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बकरीद 2018: कुर्बानी का असली मकसद समझना है तो उलेमा से नहीं कुरान से समझें

कुरान में साफ तौर पर हाजियों के लिए कुर्बानी का हुक्म है. लेकिन उलेमा ने गैर हाजियों के लिए भी कुर्बानी फर्ज़ की तरह ज़रूरी कर रखा है. तो इसके कारण धार्मिक से ज्यादा आर्थिक है

Updated On: Aug 22, 2018 09:58 AM IST

Yusuf Ansari

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बकरीद 2018: कुर्बानी का असली मकसद समझना है तो उलेमा से नहीं कुरान से समझें
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ईद-उल-अज़हा से पहले कुछ प्रगतिशील मुसलमानों ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि इस बार वो बकरे की कुर्बानी नहीं करेंगे. उसकी रक़म केरल बाढ़ पीडितों की मदद के लिए भेजेंगे. साथ ही उन्होंने मुसलमानों से भी ऐसा ही करने की अपील की. मैंने भी फेसबुक पर ऐसी ही अपील की थी. मैंने यह भी लिखा कि अगर आपको लगता है कि कुर्बानी करना ज़रूरी ही है और आप एक से ज्यादा कुर्बानी करते हैं तो एक कुर्बानी कीजिए और बाक़ी रक़म आप केरल बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए भेज सकते हैं.

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों की इस अपील से मौलवियों को इस्लाम के नाम पर चलाई जा रहीं अपनी दुकानें उजड़ने का खतरा पैदा हो गया. सोमवार को स्वंय घोषित मुफ़्ती-ए-आज़म, फ़क़ीहुल असर, राष्ट्रीय सचिव ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, महासचिव इंडियन फ़िक़्ह अकेडमी मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने बाक़ायदा एक बयान जारी करके इस मशविरे को मुसलमानों को गुमराह करने वाला करार दे दिया. इस बयान में कहा गया है कि सोशल मीडिया पर चल रही कुछ लिबरल मुसलमानों की इस मुहिम से आम लोग इस पसोपेश में पड़ गए हैं कि वो क़ुर्बानी करें या केरल बाढ़ पीड़ितों की मदद?

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मौलाना रहमानी ने आगे कहा कि क़ुर्बानी इस्लाम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी इस्लाम में बहुत अधिक अहमियत है. पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम की तरफ से अल्लाह को राज़ी करने के लिये इकलौते बेटे हज़रत इस्माईल की क़ुर्बानी और अल्लाह की तरफ से हज़रत इस्माईल की जगह मेंढा की क़ुर्बानी की यादगार है. आख़िरी पैग़बर हज़रत मोहम्मद (सअव) साहब ने इसे सुन्नत-ए-इब्राहीमी बताया है.

मौलाना रहमानी ने कहा कि हज़रत मोहम्मद (सअव) हर साल क़ुर्बानी किया करते थे. आखिरी हज के मौके पर रसूल अल्लाह ने 100 ऊंटनियों की क़ुर्बानी दी थी. सदक़ा करना और गरीबों की मदद करना बहुत सवाब का काम है. लेकिन बकरीद के दिनों में मोहम्मद सलल्लाहू अलैहि व्सल्लम के अनुसार क़ुर्बानी श्रेष्ठ काम है. मौलाना रहमानी ने अपने बयान में कहा कि क़ुर्बानी का जो सवाब है वो बाढ़ पीड़ित लोगों की मदद करके हासिल नहीं हो सकता है. मौलाना रहमानी ने मुसलमानों को कुर्बानी से अलग, बाढ़ पीड़ितों की मदद करने की सलाह दी है.

कुर्बानी के जानवरों की खाल का पैसा मदरसों की मदद के लिए दिया जाता है. अगर सोशल मीडिया की अपील पर एक लाख लोग भी अपनी कुर्बानी का पैसा बाढ़ पीड़ितों को भेज देते हैं, तो इस्लाम के नाम पर चलने वाले संगठनों को कई करोड़ का नुकसान होगा. और अगर यह चलन बन गया तो हर साल कुर्बानी का पैसा लोग कभी बाढ़ पीड़ितों को भेजेंगे, कभी सूखा पीड़ितों और कभी भूकंप पीड़ितों को भेज देंगे. इस तरह चंद लोगों की अपील से मौलवियों को अपनी दुकानों के स्थाई नुकसान का ख़तरा पैदा हो गया है. लिहाज़ा मुसलमानों को बताया जा रहा है कि ईद-उल-अज़हा पर अल्लाह को जानवरों की कुर्बानी के अलावा कोई और अमल पसंद नहीं है.

आइए, अब मौलवी दुनिया के इस दावे को कुरान और हदीस की कसौटी पर परखते हैं. मौलवी दुनिया के मुताबिक क़ुर्बानी हर साहिब-ए-निसाब का फर्ज़ है. यानी हर उस शख्स पर फर्ज़ है जिस पर ज़कात फर्ज़ है. मौलवी दुनिया के मुताबिक साहिब-ए-निसाब वो है जिसके पास अपने साल भर की ज़रूरतें पूरी करने के बाद 7.5 तोले (87.5 ग्राम) सोना या 52 तोले (612.36 ग्राम) चांदी या इतनी क़ीमत का कोई और कारोबारी सामान या नक़दी हो. शर्त यह है कि यह बचत उसके पास सालभर रहे.

यह फॉर्मूला अपने आप में विरोधाभासी है. अगर किसी के पास 80 ग्राम सोना होगा तो करीब ढाई लाख की बचत के बावजूद उस पर न ज़कात फर्ज़ होगी और न ही कुर्बानी. लेकिन अगर किसी के पास एक किलोग्राम चांदी होगी तो मात्र 32 हज़ार रुपए बचत पर ही उस पर ज़कात और कुर्बानी दोनों फर्ज़ हो जाती है. जब से इस फार्मूले पर सवाल उठने शुरू हुए हैं, तब से उलेमा साहिब-ए-निसाब के लिए चांदी वाले फार्मूल पर ही ज़ोर देती है.

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यूं तो जानवर की कुर्बानी को पैग़ंबर हज़रत इब्राहिम से जोड़ा जाता है. लेकिन मौलवी हज़रात इसे पैग़ंबर मुहम्मद (सअव) की सुन्नत भी बताते हैं और अपने दावे के पक्ष में कुछ हदीस पेश करते हैं. जमाते इस्लाम के संस्थापक मौलाना सैयद अबु आला मौदूदी साहब लिखते हैं, 'नबी (सअव) नदीना तैयबा के पूरे ज़माना क़ियाम में हर साल ईद-ल-अज़हा के मौक़े पर कुर्बानी करते रहे और मुसलमानों में आप ही की सुन्नत से यह तरीक़ा जारी हुआ... पर, यह बात शक ओ शुबह से बालातर है कि ईद-उल-अज़हा के मौके पर दुनिया भर में आम मुसलमान जो कुर्बानी करते हैं, ये नबी(सअव) की ही सुन्नत है.' (तफ़्हीमुल हदीस, जिल्द चार पेज 331).

एक हदीस के मुताबिक, हज़रत अनस (र) फरमाते हैं, 'रसूल अल्लाह ईद-उल अज़हा के दिन हर साल दो मेढ़ें एक काला और एक सफेद अपने हाथ से ज़िबह करते थे.' एक अन्य हदीस में कहा गया है कि हज के मौके पर रसूल अल्लाह ने 100 ऊंटनियों की कुर्बानी दी थी. ये दोनों हदीसें सही बुखारी समेत तमाम सही हदीसों में है. इन दावों को दूसरी हदीसों से परखने पर कुर्बानी को लेकर विरोधाभास सामने आता है.

हदीसों की किताबों में ऐसी हदीसों की भरमार है जिनमें बताया गया है कि पैगंबर मुहम्मद (सअव) ने अपने परिवार के साथ बेहद ग़रीबी में ज़िंदगी गुज़ारी. एक हदीस के मुताबिक, 'मुहम्मद (सअव) के घर वालों के पास कभी शाम को एर साअ (चार किलो) गेहूं ग़ल्ला जमा नहीं रहा. हालांकि उनकी नौ बीवियां थी. (1940, किताबुल बुयूअ बाब-शिराअननबी (सअव). एक और हदीस में हज़रत आयशा (र) फरमाती हैं, 'हम मुहम्मद (सअव) के घर वाले ऐसे थे कि एक-एक महीना आग नहीं जलाते थे. यानी कुछ नहीं पकाते थे. हमारी खुराक सिर्फ पानी और खजूर थी.' (तिर्मिज़ी जिल्द दोयम पेज 103 और 4144 इब्ने माज़ा जिल्द तीन) एक और हदीस के मुताबिक हज़रत आयशा फरमाती हैं, 'जब रसूल अल्लाह की वफात हुई तब आपकी ज़िरह (Military Iron Dress) एक यहूदी के पास 30 साअ (120 किलोग्राम) जौ के बदले गिरवी थी.' (1578, सही बुखारी, 2439, इब्ने माज़ा जिल्द दोयम).

यहां सवाल पैदा होता है कि जब नबी (सअव) इतनी ग़ुरबत में थे तो वो हर सावल दो बकरों या मेढ़ों की कुर्बानी कैसे करते थे. आखिर हज से लौटने के दो महीने बाद ही रसूल अल्लाह की वफात हो गई थी. हदीस के मुताबिक अपनी वफात के वक्त वो कर्ज़दार थे. ऐसे में हज के मौक़े पर 100 ऊंटनियों की कुर्बानी का दावा गले नहीं उतरता. अगर यह दावा सच है तो फिर सवाल यह पैदा होता है कि हज में 100 ऊंटनियों की कुर्बानी करने वाले रसूल अल्लाह के सामने आखिर ऐसे हालात कैसे बने कि उन्हें घर का खर्च चलाने के लिए अपनी ज़िरह गिरवी रखनी पड़ी. इन सवालों पर उलेमा बगले झांकने लगते हैं. जवाब देने के बजाए मुसलमानों का मुंह यह कहकर बंद कर दिया जाता है कि इस्लाम में अक़्ल का दखल हराम है.

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उलेमा हज़रात कुरान की आयतों का हवाला देकर कुर्बानी को साहिब-ए-निसाब पर फर्ज़ करार देते हैं.

पहली- कुरान की 108वीं सूराः अलकौसर इसमें कहा गया है, 'बेशक हमने तुन्हें कैसर अता की है. इसे अमल में लाओ और नहर (बड़ी कुर्बानी) करो. तुम्हारा दुश्मन ही जड़कटा (बेनामो निशान) होगा.' मौलवी हज़रात कहते हैं कि इसमें ईद-उल अज़हा पर कुर्बानी का हु्क्म दिया गया है. सच्चाई यह है कि यह सूराः उस वक्त नाज़िल हुई थी जब नबी (सअव) के दो बेटों क़ासिम और अब्दुल्लाह की वफात के बाद उनके चचा अबू लहब ने सरे आम उन्हें ताना मारा था कि मुहम्मद की नस्ल आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं बचा. तब इस सूराः के ज़रिए अल्लाह ने नबी को कुरान के मुताबिक निज़ाम कायम करने और उसके लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने का हुक्म देते हुए कहा था कि ऐसा होने पर तुम्हें जड़कटा कहने वाले ही जड़कटे होंगे.

कुरान में कई और आयतों में नबी ने कहा है कि मेरी इबादत और मेरी कुर्बानी अल्लाह के ही लिए है. इन आयतों कुर्बानी से मुराद जानवर की कुर्बानी से न होकर इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए खर्च किए जा रहे वक्त और तमाम दूसरे संसाधनों से है. कुरान में जानवर की कुर्बानी का हुक्म सिर्फ हाजियों के लिए है.

सूराः अल बक़रा की आयत न. 196 में साफ-साफ कहा गया है, 'और हज और उमरा जो कि अल्लाह के लिए हैं, पूरे करो. फिर यदि तुम घिर जाओ तो जो क़ुर्बानी उपलब्ध हो पेश कर दो. और अपने सिर न मूंड़ो जब तक कि क़ुर्बानी अपने ठिकाने पर न पहुंच जाए, किन्तु जो व्यक्ति बीमार हो या उसके सिर में कोई तकलीफ़ हो तो रोज़े या सदक़ा या क़ुरबानी के रूप में फ़िदया देना होगा. फिर जब तुम पर से ख़तरा टल जाए, तो जो व्यक्ति हज तक उमरे से लाभान्वित हो, तो जो क़ुर्बानी उपलब्ध हो पेश करे, और जिसको उपलब्ध न हो तो हज के दिनों में तीन दिन के रोज़े रखे और सात दिन के रोज़े जब तुम वापस हो, ये पूरे दस हुए. यह उसके लिए है जिसके बाल-बच्चे मस्जिदे-हराम के निकट न रहते हों. अल्लाह का डर रखो और भली-भांति जान लो कि अल्लाह कठोर दंड देने वाला है.'

कुरान में साफ तौर पर हाजियों के लिए कुर्बानी का हुक्म है. लेकिन उलेमा ने गैर हाजियों के लिए भी कुर्बानी फर्ज़ की तरह ज़रूरी कर रखा है. तो इसके कारण धार्मिक से ज्यादा आर्थिक है. मुस्लिम संगठनों के लिए रमज़ान में ज़कात बटोरने के बाद कुर्बानी के जानवरों की खाल बटोर कर कमाई करने का बढ़िया मौका होता है. मोटे अंदाज के मुताबिक देश में ईद-उल-अज़हा पर 2 करोड़ से ज्यादा जानवरों की कुर्बानी होती है. जानवरों की खाल के लिए मदरसा चलाने वाले संगठनों के बीच खूब खींचतान होती है.

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इसीलिए मस्जिद के इमामों से लेकर बड़े मुफ्ती और उलेमा तक ईद-उल-अज़हा के मौके पर सिर्फ कुर्बानी पर ही ज़ोर देते हैं. खाल के चक्कर में ऐसे लोगों से भी कुर्बानी करा देते हैं जिनकी हैसियत भी नहीं होती. जितनी ज़्यादा कुर्बानी होगी उतनी ही ज़्यादा खालें मदरसों और उन्हें चलाने वाले संगठनों को मिलेंगी. अगर मुसलमान कुर्बानी का पैसा कहीं और खर्च करेंगे तो उन्हें इसका सीधा नुकसान होगा.

एक जानवर की औसत क़ीमत 10 हजा़र माने तो मुसलमान समाज के बहैसियत लोग इस मौक़े पर 20 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करते हैं. मौलवियों के किए ब्रेनवॉश की वजह से एक परिवार में कई-कई कुर्बानियां भी होती हैं. बढ़-चढ़कर कुर्बानी करने वाले मुसलमान अगर अपनी कुर्बानी का आधा बजट ग़रीब मुसलमानों को रोज़गार दिलाने, उनके लिए बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने पर खर्च करें, तो मुस्लिम समाज को अपने विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों का मुंह नहीं देखना पड़ेगा.

इसके लिए ज़रूरी है कि मुसलमान कुर्बानी का असली मकसद और मतलब उलेमा के नज़रिए से समझने के बजाय सीधे क़ुरान से समझें.

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