S M L

क्यों खास है श्रवणबेलबोला का महामस्तकाभिषेक उत्सव!

इस वर्ष 86वें महामस्तकाभिषेक का मुख्य उत्सव यहां 17 से 26 फरवरी के बीच आयोजित किया जाएगा

Updated On: Jan 22, 2018 06:13 PM IST

Bhasha

0
क्यों खास है श्रवणबेलबोला का महामस्तकाभिषेक उत्सव!

जैन संप्रदाय के लिए काशी जैसा महत्व रखने वाले श्रवणबेलगोला में हर 12 वर्ष बाद मनाया जाने वाला ‘महामस्तकाभिषेक उत्सव’ दरअसल पूरे देश की एक सांस्कृतिक धरोहर है और इतिहास, परंपरा और आस्था का कुंभ है.

इस वर्ष 86वें महामस्तकाभिषेक का मुख्य उत्सव यहां 17 से 26 फरवरी के बीच आयोजित किया जाएगा. बाद में प्रत्येक रविवार को अगले छह माह तक अभिषेक का कार्यक्रम चलता रहेगा.

नगर में इस उत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं. मुख्य आयोजन में करीब 30-40 लाख लोगों के आने का अनुमान है. कुंभ मेले की तरह यहां 12 अस्थायी नगर बसाए जा रहे हैं. इनमें जैन मुनियों के लिए त्यागी नगर, मीडिया नगर, मस्तकाभिषेक करने वालों के लिए दो कलश नगर इत्यादि बसाए गए हैं.

कर्नाटक सरकार की ओर से नियुक्त विशेष आयोजन अधिकारी वराह प्रसाद रेड्डी ने ‘भाषा’ से कहा, ‘कुल 12 नगरों का निर्माण किया गया है. यह करीब 550 एकड़ में फैले हैं. सारे नगर स्वावलंबी हैं अर्थात् हर नगर में सारी व्यवस्था की गई है.’

उत्सव के मुख्य आयोजक जैन मुनि चारुकीर्ति भट्टारक ने कहा, ‘कर्नाटक सरकार ने इस आयोजन के लिए 175 करोड़ रुपए दिए हैं. पिछली बार 95 करोड़ देने वाली केंद्र सरकार से अनुदान की बातचीत चल रही है.’

भट्टारक ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय की ओर से फिलहाल विंध्यगिरी पहाड़ी पर सीढ़ियों और बाउंड्री का निर्माण कराया गया है. रेल मंत्रालय ने पास में ही एक रेलवे स्टेशन बनवाया है जहां बेंगलुरु से विशेष ट्रेन की व्यवस्था की गई हैं.

981 ई. में हुआ था पहला महामस्तकाभिषेक

कर्नाटक सरकार की ओर से पूरे क्षेत्र के विकास और आयोजन पर करीब 300 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं. इसमें किसानों को फसल के लिए दिया गया मुआवजा और आयोजन समिति को दिए गए 175 करोड़ रुपए शामिल है.

बेंगलुरु से करीब 150 किलोमीटर दूर श्रवणबेलगोला का इतिहास 10वीं शताब्दी के गंग राजवंश से शुरु होता है. तब राज्य के सेनापति चावुंडराय ने जैन संप्रदाय के पहले तीर्थकंर ऋषभदेव के बेटे बाहुबली की इस 58 फुट ऊंची प्रतिमा का निर्माण कराया था. एक ही पत्थर से बनी यह दुनिया की सबसे बड़ी मूर्तियों में से एक है.

भट्टारक ने कहा, ‘पहला महामस्तकाभिषेक 981 ईसवी में हुआ था. तब प्रत्येक 12 वर्ष बाद इस आयोजन की राजाज्ञा जारी हुई. अब तक इस ऐतिहासिक परंपरा का पालन किया जा रहा है.’

ऐसा माना जाता है कि मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने भी अपने जीवन के अंतिम क्षण इसी नगर की चंद्रगिरी पहाड़ी पर बिताए थे.

जैन धर्म में ‘आत्मवलोकन’ के बजाय ऐसे भव्य आयोजन के महत्व पर भट्टारक ने कहा, ‘यह आस्था-परंपरा के साथ भारतीय संस्कृति का उत्सव है. ऐसे उत्सव प्रभावना के लिए होते हैं जिनका लक्ष्य ऋषि-मुनियों के उपदेश को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना होता है.’

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi