद में दूल्हे का जुलूस निकाला जाने लगा. शिवाला स्थित दूल्हे के इमामबाड़े में आज भी वो तीनों नाल रखे हुए हैं.

Kashi Muharram Julus 2

हज़रत अली समिति के सचिव सैयद फरमान हैदर बताते हैं कि आज से लगभग 1300 साल पहले जब जुल्म के खिलाफ और इंसानियत को बचाने के लिए कर्बला की जंग इमाम हुसैन ने लड़ी उसमें हज़रत कासिम भी शामिल हुए थे. उस वक्त उनकी उम्र यही करीब 17 साल की होगी और उनकी शादी इमाम हुसैन की बेटी से होने वाली थी. लेकिन जब कर्बला की जंग छिड़ी तो उसमें वो शहीद हो गए. उन्हीं की याद में 9वीं मुहर्रम को दूल्हे का जुलूस निकाला जाता है. हर साल शिवाला इलाके के ही एक नौजवान को दूल्हा बनाया जाता है. दूल्हा नाल कमेटी जिन्हें दूल्हा बनाती है, 9वीं मुहर्रम को गंगा में उसे नहलाया जाता है, उसे पाक साफ कर दूल्हे के इमामबाड़े पर ले जाया जाता है.

जुलूस में शिया-सुन्नी की एकता की दिखती है मिसाल 

दूल्हे के इस जुलूस में शिया और सुन्नी की एकता की भी मिसाल देखने को मिलती है. यूं तो दूल्हे का इमामबाड़ा सुन्नी जमात का है लेकिन 9वीं मुहर्रम को शिया समुदाय के लोग ही इमामबाड़े पर जाकर नौहे पढ़ते हैं. उसके बाद फातिहा पढ़ी जाती है. फातिहा पढ़ने के दौरान ही जिसे दूल्हा बनाया जाता है वो वहां रखी तीन नाल में से दो नाल को पकड़ लेता है. और फिर ना तो वो नाल छोड़ता है और ना ही उसे कोई होश रहता है. इमामबाड़े के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने के बाद यह जुलूस अपने निर्धारित रास्तों से होकर गुजरता है.

यह जुलूस 72 जगहों से गुजरता है जहां अंगारे बिछे होते हैं. अंगारों से निकलते शोले के बीच से दूल्हे का जुलूस निकलता है और हजरत कासिम की शहादत को याद किया जाता है. इतनी जगह से अंगारों से गुजरने के बाद भी किसी को कुछ नहीं होता, यह करिश्मा ही कहा जाएगा. यह जुलूस शहर के तकरीबन हर वक्फ इमामबाड़े से होकर गुजरता है और ताजियों को सलामी देता है. एक तरह से देखा जाए तो ये पूरी कहानी या मान्यता अध्यात्म और मुसलमानों की अकीदत से जुड़ी है.

Kashi Muharram Julus 1

सिर्फ दूल्हे का ही जुलूस नहीं बनारस में मुहर्रम के दौरान ऐसे कई जुलूस निकलते हैं जो ना सिर्फ ऐतिहासिक हैं बल्कि पूरी दुनिया में इकलौते भी. दूल्हे की जुलूस की तरह ही 6 मुहर्रम को बनारस के कच्ची सराय से निकलने वाला 40 घंटे का जुलूस भी अपने आप में खास है. यह इकलौता जुलूस है जो कि लगातार 40 घंटे से भी अधिक समय तक चलता है.

गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल कराने की कोशिश 

अलम, दुलदुल के साथ ही इस जुलूस में गाजे-बाजे के साथ ही हाथी, ऊंट भी शामिल होते हैं. इसे गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल कराने की भी कोशिश की जा रही है. इसी तरह खुशी के साज शहनाई पर भी यहां मातम की धुनें मुहर्रम के दौरान ही सुनने को मिलती हैं जिसकी रवायत खुद भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने शुरू की थी.

पांचवीं मुहर्रम को दालमंडी से उठने वाले मुहर्रम के जुलूस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई पर मातमी धुन बजाकर इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को खिराजे अकीदत पेश किया करते थे. आज भी उनकी ये रवायत कायम है. अब उनके घरवाले इस परंपरा को निभा रहे हैं.

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