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संकष्टी चतुर्थी: सबसे पहले गणेश पूजा करने के पीछे है ये मजेदार कहानी

आषाढ़ माह के तीसरे दिन भगवान श्री गणेश ने देवताओं को कष्ट में से निकाला था. तभी से आषाढ़ माह के तीसरे दिन संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है

Sudhanshu Gaur Updated On: Jun 30, 2018 06:23 PM IST

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संकष्टी चतुर्थी: सबसे पहले गणेश पूजा करने के पीछे है ये मजेदार कहानी

1 जुलाई को इस बार हिंदू कैलेंडर के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का त्यौहार मनाया जाएगा. माना जाता है कि आषाढ़ माह के तीसरे दिन भगवान श्री गणेश ने देवताओं को कष्ट में से निकाला था. तभी से आषाढ़ माह के तीसरे दिन संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है.

इस त्यौहार को मनाने के पीछे की कहानी कुछ यूं है. कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु का विवाह लक्ष्‍मीजी के साथ तय हो गया था. और उनके विवाह की तैयारी होने लगी थीं. सभी देवताओं को भोज के निमंत्रण भेजे गए, परंतु इस भोज में भगवान गणेश को निमंत्रण नहीं दिया गया, इसका कारण जो भी रहा हो लेकिन इस भोज में गणेश जी को नहीं बुलाया गया.

जब भगवान विष्णु की बारात जाने का समय आ गया. सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आए. उन सबने देखा कि भगवान गणेश इस विवाह समारोह कहीं नजर नहीं आ रहे हैं. तब वे सभी आपस में चर्चा करने लगे कि क्या भगवान गणेश को इस समारोह में नहीं बुलाया गया है? या फिर खुद भगवान गणेश ही नहीं आए हैं? सभी को इस बात पर अचंभा हुआ कि भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की शादी समारोह में गणेश जी शामिल नहीं हुए हैं. तभी सबने विचार किया कि क्यों ना इस बारे में खुद विष्णु भगवान से ही इसका कारण पूछा जाए.

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विष्णु भगवान से पूछने पर उन्होंने कहा कि हमने भगवान गणेश के पिता महादेव को न्यौता भेजा है. यदि भगवान गणेश यहां आना चाहते तो तो वे अपने पिता के साथ आ जाते, अलग से न्यौता देने की कोई जरुरत भी नहीं थीं.

वहीं दूसरी बात यह निकलकर आई कि है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए होता है. यदि भगवान गणेश नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं. दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना-पीना अच्छा भी नहीं लगता है.

जब गणेश जी बने द्वारपाल 

यह सब बातें रही थीं कि किसी ने एक सलाह दी कि- अगर भगवान गणेश आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की सुरक्षा करना. आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे. यह सलाह सबको पसंद आ गई, और भगवान विष्णु ने भी इस पर अपनी सहमति दे दी.

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होना क्या था कि इतने में भगवान गणेश वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा-बुझाकर घर की रखवाली करने बैठा दिया गया. बारात अपने गंतव्य को रवाना हो गई. तभी वहां नारद जी भी आ पहुंचेे. नारदजी ने देखा कि भगवान गणेश तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं, तो वे भगवान गणेश के पास गए और बारात के साथ न जाने का कारण पूछा. भगवान गणेश कहने लगे कि भगवान विष्णु ने मेरा बहुत अपमान किया है. नारदजी ने कहा कि आप अपनी मूषकों (चूहों) की सेना को बारात से आगे भेज दें, तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनकी सवारियां धरती में धंस जाएंगी, तब आपको सम्मानपूर्वक बारात में बुलाना पड़ेगा.

भगवान गणेश ने नारद की बात को मानते हुए अपनी मूषक सेना जल्दी से आगे भेज दी और सेना ने जमीन पोली कर (नीचे से खोद) दी. जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए. लाख कोशिशें की गईं, परंतु पहिए नहीं निकले. सभी ने अपने-अपने उपाय किए, परंतु पहिए तो नहीं निकले, बल्कि जगह-जगह से टूट गए. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए.

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उसी वक्त वहां नारद पहुंचे और कहा कि आप लोगों ने भगवान गणेश का अपमान करके अच्छा नहीं किया. यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका यह कार्य आसानी से हो सकता है और यह संकट भी टल सकता है. शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे भगवान गणेश को लेकर आए. भगवान गणेश का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया गया, जिसके बाद गणेश जी ने अपनी दैवीय शक्तियों से रथ के पहिए निकाले. अब रथ के पहिए निकल को गए, लेकिन वे टूटे-फूटे थे, अब उन्हें सुधारे तो सुधारे कौन?

इस वजह से हर शुभ काम से पहले होती है गणेश पूजा

तभी पास ही में एक बढ़ई काम कर रहा था, उसे बुलाया गया. बढ़ई ने अपना काम शुरू करने के पहले 'श्री गणेशाय नम:' कहकर भगवान गणेश की वंदना मन ही मन करने लगा. और जल्द ही बढ़ई ने सभी रथों के पहियों को ठीक कर दिया.

गणेश

तब बढ़ई कहने लगा कि हे देवताओं! आपने पहले भगवान गणेश को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन किया होगा. इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है. हम तो बिना पढ़े-लिखें हैं. फिर भी पहले भगवान गणेश को पूजते हैं, उनका ध्यान करते हैं. आप लोग तो देवतागण हैं, फिर भी आप भगवान गणेश को कैसे भूल गए?

इसके बाद उसी वक्त सभी ने भगवान गणेश से क्षमा याचना की. इसके बाद बारात वहां से चल दी और विष्णु भगवान का लक्ष्मीजी के साथ विवाह संपन्न कराके सभी सकुशल घर लौट आए. कहा जाता है कि इस घटना के बाद से आषाढ़ माह के चौथे दिन गणेश जी की पूजा करने की परंपरा शुरु हो गई जोकि आज भी चली आ रही है.

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