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निरंतर ध्यान के अभ्यास से मिलते हैं विनम्रता और निष्काम सेवा के मोती

नम्रता का हमारे दैनिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और हमारे आस-पास के लोग भी इससे अछूते नहीं रहते

Updated On: Nov 19, 2017 02:28 PM IST

Sant Rajinder Singh Ji

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निरंतर ध्यान के अभ्यास से मिलते हैं विनम्रता और निष्काम सेवा के मोती

नम्रता एक ऐसा दुर्लभ सद्गुण है जिसे हमें अपने जीवन में धारण करना है. नम्रता का अर्थ ऐसे भाव से जीना है कि हम सब एक ही परमात्मा की संतान हैं. जब हमें यह अहसास होता है कि प्रभु की नजरों में सब एक समान हैं, तो दूसरों के प्रति हमारा व्यवहार नम्र हो जाता है.

जब हमारा अहंकार खत्म हो जाता है तो हमारा घमंड और गर्व मिट जाता है. तब हम किसी को भी पीड़ा नहीं पहुंचाते. हम महसूस करते हैं कि प्रभु की दया से हमें कुछ पदार्थ मिले हैं और जो पदार्थ हमें दूसरों से अलग करते हैं. वो भी प्रभु के दिए उपहार हैं.

अपने भीतर प्रभु का प्रेम अनुभव करने से हमारे अंदर नम्रता आती है. तब हर चीज में हमें प्रभु का हाथ नजर आता है. हम देखते हैं कि सबकुछ करने वाले तो प्रभु हैं.

जब हमारे अंदर इस तरह की आत्मिक नम्रता का विकास होता है तब हमारे अंदर धन, मान-प्रतिष्ठा, ज्ञान और सत्ता का अहंकार नहीं आ पाता.

कहा जाता है कि जहां प्रेम है, वहां नम्रता है. हम जिनसे प्यार करते हैं उनके आगे अपनी शेखी नहीं बघारते, न ही उन पर क्रोध करते हैं. हमें उन लोगों के प्रति भी इसी तरह का व्यवहार करना चाहिए जिनसे हम अपरिचित हैं.

यह भी कहा जाता है कि जहां प्यार है, वहां निःस्वार्थ सेवा का भाव होता है. हम जिनसे प्रेम करते हैं उनकी सहायता करना चाहते हैं लेकिन हमें जो भी मिले, हमें उसकी मदद करनी चाहिए क्योंकि सब में प्रभु की ज्योति है.

अपने भीतर नम्रता विकसित करने का एक तरीका है- ध्यान का अभ्यास. जब हम अपने अंतर में मौजूद प्रभु की ज्योति और शब्द से जुड़ते हैं तो हमसे प्रेम, नम्रता और शांति का प्रवाह होता है.

संत राजिंदर सिंह जी

संत राजिंदर सिंह जी

हम दूसरों की निःस्वार्थ सेवा करते हैं ताकि उनके दुख-तकलीफ कम हो सकें. जीवन के तूफानी समुद्र में हम एक दीप-स्तंभ बन जाते हैं. समुद्री तूफान के समय जब जहाज और नौका रास्ता भटक जाते हैं तो वे हमेशा दीप-स्तंभ की ओर देखते हैं.

एक बार अंतर में प्रभु की ज्योति का अनुभव पाने और यह एहसास करने के बाद कि हम प्रभु के अंश हैं, हम एक सच्चे इंसान के प्रतीक बनकर, एक प्रकाश-स्तंभ की तरह दूसरों को सहारा देते हैं, उन्हें राह दिखाते हैं.

जब हम प्रभु के प्रेम से भर उठते हैं, हम देखते हैं कि इससे हमारे जीवन में टिकाव आया है. हम पाते हैं कि जो खुशी और दिव्य आनंद हमें ध्यान-अभ्यास के दौरान मिलता है वह केवल उसी समय के लिए नहीं होता बल्कि उसके बाद भी हमारे साथ बना रहता है.

इसका हमारे दैनिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और हमारे आस-पास के लोग भी इससे अछूते नहीं रहते.

(लेखक सावन कृपाल रूहानी मिशन के प्रमुख हैं)

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