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Holi 2018: कहीं रंग में न पड़ जाए भंग, सावधानी से उड़ाएं गुलाल

हिंदू मान्यताओं के मुताबिक सुस्ती दूर करने और लोगों में जोश भरने के लिए ही फाग और जोगीरा गाए जाते हैं

Updated On: Feb 23, 2018 08:28 AM IST

FP Staff

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Holi 2018: कहीं रंग में न पड़ जाए भंग, सावधानी से उड़ाएं गुलाल

होली रंगों का त्योहार है जो हिंदुस्तान के कोने-कोने में मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन खुद को भगवान मान बैठे हरिण्यकश्यप ने भगवान की भक्ति में रत अपने ही बेटे प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका के जरिए जिंदा जला देना चाहा था. पर हुआ कुछ और. भगवान ने भक्त पर अपनी कृपा की और प्रह्लाद के लिए बनाई चिता में खुद होलिका जल मरी. इसलिए होली से एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा है. होलिका दहन से अगले दिन रंगों से खेला जाता है इसलिए इसे रंगवाली होली और धुलैंडी भी कहा जाता है.

होली में सेहत का खयाल

होली ऐसे समय आती है जब मौसम तेजी से बदल रहा होता है. न ज्यादा सर्दी और न ज्यादा गर्मी. तभी इस दौरान सरद-गरम होने का खतरा बढ़ जाता है. नतीजतन ज्यादातर लोग सुस्ती से ग्रस्त निढाल पड़े दिखते हैं. हिंदू मान्यताओं के मुताबिक सुस्ती को दूर करने और लोगों में जोश भरने के लिए ही फाग और जोगीरा गाए जाते हैं. ढोल और मंजीरे की थाप पर लोग मस्ती करते दिखते हैं. पारंपरिक गीत-गाने का यह चलन पूरे शरीर में स्फूर्ति भरने में मददगार साबित होता है. फाग और जोगीरा जहां अंतरमन को खुश करता है, वही रंग इस खुशी में और चार-चांद लगा देता है. लेकिन इसमें सावधानी भी बरतनी काफी जरूरी है.

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

रंग न डाल दे भंग

रंग का त्योहार है, इसलिए रंगों का धंधा भी खूब चोखा चलता है. इस धंधे में जोर-शोर से कमाई बढ़ाने के लिए बड़े स्तर पर मिलावट भी होती है. रंग ज्यादा बिकें इसलिए उसमें केमिकल मिलाकर ज्यादा मात्रा में बनाने का सिलसिला शुरू होता है. लोग भी नहीं समझ पाते कि रंग असली है या नकली. ऐसे में सेहत पर बुरा असर पड़ना लाजिमी है.

तब नहीं होती थी मिलावट

अंधाधुंध कमाई के लिए रंगों में मिलावट नए जमाने का शौक है. पुराने जमाने में लोग ऐसा सोच भी नहीं सकते थे क्योंकि तब कुदरती तौर पर ऐसे कई इनग्रेडिएंट मौजूद थे जिससे तरह-तरह के रंग बनाए जाते थे. कुदरती इनग्रेडिएंट की बात करें तो हल्दी, नीम, पलाश (टेसू) आदि नाम प्रमुखता से गिने जा सकेंगे. ये रंग उड़ेले जाने के बाद मानव शरीर को एक प्रकार से लाभ ही पहुंचाते थे. न कि आज की तरह केमिकल वाले रंग जो शरीर को बदरंग कर देते हैं. कुदरती रंग उबटन के माफिक अपना असर छोड़ते थे जिससे मानव शरीर के आयन एक तरह से रिचार्ज हो जाते थे. आइए जानते हैं कुदरती रंग किन इनग्रेडिएंट से बनाए जाते थे.

हरा रंग-मेहंदी और गुलमोहर की सूखी पत्तियां, पतझड़ा की झाड़ियां, पालक के पत्ते, रोडोडेंडर की पत्तियां और पाइन की सुइयां

पीला रंग-हल्दी पाउडर, बेल का फल, अमलतास, गुलदाउदी, गेंदा, डेंडिलिज, सूरजमुखी, डैफोडील्स और डहेलिया

लाल रंग-गुलाब या सेब के पेड़ की छाल, लाल चंदन पाउडर, अनार का छिलका, पलाश के फूल, सुगंधित लाल चंदन पाउडर, मदार, गाजर आदि

गेरुआ रंग-टेसू के फूल, हल्दी पाउडर में नींबू का रस, बरबरी

नीला रंग- नील, बेरिया, अनार की प्रजातियां, नीले हिबिस्कस और जकरंद फूल

ब्राउन-सूखी चाय की पत्तियां, कत्था और लाल मैपल

काला रंग- अनार की कुछ प्रजातियां, अमला आदि

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

ऐसा करें ताकि रंगों का असर न हो

-रंगों का असर आपकी स्किन पर न हो, इसके लिए जरूरी है कि पूरे शरीर पर मॉइश्चराइजर, पेट्रोलियम जेली या नारियल का तेल लपेट लें.

-सिर के बाल और स्कैल्प पर जैतून, नारियल या अरंडी का तेल लगा लें. तेल में नींबू का रस मिला लें ताकि केमिकल रंग से न तो कोई इनफेक्शन हो या डैनड्रफ पनपे.

-कपड़ा ऐसा चुनें जो पूरे बदन को ढके. गहरे रंग वाले फुल स्लीव कपड़े पहनें. सिंथेटिक कपड़े चिपकेंगे और डेनिम भारी होगा, इसलिए ऐसे कपड़ों से बचें.

-चश्मा या लेंस न पहनें. अक्सर लोग चेहरे पर रंग पोतते हैं जिससे चश्मा या लेंस खराब हो सकते हैं.

-होली खेलने से पहले खूब पानी पिएं. इससे आपकी त्वचा में नमी बनी रहेगी.

-अगर किसी को दिल की बीमारी है तो उसे भांग या अल्कोहल पीने से बचना चाहिए. इसका ज्यादा इस्तेमाल हार्ट अटैक को न्योता दे सकता है.

होलिका और होली का मुहूर्त

1 मार्च-होलिका दहन मुहूर्त- 18:16 से 20:47 भद्रा पूंछ- 15:54 से 16:58 भद्रा मुख- 16:58 से 18:45 रंगवाली होली- 2 मार्च पूर्णिमा तिथि आरंभ- 08:57 (1 मार्च) पूर्णिमा तिथि समाप्त- 06:21 (2 मार्च)

(इनपुट ncsm.gov.in से)

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