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पुण्यतिथि विशेष गुरु नानकदेव: 'सबकौ लोहू एक है, साहिब फरमाया'

गुरु नानकदेव के उपदेशों को आज के नजरिए से देखें तो शायद बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता के दौर में इनकी जरूरत कुछ ज्यादा ही है

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Sep 22, 2017 08:58 AM IST

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पुण्यतिथि विशेष गुरु नानकदेव: 'सबकौ लोहू एक है, साहिब फरमाया'

सिख धर्म भारत के सबसे नए धर्मों में से एक है. इस धर्म की स्थापना गुरु नानक देव ने की थी. सिख धर्म एकेश्वरवादी धर्म है. अक्सर ऐसा कहा और माना जाता है कि सिख धर्म का उदय इस्लाम के एकेश्वरवाद के प्रभाव में हुआ. हालांकि यह भी एक तथ्य है कि इस्लाम के आने से पहले भी भारत में एकेश्वरवाद या सिर्फ एक ही ईश्वर को मानने वाले कई धर्मों जैसे बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ था.

बौद्ध-जैन के साथ-साथ सिद्धों-नाथों की एक परंपरा भी थी जो एक ईश्वर में विश्वास करते थे और जातिप्रथा का विरोध करते थे. लेकिन इन धर्मों और संप्रदायों को इनके विधि-विधान की जटिलता की वजह से आम जनता में कोई खास लोकप्रियता नहीं मिली.

भारत के मध्यकालीन इतिहास में दो खास घटनाएं घटित हुईं. पहला दक्षिण भारत में भक्ति-आंदोलन का उदय हुआ और दूसरा भारत संगठित धर्म के रूप में इस्लाम का प्रवेश हुआ. दक्षिण का भक्ति आंदोलन जातिप्रथा और छुआछुत की प्रथा के खिलाफ खड़ा हुआ एक धार्मिक-सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन था.

इस्लाम और भारतीय परंपरा का समन्वय

इसी तरह भाईचारे पर आधारित एक नए धर्म से भारतीयों का परिचय हुआ. इस्लाम के एकेश्वरवाद और भेदभाव रहित व्यवस्था ने तथाकथित निम्न जाति की जनता को आकर्षित किया. इस आकर्षण की मुख्य वजह यह थी कि इस्लाम को समझना और इसका पालन करना जातिप्रथा के खिलाफ खड़े हुए धर्मों और संप्रदायों की तुलना में गृहस्थ जनता के लिए आसान था.

उपर्युक्त बातों का जिक्र इसलिए किया गया है क्योंकि बिना इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जाने गुरु नानकदेव की खासियत को समझना मुश्किल है. गुरु नानकदेव से जुड़ी चमत्कारिक कथाएं अपनी जगह हैं. इस तरह की कथाएं भक्तिकाल के कई संतों और गुरुओं के बारे में भी हैं लेकिन सिर्फ गुरु नानकदेव ही ऐसे संत हुए जिनके उपदेशों और शिक्षाओं के आधार पर एक ऐसे धर्म का उदय हुआ जिसके अनुयायी दुनियाभर में फैले हुए हैं.

गुरु नानक ने अपने से पहले के निर्गुण संतों जैसे कबीर आदि के उपदेशों और शिक्षाओं को आत्मसात करके अपने मत का प्रचार किया. गुरु नानकदेव ने हिंदू धर्मस्थलों के साथ-साथ मुस्लिम धर्मस्थलों की यात्रा की थी. इस वजह से दोनों धर्मों की शक्ति और कमजोरी को समझते थे.

गुरु नानक इस बात को समझते थे कि जाति प्रथा के विरोध में अभी तक जितने मत या धर्म पैदा हुए हैं, उनका पालन करना आन जनता के लिए कठिन था. इस वजह से उन्होंने उन्होंने जाति प्रथा के विरोध की भारतीय परंपरा और इस्लाम के भाईचारे के भाव का अपने उपदेशों में समन्वय किया.

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दोहों और पदों से कहीं अपनी बातें

मध्यकालीन निर्गुण संतों की तरह गुरु नानकदेव ने भी अपनी बातों को जनता में फैलाने के लिए दोहों और पदों का सहारा लिया. गुरु नानक ने सांसारिक माया जाल से बचने की शिक्षा अपने पदों और दोहों में जरूर दी है लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि इसके लिए जंगल या वन जाने की जरूरत नहीं है. ऐसा कहकर गुरु नानकदेव उस प्राचीन भारतीय मान्यता का विरोध कर रहे थे जिसमें संसार के माया-मोह से छूटने का एकमात्र रास्ता संन्यासी बनना माना जाता था.

काहे रे बन खोजन जाई। सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई॥

पुष्प मध्य ज्यों बास बसत है, मुकर माहि जस छाई। तैसे ही हरि बसै निरंतर, घट ही खोजौ भाई॥

बाहर भीतर एकै जानों, यह गुरु ग्यान बताई। जन नानक बिन आपा चीन्हे, मिटै न भ्रमकी काई॥

गुरु नानकदेव के समय भेदभाव का काफी जोर था. ऐसे में गुरु नानकदेव कहते हैं कि सभी के लहू का रंग एक है और धर्म-जाति आदि के आधार पर भेदभाव बेकार है.

मुरसिद मेरा मरहमी, जिन मरम बताया। दिल अंदर दिदार है, खोजा तिन पाया॥

तसबी एक अजूब है, जामें हरदम दाना। कुंज किनारे बैठिके, फेरा तिन्ह जाना॥

क्या बकरी क्या गाय है, क्या अपनो जाया। सबकौ लोहू एक है, साहिब फरमाया॥

पीर पैगम्बर औलिया, सब मरने आया। नाहक जीव न मारिये, पोषनको काया॥

हिरिस हिये हैवान है, बस करिलै भाई। दाद इलाही नानका, जिसे देवै खुदाई॥

अगर गुरु नानकदेव के उपदेशों को आज के नजरिए से देखें तो शायद बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता के दौर में इनकी जरूरत कुछ ज्यादा ही है.

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