S M L

मर्यादा पुरुषोत्तम राम: राजनीति ने छीन लिया भारतीय मुसलमानों का 'इमाम-ए-हिंद'

हमें यह समझने की जरूरत है कि श्रीराम केवल हिंदू धर्म के भगवान नहीं हैं बल्कि इस मिट्टी के धरोहर हैं और धरोहर को बांटना न तो मुमकिन है और न अक्लमंदी

Saqib Salim Updated On: Sep 30, 2017 09:51 AM IST

0
मर्यादा पुरुषोत्तम राम: राजनीति ने छीन लिया भारतीय मुसलमानों का 'इमाम-ए-हिंद'

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब हमने देखा के कैसे बंगाल में राजनीतिक पार्टियों में इस बात को लेकर घमासान था कि मोहर्रम के दिन दुर्गा विसर्जन होना ठीक होगा या नहीं. इस पूरी बहस की केंद्रबिंदु यह सोच थी कि मोहर्रम के दिन हुई इमाम हुसैन की शहादत से केवल मुसलमानों का लेना-देना हो सकता है और मां दुर्गा या मर्यादा पुरुषोत्तम राम से सिर्फ हिंदुओं को सरोकार है.

हम देख रहे हैं कि किस प्रकार हमारे राजनेताओं ने समाज को धर्म के नाम पर बांट दिया है. 80 के दशक के मध्य में बीजेपी द्वारा शुरू किए गए रामजन्मभूमि आंदोलन ने श्रीराम को भारतीय संस्कृति के प्रतीक से विस्थापित कर एक हिंदू भगवान के रूप में स्थापित कर दिया.

इक़बाल ने लिखी थी श्रीराम की शान में कविता

आज हम में से बहुत कम लोग ही इस बात पर विश्वास कर पाएंगे की कभी इक़बाल जैसे उर्दू के शायर ने श्रीराम की शान में कविता लिखी थी. जिसमें उन्होंने श्रीराम को हिंदू धर्म का प्रतीक न मान कर भारत की सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक के रूप में पहचाना है. यहां गौरतलब बात यह है कि ये वही इक़बाल हैं जिनको पाकिस्तान के जनक के रूप में भी देखा जाता है.

राम नामक ये कविता इक़बाल ने 1908 में लिखी थी और 1924 में बांग-ए-दरा में छपी है. जिस समय इक़बाल ने ये कविता लिखी वे खुद जर्मनी में अध्यात्म और दर्शन पढ़ रहे थे. इस समय वे बाकी भारतीयों की तरह ‘स्वाधीनता संग्राम’ से प्रभावित थे और अपने अध्ययन से ये साबित करने में लगे थे कि यूरोपियों का यह अहम् कि वे भारतीय सभ्यता से किसी भी प्रकार से बेहतर हैं एक झूठ से ज्यादा कुछ भी नहीं है.

ऐसे में इक़बाल जैसा एक धार्मिक मुसलमान यह लिखने में बिलकुल नहीं झिझकता कि राम भारतीय सभ्यता से जुड़े हैं ना कि किसी धर्म से. इस कविता का पहला शेर है:

लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिंद सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता-ए-मगरिब के राम-ए-हिंद

यह शेर भारतीय दर्शन की श्रेष्ठता को दर्शाता है. इक़बाल का कहना है कि हिंद का प्याला सत्य से भरा हुआ है और जितने भी दार्शनिक पश्चिम (मगरिब) में हैं वे भारत के श्रीराम का विस्तार मात्र हैं.

Allama-Iqbal

इक़बाल के लिए श्रीराम क्यों थे 'इमाम-ए-हिंद'

यहां इक़बाल की भाषा की खूबसूरती इस बात से पहचानी जा सकती है कि राम-ए-हिंद का मतलब भारत के श्रीराम भी है और भारत की महत्ता को स्वीकार करना भी. दोनों ही तरह से इक़बाल भारतीय संस्कृति को पश्चिम पर तरजीह देते नजर आते हैं.

आगे चल कर इस ही कविता में इक़बाल ऐलान करते हैं कि:

है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़ अहल-ए-नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिंद

‘अहल-ए-नजर’ का अर्थ होता हैं समझदार या ज्ञानी. इक़बाल का कहना है कि भारत को इस पर गर्व है कि श्रीराम ने यहां जन्म लिया. उनके अनुसार ज्ञानी लोग उनको ‘इमाम-ए-हिंद’ अर्थात् भारत का गुरु या अगुआई करने वाला मानते हैं.

आज बीजेपी और अन्य राजनीतिक दल ‘रामजन्मभूमि आंदोलन’ के संदर्भ में श्रीराम को केवल एक क्षत्रिय के रूप में याद करना चाहते हैं. जबकि इक़बाल के लिए श्रीराम दार्शनिकों के गुरु भी हैं और भारतीय संस्कृति के सरदार भी.

यह बात काफी रोचक है कि कैसे आज एक आम भारतीय न केवल श्रीराम को सिर्फ हिंदू धर्म से जोड़ कर देखता है बल्कि उनके बारे में सोचने पर उसे केवल रावण के साथ होने वाला उनका युद्ध याद आता है. ऐसे में श्रीराम के चरित्र से जुड़ी नैतिकता, दर्शन, ज्ञान इत्यादि कहीं खोते जा रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि इक़बाल के लिए श्रीराम केवल दार्शनिक ही थे. वे लिखते हैं:

तलवार का धनी था शुजाअत में फर्द था पाकीज़गी में, जोश-ए-मुहब्बत में फर्द था

उनके लिए श्रीराम एक बहादुर योद्धा भी थे, धर्मनिष्ठ भी थे और प्रेम भाव रखने में भी उनका कोई जोड़ नहीं था. ये सभी गुण मिलकर श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनाते हैं.

जिस समय ये कविता इक़बाल लिख रहे थे, भारत को एक ऐसे नायक की तलाश थी जो न केवल लड़ाई के मैदान में दुश्मन से लड़ सके बल्कि जो मानवता से प्रेमभाव भी रखता हो. यह नायक जानता हो कि दीन-दुखी का दर्द क्या होता है. यह नायक ज्ञानी भी हो, धार्मिक भी और दर्शन में निपुण भी. आखिर इक़बाल को ऐसा ‘इमाम-ए-हिंद’ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अलावा कहां मिलता.

आज हम नफरतों के दौर में जी रहे हैं. हमने अपनी भारतीयता के नायक-नायिकाओं को भी धर्म और राजनीति की दीवार से बांट लिया है. हमें यह समझने की जरूरत है कि श्रीराम केवल हिंदू धर्म के भगवान नहीं हैं बल्कि इस मिट्टी के धरोहर हैं और धरोहर को बांटना न तो मुमकिन है और न अक्लमंदी.

(लेखक जेएनयू में इतिहास केंद्र में शोधकर्ता हैं और राजनीतिक -सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Test Ride: Royal Enfield की दमदार Thunderbird 500X

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi