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Janmashtami 2018: किस दिन है कृष्ण जन्माष्टमी और क्या है पूजा करने का सही मुहूर्त, जानें

अधिकतर कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है. जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगों के लिए और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगों के लिए होती है

Updated On: Aug 30, 2018 03:32 PM IST

Ashutosh Gaur

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Janmashtami 2018: किस दिन है कृष्ण जन्माष्टमी और क्या है पूजा करने का सही मुहूर्त, जानें
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है. इस बार जनमाष्टमी 3 सितंबर को है. जो लोग जन्माष्टमी का व्रत करते हैं वह इसके एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करते हैं. व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद, भक्त पूरे दिन उपवास रखकर अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के खत्म होने के बाद व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं.

कुछ कृष्ण-भक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र और मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं. संकल्प प्रातःकाल के समय लिया जाता है और संकल्प के साथ ही अहोरात्र का व्रत प्रारंभ हो जाता है. जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है. वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है. निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं.

जन्माष्टमी का मुहूर्त:

अष्टमी तिथि प्रारंभ- 2 सितंबर, 2018 को रात्रि 8:47 बजे से अष्टमी तिथि समाप्त- 3 सितंबर, 2018 को सायंकाल 17:19 बजे तक रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ- 2 सितंबर, 2018 को रात्रि 8:48 बजे से रोहिणी नक्षत्र समाप्त- 3 सितंबर, 2018 को रात्रि 8:04 बजे तक निशीथ काल पूजन- 2 सितंबर, 2018 को रात्रि 11:57 से 12:48 तक सुबह संयोग है .

अधिकतर कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है. जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगों के लिए और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगों के लिए होती है. जो कि इस वर्ष भी 2 दिन पड़ रही है. जिसमे प्रथम दिन अर्थात 2 सितम्बर को स्मार्त की होगी और 3 सितम्बर को वैष्णव संप्रदाय की मनाई जाएगी.

गृहस्थ जीवन वाले वैष्णव संप्रदाय से जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं और साधु संत स्मार्त संप्रदाय के द्वारा मनाते हैं. स्मार्त अनुयायियों के लिए, हिंदू ग्रन्थ धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु में, जन्माष्टमी के दिन को निर्धारित करने के लिए स्पष्ट नियम हैं. जो वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयाई नहीं हैं, उनको जन्माष्टमी के दिन का निर्णय हिंदू ग्रंथ में बताए गए नियमों के आधार पर करना चाहिए.

इस अंतर को समझने के लिए एकादशी उपवास एक अच्छा उदाहरण है. एकादशी के व्रत को करने के लिए, स्मार्त और वैष्णव सम्प्रदायों के अलग-अलग नियम होते हैं. ज्यादातर श्रद्धालु एकादशी के अलग-अलग नियमों के बारे में जानते हैं लेकिन जन्माष्टमी के अलग-अलग नियमों से अनभिज्ञ होते हैं. अलग-अलग नियमों की वजह से न केवल एकादशी के दिनों बल्कि जन्माष्टमी के दिनों में एक दिन का अंतर होता है.

वैष्णव और स्मार्त संप्रदाय की जन्माष्टमी के नियम

वैष्णव धर्म को मानने वाले लोग उदया तिथि को प्राथमिकता देते हैं. उदया तिथि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को प्राथमिकता देते हैं और वे कभी सप्तमी तिथि के दिन जन्माष्टमी नहीं मनाते हैं. वैष्णव नियमों के अनुसार हिंदू कैलेंडर में जन्माष्टमी का दिन अष्टमी /नवमी तिथि पर ही पड़ता है.

जन्माष्टमी का दिन तय करने के लिए, स्मार्त धर्म द्वारा अनुगमन किए जाने वाले नियम अधिक जटिल होते हैं. इन नियमों में निशिता काल को, जो कि हिंदू अर्धरात्रि का समय है, को प्राथमिकता दी जाती है. जिस दिन अष्टमी तिथि निशिता काल के समय व्याप्त होती है, उस दिन को प्राथमिकता दी जाती है. इन नियमों में रोहिणी नक्षत्र को सम्मिलित करने के लिए कुछ और नियम जोड़े जाते हैं.

जन्माष्टमी के दिन का अंतिम निर्धारण निशिता काल के समय, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोजन के आधार पर किया जाता है. स्मार्त नियमों के अनुसार हिंदू कैलेंडर में जन्माष्टमी का दिन हमेशा सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि के दिन पड़ता है.

2 सितम्बर को निशीथ काल में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र मिल रहा है जो कि स्मार्त संप्रदाय वालों के लिए है. 3 सितम्बर को अष्टमी तिथि एवं रोहिणी नक्षत्र उदया तिथि में मिल रही है. अतः वैष्णव संप्रदाय वालों को इस दिन मनानी चाहिए और इसी दिन व्रत करना चाहिए.

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