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Kalashtami 2018: आज है कालाष्टमी, ऐसे करें कालभैरव की पूजा, मिलेंगे ये लाभ

पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच विवाद छिड़ गया कि उनमे से श्रेष्ठ कौन है

FP Staff Updated On: Jul 06, 2018 10:03 AM IST

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Kalashtami 2018: आज है कालाष्टमी, ऐसे करें कालभैरव की पूजा, मिलेंगे ये लाभ

भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार हर हिंदू माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी मनाई जाती है. इसे ‘भैरवाष्टमी’ भी कहते हैं. इस महीने कालाष्टमी 6 जुलाई 2018 (शुक्रवार) को है. हिंदू धर्म में यह माना जाता है कि कालाष्टमी के दिन ही भगवान शिव ने भैरव का रूप धारण किया था. इस दिन मां दुर्गा की पूजा और व्रत का भी विधान माना गया है.

क्यों रखा जाता है कालाष्टमी का व्रत

पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच विवाद छिड़ गया कि उनमे से श्रेष्ठ कौन है? यह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि सभी देवता घबरा गए. उन्हें डर था कि दोनों देवताओं के बीच युद्ध ना छिड़ जाए और प्रलय ना आ जाए.

सभी देवता घबराकर भगवन शिव के पास चल गए और उनसे समाधान ढूंढ़ने का निवेदन किया. जिसके बाद भगवान शंकर ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें भगवान शिव ने सभी ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि और साथ में विष्णु और ब्रह्मा जी को भी आमंत्रित किया.

इस सभा में निर्णय लिया गया कि सभी देवताओं में भगवान शिव श्रेष्ठ है. इस निर्णय को सभी देवताओं समेत भगवान विष्णु ने भी स्वीकार कर लिया. ब्रह्मा ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. वे भरी सभा में भगवान शिव का अपमान करने लगे. भगवान शंकर इस तरह से अपना अपमान सह ना सके और उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया.

भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए. भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए. वह श्वान (कुत्ते) पर सवार थे, उनके हाथ में एक दंड था और इसी कारण से भगवान शंकर को ‘दंडाधिपति’ भी कहा गया है. पुराणों के अनुसार भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था. उन्होंने ब्रह्म देव के पांचवें सिर को काट दिया तब ब्रह्म देव को अपनी गलती का एहसास हुआ.

कालाष्टमी की पूजा विधि 

भगवान शिव द्वारा प्रकट भगवान भैरव का जन्म मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी के दिन हुआ इसलिये हर माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के मध्यरात्रि में भैरव की पूजा की जाती है और कुछ जगह रात्रि जागरण भी किया जाता है. दिन में कुछ भैरव उपासक व्रत भी रखते हैं.

माना जाता है कि भगवान शिव के भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों को भैरवनाथ की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए. माना जाता है कि भैरव की आराधना करने से हर तरह की पीड़ा से मुक्ति मिलती है. और विशेषकर जातक की जन्मकुंडली में बैठे अशुभ व क्रूर ग्रह तथा शनि, राहू, केतु व मंगल जैसे मारकेश ग्रहों का प्रभाव कम होता है और व्यक्ति धीरे- धीरे एक सदमार्ग की ओर आगे चलता है. भगवान काल भैरव के जप-तप व पूजा-पाठ और हवन से मृत्यु तुल्य कष्ट भी समाप्त हो जाते हैं.

इस मंत्र का करें जाप-

शिव पुराण में कहा है कि भैरव परमात्मा शंकर के ही रूप हैं इसलिए आज के दिन इस मंत्र का जाप करना फलदायी होता है.

अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्, भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!!

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