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अहोई अष्टमी 2018: जानिए किस मुहूर्त पर होगी पूजा, पढ़ें व्रत कथा

अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी दिवाली से सिर्फ 7 दिन पहले मनाई जाती है. या यूं कहे कि ये व्रत करवा चौथ के 4 दिन बाद मनाया जाता है

Updated On: Oct 31, 2018 12:51 PM IST

FP Staff

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अहोई अष्टमी 2018: जानिए किस मुहूर्त पर होगी पूजा, पढ़ें व्रत कथा
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करवा चौथ के ठीक 4 दिन बाद अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है. ये व्रत संतान की लंबी आयु को लेकर होता है. इस साल ये व्रत बुधवार यानी 31 अक्टूबर को किया जाएगा. हालांकि कुछ लोग ये व्रत गुरुवार को भी करेंगे. संतान के सुखी जीवन के लिए किया जाने वाले इस व्रत का काफी महत्व है. कुछ महिलाएं संतान प्रप्ति के लिए भी ये व्रत रखती है.

किसके लिए रखा जाता है व्रत?

इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन व्रत रखा जाता है. उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान में महिलाएं बड़ी निष्ठा के साथ इस व्रत को करती हैं. इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं घर की दीवार पर अहोई का चित्र बनाती हैं.

इस व्रत की क्या है मान्यता?

कहा जाता है कि अहोई अष्टमी का व्रत करने से अहोई माता खुश होकर बच्चों की सलामती का आशीर्वाद देती हैं. इस व्रत में महिलाएं तारों और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोलती हैं.

अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी दिवाली से सिर्फ 7 दिन पहले मनाई जाती है. या यूं कहे कि ये व्रत करवा चौथ के 4 दिन बाद मनाया जाता है.

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि

- सुबह उठकर स्नान कर निर्जला व्रत करें.

- सूरज ढलने के बाद अहोई पूजा की जाती है.

- पूजा के दौरान अहोई कलेंडर और करवा लेकर पूजा करें.

- कथा सुननें के बाद अहोई की माला दिवाली तक पहननी चाहिए.

क्या है अहोई अष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त?

31 अक्टूबर यानी बुधवार को अहोई अष्टमी की पूजा शाम 6 बजे से 7 बजे के बीच की जाएगी.

अहोई अष्टमी की व्रत कथा:

पुराने समय में एक शहर में एक साहूकार के 7 लड़के रहते थे. साहूकार की पत्नी दिवाली पर घर लीपने के लिए अष्टमी के दिन मिटटी लेने गई. जैसे ही उसने कुदाल चलायी वो सेह की मांद में जा लगी, जिससे कि सेह का बच्चा मर गया. साहूकार की पत्नी को इसे लेकर काफी पश्चाताप हुआ. इसके कुछ दिन बाद ही उसके एक बेटे की मौत हो गई, इसके बाद एक-एक करके उसके सातों बेटों की मौत हो गई. इस कारण साहूकार की पत्नी शोकाकुल रहने लगी. उसने अपनी पड़ोसी औरतों को रोते हुए अपना दुःख कह सुनाया.

जिसपर औरतों ने उसे सलाह दी कि यह बात साझा करने से तुम्हारा आधा पाप कट गया है. अब तुम अष्टमी के दिन सेह और उसके बच्चों का चित्र बनाकर मां भगवती की पूजा करो और क्षमा याचना करो. भगवान की कृपा हुई त तुम्हारे पाप कट जाएंगे. ऐसा सुनकर साहूकार की पत्नी हर साल कार्तिक मास की अष्टमी को मां अहोई की पूजा व व्रत करने लगी. कई साल बाद उसके सात बेटे हुए. तभी से अहोई अष्टमी का व्रत चला आ रहा है. इस व्रत कथा से हमें इस बात की प्रेरणा मिलती है कि हमें जीव-जंतुओं के प्रति दया भाव रखना चाहिए और अहिंसा के रास्ते पर चलना चाहिए. ऐसा भी माना जाता है कि यदि इस दिन संतान सुख से वंचित लोग गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले राधाकुंड में स्नान करते हैं तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है.

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