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इस्लामिक कैलेंडर की शुरुआत है मुहर्रम का महीना

मुहर्रम शब्द 'हराम' या 'हुरमत' से बना है जिसका अर्थ होता है 'रोका हुआ' या 'निषिद्ध' किया गया

Updated On: Sep 24, 2017 09:54 AM IST

Asif Khan

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इस्लामिक कैलेंडर की शुरुआत है मुहर्रम का महीना

मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है अर्थात मुहर्रम से ही इस्लामी नववर्ष की शुरुआत होती है. इस साल 21 सितंबर को इसकी शुरुआत हो चुकी है. इस्लामी या अरबी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित है इसीलिए इसमें अंग्रेजी कैलेंडर की तुलना में हर साल 10 दिन कम हो जाते हैं और हर महीना 10 दिन पीछे हो जाता है. मुहर्रम इस्लामी वर्ष में रमजान के बाद सबसे पवित्र महीना समझा जाता है.

क्या है मुहर्रम का महत्व

मुस्लिम इतिहासकारों के मुताबिक मुहर्रम का महीना कई मायनो में खास है. एक तो इस महीने में पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब को अपना जन्मस्थान मक्का छोड़ कर मदीना जाना पड़ा जिसे हिजरत कहते हैं, दूसरे उनके नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिवार वालों की शहादत इसी महीने में हुई और इसी महीने में मिस्र का जालिम शासक फिरऔन अपनी सेना समेत लाल सागर में समा गया.

अल्लाह ने अपने पैगम्बर हज़रत मूसा और उनके अनुयायियों की रक्षा की. मुहर्रम शब्द 'हराम' या 'हुरमत' से बना है जिसका अर्थ होता है 'रोका हुआ' या 'निषिद्ध' किया गया. मुहर्रम के महीने में युद्ध से रुकने और बुराइयों से बचने की सलाह दी गई है.

मुहर्रम की मान्यताएं मुसलमानों के इतिहास से निकली हैं. जैसा कि सर्वविदित है कि पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के निधन के कुछ वर्षो बाद मुसलमान दो गिरोह में बंट गए थे. एक गिरोह उनके परिवार के सदस्यों के साथ हो गया जिसको इतिहास ने शिया के नाम से जाना और दूसरा गिरोह पैगम्बर की सुन्नतों की पैरवी करने लगा और जो बाद में सुन्नी कहलाए. शिया मुसलमान जहां मुहर्रम के पहले 10 दिनों में मातम करते हैं वहीं सुन्नी मुसलमान 9वीं, 10वीं और 11वीं तारीख़ के रोज़े रखते हैं.

इन रोज़ों के पीछे भी ऐतिहासिक कारण हैं. हज़रत मुहम्मद साहब ने जब अपने धर्म का प्रचार शुरू किया तो उन्होंने कहा कि वो कोई नया धर्म नही लाए बल्कि अल्लाह ने जो धर्म इब्राहीम, सुलेमान, मूसा और ईसा को दिया उसी धर्म की पैरवी करते हैं इसलिए सबको अपने सही रास्ते पे लौट आना चाहिए. मक्का के आम लोग उनकी सादगी और सच्चाई से प्रभावित हो कर बड़ी तादाद में उनके धर्म को अपनाने लगे. ये बात मक्का के शासक वर्ग को पसन्द नही आई. उनको लगा कि मुहम्मद जनता को इकट्ठा कर के उनके ख़िलाफ़ भड़का रहा है और एक दिन उनको तख्त से उतार कर ख़ुद मक्का का राजा बन जाएगा.

मुहम्मद साहब को रोकने के लिए मक्का के शासकों ने उनको तरह-तरह के प्रलोभन दिए मगर वो अपने रास्ते से नही हटे. ऐसे में मक्का के शासकों ने मुहम्मद साहब को क़त्ल करने का मंसूबा बनाया. मगर अल्लाह के दूत जिब्राईल फरिश्ते ने ये बात मुहम्मद साहब को बता दी और अल्लाह की ये मर्ज़ी भी उनको सुना दी कि अब उन्हें मक्का छोड़ कर मदीना के लोए रवाना हो जाना चाहिए.

मुहम्मद साहब अपने चचेरे भाई अली को अपने बिस्तर पर सुला कर मदीना के लिए रवाना हो गए. ये सफ़र ही हिजरत कहलाता है और ये घटना इसी मुहर्रम महीने में पेश आई. बाद में हज़रत अली जो कि मुहम्मद साहब के दामाद(बीबी फ़ातिमा के पति) भी थे इस्लाम के चौथे खलीफा बने और उन्ही के बेटे हज़रत हुसैन और उनके परिवार को इसी मुहर्रम महीने में शहीद कर दिया गया.

इतिहासकारों के मुताबिक जब पैगम्बर मुहम्मद साहब मक्का से हिजरत कर के मदीना गए तो उन्हें मालूम हुआ कि मदीना के यहूदी मुहर्रम की 10वीं तारीख का रोज़ा रखते हैं. हज़रत मुहम्मद साहब ने पूछा कि वो लोग ऐसा क्यों करते हैं तो पता चला कि ये लोग फ़िरऔन के जुल्म से हज़रत मूसा और उनके अनुयायियों की रक्षा के शुक्राने के तौर पर रोज़ा रखते हैं और अल्लाह को याद करते हैं.

हज़रत मुहमद साहब ने अपने लोगों कहा कि हम मूसा के ज्यादा करीब हैं इसलिए अब से हम भी ये रोज़ा रखेंगे और यहूदियों के एक रोज़े की तुलना में दो रोज़े रखने की सलाह अपने अनुयायियों को दी. तभी से मुसलमान मुहर्रम की 9, 10 और 11 तारीख़ों में दो दिन के रोज़े रखते हैं.

शिया-सुन्नी दोनों का है मुहर्रम

शिया मुसलमानों में ये रोज़े रखने की परंपरा नही बल्कि उनके यहां मुहर्रम की पहली तारीख से 10 तारीख़ तक मातम किया जाता है और यौमे आशूरा के दिन फाका(भूखा-प्यासा) किया जाता है. इस दौरान अपने शरीर को चाकुओं, छुरियों और भालों से घायल किया जाता है. सीने पर हाथ मार कर विलाप किया जाता है. फारसी में छाती पीटने को सीनाजनी और दुःख भरे गीत गाने को नोहाख्वानी कहते हैं.

दरअसल ऐसा कर के उस दुःख और उस गम को जानने, समझने और महसूस करने की कोशिश की जाती है जो नबी के नवासे हज़रत हुसैन और उनके परिवार के लोगों ने महसूस किया. इतिहास में ये सारी घटना कर्बला के वाकये के नाम से जानी जाती है. ये ऐतिहासिक घटना इस्लाम की सबसे दर्दनाक घटना के तौर पर याद की जाती है. ये दर्द सभी मुसलमानो का साझा दर्द है. शिया हो या सुन्नी हर मुसलमान इस वाक़ये को याद कर के सिहर जाता है और उस गमनाक मंजर की कल्पना मात्र से ही न सिर्फ खुद को मजबूर मानता है बल्कि उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है और उसके होंठ बरबस कह उठते हैं, 'ऐ हुसैन हम न थे'.

मुहर्रम का महीना नववर्ष की शुरुआत होने के बावजूद सेलेब्रेशन का नही बल्कि सोग और संताप का महीना है और यौमे आशूरा यानी मुहर्रम की दसवीं तारीख़ इस दुःख की इंतहा का दिन है.

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