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मुहर्रम 2017: इस मातम की सूरत बदलनी चाहिए...

मातम मनाने का एक मानवीय पहलू यह भी है कि जब आपको दर्द का अंदाजा होगा, तो दिल में दर्दमंदी पैदा होगी

Nazim Naqvi Updated On: Sep 30, 2017 09:32 AM IST

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मुहर्रम 2017: इस मातम की सूरत बदलनी चाहिए...

शनिवार को दुनिया इमाम हुसैन का बलिदान दिवस मना रही है. हर साल की तरह, इस साल भी, जहां-जहां भी हुसैन के चाहने वाले हैं वो इस बलिदान को अपने-अपने तरीके से याद कर रहे हैं. लेकिन पिछले नौ-दस बरसों में हुसैन के इस गम को मनाने में कुछ ऐसे परिवर्तन भी देखने को भी मिल रहे हैं, जो समय के साथ होने ही चाहिए थे.

10 अक्टूबर 680 ई. में ये घटना घटी थी और आज 1337 साल बाद भी अगर ये गम जिंदा है तो इसलिए कि जुल्म भी जिंदा है. दरअसल, जुल्म के खिलाफ इतना बड़ा बलिदान, खुद आगे बढ़कर, किसी ने नहीं दिया. बादशाह यजीद की शक्ल में, जुल्म जब हुसैन की तरफ बढ़ा तो हुसैन के चाहने वाले, हुसैन के भाई, बेटे, भांजे-भतीजे, दोस्त, उनकी शख्सियत पर फिदा, दूसरे मजहबों के उनके समर्थक और पैगंबर मुहम्मद पर आस्था रखने वाले, सभी एक-एक करके अपना गला पेश करते गए, तब कहीं जाकर क्रूरता का खंजर हुसैन के गले तक पहुंचा.

जुल्म के खिलाफ लड़ने का जज्बा

जुल्म के इस हमले ने महज कुछ घंटों में हुसैन के खेमे के 72 लोगों शहीद हुए. यानी हुसैन के चाहने वालों ने खंजर से हुसैन के गले की दूरी को कुछ घंटों के लिए और बढ़ा दिया. जां-निसारों के इस एक कदम ने हुसैन की सच्चाई पर एक ऐसी मुहर लगा दी कि जिसे झुठला पाना इतिहास दर्ज करने वालों के लिए, नामुमकिन था.

इस जांनिसारी को बहुत नजदीक से महसूस करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अगर मेरे पास हुसैन के 72 सिपाहियों जैसी सेना होती तो मैं 24 घंटे में भारत को आजादी दिला देता.’

फोटो सोर्स- रॉयटर्स

फोटो सोर्स- रॉयटर्स

दुनिया के बड़े-बड़े दार्शनिकों, समाज सुधारकों और विद्वानों ने हुसैन की इस कुर्बानी को दिल से सराहा. एडवर्ड गिब्बन एक ऐसे ही एक अंग्रेज इतिहासकार हैं, वे लिखते हैं, ‘प्राचीन-काल के उस माहौल में, हुसैन की मौत के त्रासदी भरे दृश्य सबसे उदासीन पाठक के दिल में भी सहानुभूति जागृत कर देंगे.’ गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ‘इमाम हुसैन को मानवता का नायक’ कहते हैं.

हुसैन कौन हैं? इसे जानने के लिए आजकल, न जाने कितने ऐसे कथन हैं जो सोशल मीडिया पर करोड़ों आंखों से गुजर रहे हैं.

शिया संप्रदाय, यजीदी फौज से मुकाबले में, हुसैन के इन जांनिसारों के युद्ध-कौशल को इस तरह से दिखाते हैं जैसे कर्बला का मैदान कोई जंग का मारका था. दरहकीकत ये जांनिसार, हुसैन की तरफ बढ़ते हुए, जुल्म के उस खंजर से लड़कर, उसे आगे बढ़ने से रोक रहे थे, और शहीद हो रहे थे.

क्यों मनाते हैं मातम?

दुनियाभर में लोग, इसी जज्बे को सलाम करने के लिए दस मुहर्रम का दिन मनाते हैं. उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं जब वह, हुसैन की उस संवेदनशीलता को महसूस करते हैं, जो अपने प्यारों को ऐसे मरता न देखना चाह रहा हो और देख रहा हो.

बहुत से लोग तो इस इंसानी बेइंसाफी के खिलाफ इस हद तक आगे बढ़ जाते हैं की खुद को जख्मी करने लगते हैं. खुद को यातनाएं देते हैं. जंजीरों का मातम, ‘कमा’ (छोटी कृपाण या तलवार जैसा अस्त्र जिससे लोग अपने सर पर चीरा लगाते हैं) का मातम, आग का मातम और हाथों से सीने पर मातम. यह सब इसलिए ताकि वह, हुसैन और उनके समूह पर हुई यातना को महसूस कर सकें. इसका एक मानवीय पहलू भी है कि जब आपको दर्द का अंदाजा होगा, तो दिल में दर्दमंदी पैदा होगी.

शिया संप्रदाय में भी बहुत से लोग इस तरह खून बहाने को सही नहीं मानते. उनका कहना है कि मुहर्रम के जुलूस जुल्म के खिलाफ और इंसानियत के हक में, हमारा विरोध-प्रदर्शन है. लेकिन ऐसे लोग ज्यादातर खामोश रहते हैं क्योंकि दर्द का इजहार किसी का व्यक्तिगत फैसला है. इसपर किसी भी तरह की कोई बंदिश कैसे लगाई जा सकती है?

मातम मनाने के नए तरीके

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हुसैन के मानवता के संदेश को और अधिक मानवीय बनाने की कोशिशों में लगे रहते हैं.

उत्तर-प्रदेश के उन्नाव शहर के ऐसे ही कुछ नौजवान पिछले कुछ सालों से दस मुहर्रम के दिन इमाम हुसैन के नाम पर ब्लड-डोनेशन के कैंप लगते हैं और ब्लड-बैंक को अपना खून देते हैं, ताकि किसी जरूरतमंद की जरूरत पूरी हो सके. इसी शहर के बाशिंदे और इंजीनियर से बिल्डर बने अमीर जैदी कहते हैं कि ‘शुरू-शुरू में इस सोच के साथ बहुत से लोग नहीं थे लेकिन जल्दी ही शिया संप्रदाय के नौजवानों को यह बात समझ में आई, और अब तो दूसरे धर्मों के लोग भी इस दिन, खून देकर इमाम हुसैन को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं.’

दरअसल, हुसैन के नाम पर रक्त-दान अभियान पहली बार मैनचेस्टर में जनवरी 2006 में शुरू किया गया था. जिसमें सिर्फ 23 लोग इस दान के लिए आगे आए. लेकिन इस सोच को जिसने सुना, उसी ने सराहा और इसी का नतीजा है कि मुहर्रम में अपना खून सड़कों पर बहा देने से ज्यादा सार्थक लोगों को यह कदम लग रहा है.

‘खून बहाना है तो ऐसे बहाओं की किसी के काम आ जाए. यह तो उसके नाम पर है जिसने अपना सब कुछ मानवता की रक्षा के लिए लुटा दिया.’ जाहिर है कि अमीर जैदी जैसी सोच वाले लोग, तेजी से पनप रहे हैं और देश के कई और स्थानों से ऐसी पहल की जानकारियां मिल रही हैं.

हुसैन वाले वो हैं जो कर्बला के मिशन को, दर्दमंदी के उस मिशन को जिन-जिन मुल्कों में वह रह रहे हैं, जिन-जिन धर्मों और मजहबों से संबंध रखते हैं, वहां वह अपने समाज को, अपनी सरकारों को इंसानियत सिखा सकें और अपने आचरण से उसे दिखा सकें.

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