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हज इस्लाम का बुनियादी स्तंभ है और एक अहम इबादत भी

दुनियाभर के मुसलमान एक जगह जमा होकर एक ईश्वर में आस्था प्रकट करते हैं और उसकी इबादत करते हैं.

Updated On: Sep 01, 2017 02:23 PM IST

Asif Khan

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हज इस्लाम का बुनियादी स्तंभ है और एक अहम इबादत भी

हज इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभों में से एक है और पांचवें या अंतिम स्थान पर आता है. इसकी वजह ये है कि नमाज़ और रोज़े की बनिस्बत हज हर मुसलमान पर फ़र्ज़ नही बल्कि जो हज करने की क्षमता (इस्तेताअत) रखता है वही हज कर सकता है. हज की यात्रा पर शारिरिक क्षमता के साथ-साथ आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री और पुरुष ही जा सकते हैं.

इस्लामी या अरबी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित होता है. इस कैलेंडर के आखिरी महीने यानी ज़िलहिज्जा की 8 से 12 तारीख़ तक हज अदा किया जाता है. हज के लिए दुनिया भर से आए मुसलमान सऊदी अरब के मक्का शहर में इकठ्ठा होते हैं. जहां पांच दिन तक चलने वाले आयोजन में मक्का स्थित मस्जिद अल-हरम के अलावा अल-सफ़ा और अल-मरवा की पहाड़ियों पर इबादत की जाती है. मस्जिद अल-हरम दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद है जिसमें एक साथ नौ लाख लोग नमाज़ पढ़ सकते हैं जबकि हज के दौरान तो ये संख्या 40 लाख तक पहुंच जाती है.

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मस्जिद अल-हरम के बीच में स्थित काबा के सात चक्कर लगाए जाते हैं. ये चक्कर वामावर्त (एंटी क्लॉकवाइज़) दिशा में लगाए जाते हैं. तवाफ़-ए-काबा हज्रे अस्वद (काला पत्थर) से शुरू होता है. हर हाजी इस दौरान अल्लाह की बड़ाई करता है और दिल में अपने तमाम गुनाहों की माफ़ी मांगता है.

हर साल लगभग 40 लाख हजयात्री मक्का में जमा होते हैं जो किसी वार्षिक धार्मिक आयोजन के लिए इकठ्ठा होने वाली सबसे बड़ी भीड़ है. कुम्भ के स्नान पर इससे ज़्यादा लोग होते हैं लेकिन वो वार्षिक नहीं है. इस साल सऊदी हुकूमत ने भारत के हजयात्रियों का कोटा बढ़ाकर एक लाख सत्तर हज़ार कर दिया है. जिसे कुछ वर्ष पहले मस्जिद अल-हरम के विस्तार कार्यक्रम के चलते 20 फीसद कम कर दिया गया था.

हज के दौरान हाजी जो लिबास पहनते हैं वो अहराम कहलाता है और कहीं से सिला हुआ नहीं होता. एक चादर शरीर के ऊपर के हिस्से के लिए होती है और दूसरी नीचे के हिस्से के लिए.

हज के दौरान हाजी जो लिबास पहनते हैं वो अहराम कहलाता है और कहीं से सिला हुआ नहीं होता. एक चादर शरीर के ऊपर के हिस्से के लिए होती है और दूसरी नीचे के हिस्से के लिए.

वैसे तो मौजूदा हज यात्रा पैगंबर मोहम्मद साहब के दौर में शुरू हुई थी लेकिन मुसलमानों का विश्वास है कि इसकी शुरुआत आज से चार हज़ार साल पहले पैगम्बर इब्राहीम ने की थी. पैगम्बर इब्राहीम ने ही काबा की बुनियाद डाली थी जो आज भी उसी जगह मौजूद है.

कहते हैं जब अल्लाह के हुक्म से पैगम्बर इब्राहीम अपनी पत्नी हाजरा और बेटे इस्माईल को मक्का घाटी में छोड़ गए तो प्यास और भूख से बेहाल हाजरा अल-सफ़ा और अल-मरवा पहाड़ियों के बीच चक्कर लगाने लगी. बच्चा इस्माईल रो-रोकर ज़मीन पर एड़ियां रगड़ने लगा तभी अल्लाह के हुक्म से वहां पानी का एक चश्मा फूट पड़ा जो आज तक जारी है. इसे ज़मज़म कहते हैं. ज़मज़म कुएं की गहराई 30 मीटर है. जो काबे से महज़ 20 मीटर की दूरी पर है. दुनियाभर के मुसलमान हज और उमरे के दौरान मक्का जाते हैं और ज़मज़म कुएं का पानी न सिर्फ़ इस्तेमाल करते है बल्कि अपने साथ लाते भी हैं. ये पानी करिश्माई पानी है जो कभी ख़राब नही होता और कई बीमारियों के इलाज में भी काम आता है.

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हज के दौरान हाजी जो लिबास पहनते हैं वो अहराम कहलाता है और कहीं से सिला हुआ नहीं होता. एक चादर शरीर के ऊपर के हिस्से के लिए होती है और दूसरी नीचे के हिस्से के लिए. इस लिबास में सब इंसान एक नज़र आते हैं. ऊंच-नीच के सारे फ़र्क़ ख़त्म हो जाते हैं. सिर्फ एक जज़्बा काम करता है और वो होता है कि सारे इंसान आपस में बराबर हैं. कोई किसी से बड़ा नही कोई किसी से छोटा नही.

हज़यात्री नमाज़ अदा करने के बाद अपना सिर मुड़ाते हैं.

हजयात्री नमाज़ अदा करने के बाद अपना सिर मुड़ाते हैं.

हज के दौरान शैतान को कंकड़ मारने की रस्म भी अदा की जाती है जो रमी अल-जमारात कहलाती है. हज के आखरी दिन तमाम हाजी अपने सर मुंडवाते (महिलाएं चोटी के बाल एक उंगली की गोलाई में) हैं. इसके बाद क़ुर्बानी करते हैं. मुसलमानो की मान्यता है कि हर सक्षम मुसलमान को जीवन में एक बार हज ज़रूर करना चाहिए.

हर धार्मिक आयोजन की तरह हज का भी कई सरोकार समेटे हुए है. सबसे अहम ये कि दुनियाभर के मुसलमान एक जगह जमा होकर एक ईश्वर में आस्था प्रकट करते हैं और उसकी इबादत करते हैं. इसके अलावा अलग-अलग रंग, नस्ल, भाषा और संस्कृति के मानने वाले लोग आपस में भाईचारे और एकता की मिसाल पेश करते हैं. अल्लाह की राह में अपनी मेहनत की कमाई खर्च करते हुए उसका शुक्रिया अदा करते हैं और क़ुर्बानी देकर ये महसूस करते हैं कि ये जान और ये माल सब अल्लाह के हैं और हमें उसी की तरफ लौट के जाना है.

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