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दशहरा 2017: ...जहां रावण जलाया नहीं, मारा जाता है 

बाय गांव का दशहरा मेला कौमी एकता और सद्भाव की मिसाल है

Updated On: Sep 30, 2017 04:49 PM IST

Bhasha

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दशहरा 2017: ...जहां रावण जलाया नहीं, मारा जाता है 

विजयदशमी पर पूरे देश में बुराई के प्रतीक रावण के पुतले का वध अलग-अलग ढंग से किया जाता है. लेकिन राजस्थान के सीकर जिले के बाय गांव में रावण का पुतला नहीं बनाया जाता है, बल्कि रावण बने व्यक्ति का काल्पनिक वध किया जाता है.

सीकर जिले के दांतारामगढ़ के बाय गांव की पहचान दशहरे मेले के लिए देश भर में है. दक्षिण भारतीय शैली में होने वाले इस मेले को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते है. मेले की विशेषता यह है कि विजयदशमी के दिन राम रावण की सेना के बीच युद्ध होता है. इसमें बुराई के प्रतीक रावण का वध किया जाता है.

इससे पहले गांव के सीनियर स्कूल के मैदान में दोनों सेना आमने-सामने होती है. दोनों सेनाओं के बीच काल्पनिक युद्ध होता है, जिसमें रावण को मार दिया जाता है.

162 साल पहले हुई थी शुरूआत 

रावण की मृत्यृ के बाद शोभायात्रा निकाल कर विजय का जश्न मनाया जाता है. शोभायात्रा भगवान लक्ष्मीनाथ मंदिर पहुंच कर संपंन होती है. यहां भगवान की आरती की जाती है और नाच-गाकर उत्सव मनाया जाता है.

आयोजन समिति के मंत्री नवरंग सहाय भारतीय बताते हैं कि मेले में करीब 50 हजार से ज्यादा लोग शामिल होते है.

मंदिर के पुजारी रामावतार पाराशर के अनुसार मेले की शुरुआत करीब 162 साल पहले हुई थी. अंग्रेजों ने गांव वालों पर टैक्स लगा दिया था. इसके विरोध में गावंवासी एकजुट हो गए और अनशन शुरू कर दिया.

युद्ध में शामिल होते हैं दो सौ लोग 

गांव वालों के अनशन के आगे अंग्रेजों को झुकना पड़ा और टैक्स को हटाया गया. इस आंदोलन में जीत के उपलक्ष्य में विजयादशमी मेला शुरू किया गया जो आज तक जारी है.

उन्होने बताया कि काल्पनिक युद्ध में करीब दो सौ लोग शामिल होते हैं. इसमें सभी जाति धर्म के लोग खुले दिल से सहयोग करते हैं.

पुजारी रामावतार पाराशर के अनुसार बाय का दशहरा मेला कौमी एकता और सद्भाव की मिसाल है. मेले में गांव के मुस्लिम भी सक्रिय भागीदारी निभाते हैं. वे आयोजन की व्यवस्था में हर तरह से खुल कर सहयोग करते हैं.

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