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होलिका दहन से जुड़ी हैं कई मान्यताएं, इस दिन होता हैं सभी कष्टों का निवारण

ब्राह्मणों द्वारा सभी दुष्टों और सभी रोगों को शांत करने वाला वसोर्धारा-होम इस दिन किया जाता है, इसी लिए इसको होलिका भी कहते हैं.

Ashutosh Gaur Updated On: Feb 27, 2018 07:36 PM IST

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होलिका दहन से जुड़ी हैं कई मान्यताएं, इस दिन होता हैं सभी कष्टों का निवारण

होलिका दहन से संबंधित कई कथाएं जुड़ी हुई हैं. जिसमें से कुछ प्रसिद्ध कथाएं इस प्रकार हैं. कथाएं पौराणिक हो, धार्मिक हो या फिर सामाजिक, सभी कथाओं से कुछ न कुछ संदेश अवश्य मिलता है. इसलिए कथाओं में प्रतिकात्मक रूप से दिए गए संदेशों को अपने जीवन में ढालने का प्रयास करना चाहिए. इससे व्यक्ति के जीवन को एक नई दिशा प्राप्त हो सकती है.

होलिका कथा

एक बार महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण जी से प्रश्न किया कि फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली क्यों जलाई जाती है? और साथ ही उसके दूसरे दिन बसंत ऋतु का आगमन होता है, उस दिन दिन क्या करना चाहिए? भगवान श्री कृष्ण जी ने बताया कि हे पार्थ ! सतयुग में रघु नामक एक शूरवीर सर्वगुण संपन्न दानी राजा थे. उनके राज्य में सभी सुखी रहते थे. एक दिन नगर के लोग राजद्वार एकत्र होकर त्राहि,त्राहि पुकारने लगे , तब राजा ने सभी लोगों से इसका कारण पूछा. नगर वासियों ने बताया कि ढोंढा नाम की राक्षसी हर रोज उनके बालकों को कष्ट देती है. जिसके ऊपर किसी प्रकार का तंत्र-मंत्र, औषधि आदि का प्रभाव नही होता है. नगर वासियों की बात सुन राजा चिंतित हो गए, उन्होंने राज्यपुरोहित महर्षि वसिष्ठ मुनि जी से उस राक्षसी के विषय में पूछा, तब उन्होंने राजा को बताया राजन माली नामक एक दैत्य है. उसी की एक पुत्री है जिसका नाम ढोंढा है.

ढोंढा चरित्र

ढोंढा ने बहुत समय तक तपस्या करके शिव जी को प्रसन्न करके उनसे वरदान प्राप्त किया कि प्रभू, देवता, दैत्य, मनुष्य, आदि मुझे ना मार सकें तथा अस्त्र- शस्त्र आदि से भी मेरा वध न हो, साथ ही दिन में ,रात में, शीत काल में, उष्णकाल में और वर्षाकाल में, भीतर या बाहर कहीं भी मुझे किसी से भय न हो. इससे भगवान शिव जी ने तथास्तु कह कर यह भी कहा कि तुम्हें उंमत्त बालकों से भय रहेगा. वही ढोंढा नामक राक्षसी नित्य बालकों को कष्ट देती है. जो 'अडाडा' मंत्र का उच्चारण करने पर शांत हो जाती है.

महर्षि वसिष्ठ जी ने फिर उससे बचने का उपाय बताया--

राजन! आज फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को सभी लोगों को निडर होकर खेलना करनी चाहिए. बालक लकड़ियों से बनी तलवार लेकर वीर सैनिकों भांति खुशी से युद्ध के लिए निकलें और आनंद मनाएं. इसी के साथ सुखी लकड़ी, उपले, सुखी पत्तियां आदि एकत्र करके रक्षा मंत्रों से अग्नि प्रज्वलित करके हंसकर ताली बजाएं. जलती हुई लकड़ियों की 3 बार परिक्रमा करने  से बच्चों, बुजुर्गों को आनंद की प्रप्ति होगी. इस प्रकार हवन और कोलाहल करने से और साथ ही बालकों द्वारा तलवार से प्रहार करने से उस राक्षसी का निवारण होगा.

इस कथन को सुन कर राजन ने सम्पूर्ण राज्य में इस उत्सव को करने को कहा और स्वयं भी इसमे शामिल हुए, जिससे राक्षसी विनष्ट हो गई. तभी से यह ढोंढा उत्सव प्रसिद्ध हुआ और अडाडा की परंपरा चली आ रही है. ब्राह्मणों द्वारा सभी दुष्टों और सभी रोगों को शांत करने वाला वसोर्धारा-होम इस दिन किया जाता है, इसी लिए इसको होलिका भी कहते हैं.

सभी तिथियों का सार और परम आनंद देने वाली यह फाल्गुन पूर्णिमा तिथि है. इस दिन रात्रि को बालकों की विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए. घर में बालकों से लकड़ी से बनी तलवार से घर पर स्पर्श करना चाहिए , साथ ही उत्सव मनाना चाहिए उसके बाद बच्चों को मिठाई खिलानी चाहिए.

फिर भगवान श्री कृष्ण जी ने बताया कि होली के दूसरे दिन प्रतिपदा को प्रातः काल उठ के देवताओं लिए तर्पण पूजन करनी चाहिए और सभी दोषों की शांति लिए होलिका की विभूति की वंदना को शरीर में लगानी चाहिए.

होलिका दहन की एक कथा जो सबसे अधिक प्रचलन में है, वह हिर्ण्यकश्यप व उसके पुत्र प्रह्लाद की है.

प्रह्लाद होलिका दहन कथा

राजा हिर्ण्यकश्यप अहंकार वश स्वयं को ईश्वर मानने लगा. उसकी इच्छा थी की केवल उसी का पूजन किया जाए, लेकिन उसका स्वयं का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. पिता के बहुत समझाने के बाद भी जब पुत्र ने श्री विष्णु जी की पूजा करनी बंद नहीं कि तो हिरर्ण्यकश्यप ने अपने पुत्र को दण्ड स्वरूप नाना प्रकार दण्ड दिए फिर भी प्रह्लाद की आस्था और भक्ति कम नहीं हुई फिर उसे आग में जलाने का आदेश दिया. इसके लिए राजा ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को जलती हुई आग में लेकर बैठ जाए, क्योंकि होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी.

इस आदेश का पालन हुआ, होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ गई. लेकिन आश्चर्य की बात थी की होलिका जल गई, और प्रह्लाद नारायण का ध्यान करते हुए होलिका से बच गया. तभी से ये होलिका पर्व मनाया जाने लगा.

इस कथा से यही धार्मिक संदेश मिलता है कि प्रह्लाद धर्म के पक्ष में था और हिरण्यकश्यप व उसकी बहन होलिका अधर्म निति से कार्य कर रहे थे. अतंत: देव कृपा से अधर्म और उसका साथ देने वालों का अंत हुआ. इस कथा से प्रत्येक व्यक्ति को यह प्ररेणा लेनी चाहिए, कि प्रह्लाद प्रेम, स्नेह, अपने देव पर आस्था, द्र्ढ निश्चय और ईश्वर पर अगाध श्रद्धा का प्रतीक है. वहीं, हिरण्यकश्यप और होलिका ईर्ष्या, द्वेष, विकार और अधर्म के प्रतीक है.

यहां यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि आस्तिक होने का अर्थ यह नहीं है, जब भी ईश्वर पर पूर्ण आस्था और विश्वास रखा जाता है. ईश्वर हमारी सहायता करने के लिए किसी न किसी रुप में अवश्य आते हैं.

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