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विजय माल्या ने मीडिया का नहीं, भारत सरकार का मजाक उड़ाया है

माल्या का मामला सिर्फ बैंकों का विवाद नहीं अब ये भारत-ब्रिटेन के बीच का राजनयिक मामला बन गया है

Dinesh Unnikrishnan | Published On: Jun 15, 2017 12:01 PM IST | Updated On: Jun 15, 2017 12:01 PM IST

विजय माल्या ने मीडिया का नहीं, भारत सरकार का मजाक उड़ाया है

'आप करोड़ों रुपए वापिस पाने के ख्वाब देखते रहें. आप तथ्यों के बगैर कुछ भी साबित नहीं कर सकते'.

मंगलवार को अपने प्रत्यर्पण के केस की सुनवाई के बाद ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट की अदालत के बाहर जब किंगफिशर के मालिक विजय माल्या ने ये बात कही, तो वो ये ताना मीडिया को नहीं मार रहे थे. असल में वो ये तंज भारत सरकार पर कस रहे थे.

जिन करोड़ों रुपयों की बात माल्या कर रहे थे, वो असल में 9 हजार करोड़ रुपए का वो कर्ज है, जो उन्होंने भारत के बैंकों से लिया है. ये कर्ज उन्होंने अब बंद हो चुकी अपनी एयरलाइन किंगफिशर के नाम पर लिया था. इसके लिए माल्या ने अपनी निजी गारंटी दी थी.

किंगफिशर एयरलाइन 2012 में ही बैंकों के लिए एनपीए (Non Performing Asset) बन चुकी थी. एयरलाइन बंद हुए पांच साल बीत गए हैं. कंपनी के सैकड़ों कर्मचारियों को इसकी मार भुगतनी पड़ी. अभी भी कंपनी पर अपने पायलटों और बाकी कर्मचारियों के करोड़ों रुपए बकाया हैं.

लंदन कोर्ट का भारत की जांच एजेंसियों पर सवाल

माल्या के ये बोल, ये ताना, उनके आत्मविश्वास को दिखाता है. लोग ये सोच रहे थे कि साल भर से ज्यादा वक्त भगोड़े के तौर पर गुजारने के बाद विदेश में विजय माल्या तनाव में होंगे. लेकिन उनकी ये बयानबाजी कोरी नहीं. इसे हल्के में लेना भारी भूल होगी.

माल्या के ये शब्द, कर्ज लेकर भागने के आरोपों को लेकर उनका तिरस्कार और बेपरवाही जताते हैं. इससे ये भी साबित होता है कि भारत की जांच एजेंसियां सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय अब तक विजय माल्या के खिलाफ ठोस सबूत नहीं पेश कर सकी हैं, जिससे उनका प्रत्यर्पण किया जा सके. सिर्फ माल्या ही क्यों, लंदन की जिस कोर्ट में सुनवाई चल रही है, उस कोर्ट ने भी भारत की जांच एजेंसियों की लापरवाही पर सवाल उठाए.

कोर्ट ने कहा कि, 'क्या भारतीय आम तौर पर इतनी तेजी से जवाब देते हैं? उन्होंने अब तक छह महीने बिता दिए हैं, और हम पिछले छह हफ्ते से जरा भी आगे नहीं बढ़े हैं'. अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, चीफ मजिस्ट्रेट एमा अर्बथनॉट ने कहा कि, 'अगर कोई सबूत पेश नहीं किए जाते, तो पूरी सुनवाई शायद अप्रैल 2018 में हो. और अगर सारे सबूत अदालत में पेश किए जाएं तो हम सुनवाई इस साल दिसंबर तक पूरी कर सकते हैं'.

Vijay Mallya

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सीबीआई भी माल्या के खिलाफ सबूत जुटाने में नाकम रही  

सवाल ये है कि जो मामला पिछले कई सालों से सुर्खियों में है, उसके बारे में जांच एजेंसियां छह महीने में भी सबूत क्यों नहीं पेश कर पाई हैं? इस सवाल के जवाब में यही कहा जा सकता है कि सीबीआई समेत भारत की दूसरी जांच एजेंसियों के पास शायद माल्या के खिलाफ आपराधिक केस साबित करने के सबूत ही नहीं.

हमने फर्स्टपोस्ट के एक लेख में पहले भी इस बारे में चर्चा की थी. ये लेख पिछले साल अप्रैल में विजय माल्या के विदेश भागने के कुछ दिन बाद ही छपा था. माल्या का पासपोर्ट निलंबित करने और उनके खिलाफ प्रत्यर्पण की अर्जी देने से पहले भारत को केस को लेकर पूरी तैयारी करनी चाहिए थी. उन्हें सारे सबूत जमा करके विजय माल्या के खिलाफ मजबूत केस बनाना चाहिए था. हमें याद रखना चाहिए कि प्रत्यर्पण को लेकर ब्रिटेन के कानून बेहद सख्त हैं.

माल्या का मामला अब बैंको तक ही सीमित नहीं रहा

माल्या-किंगफिशर का मामला सिर्फ कर्जदार और बैंकों का विवाद नहीं. अब ये भारत और ब्रिटेन के बीच बड़ा राजनयिक मामला बन गया है. ये भारतीय जांच एजेंसियों के लिए भी इज्जत का सवाल बन गया है.

हजारों करोड़ के कर्ज को लेकर भारतीय जांच एजेंसियों से मुकाबला कर रहे विजय माल्या असल में भारत सरकार के साथ मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी लड़ रहे हैं. आज की तारीख में वो सरकार पर भारी पड़ते दिख रहे हैं. जब से वो विदेश भागे हैं, तब से ही माल्या का रुख ऐसा रहा है.

करीब एक साल पहले एक इंटरव्यू में माल्या ने कहा था कि 'मेरा पासपोर्ट लेकर और मुझे गिरफ्तार करके वो एक पैसा भी हासिल नहीं कर पाएंगे'. मंगलवार को जब विजय माल्या ने कहा कि आप करोड़ों रुपए के ख्वाब देखते रहें, तो भी उनका कहने का मतलब यही था, जो साल भर पहले उन्होंने कहा था.

इस मनोवैज्ञानिक लड़ाई में मीडिया का आक्रामक रवैया और पब्लिक के चोर-चोर कहने से माल्या को कोई फर्क नहीं पड़ रहा. माल्या को पटखनी देने के लिए ठोस सबूतों की जरूरत है.

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माल्या के मामले में लापरवाही से भारत की इमेज को झटका

आज की तारीख में गेंद भारत के पाले में है. सरकार ने माल्या को विदेश भागने देकर अपनी इमेज को ही झटका दिया है.

भारत सरकार को तभी माल्या पर विजय मिलेगी, जब जांच एजेंसियां उनके खिलाफ ठोस सबूत पेश करें, वो भी जल्द से जल्द. ताकि, दिसंबर तक सुनवाई पूरी हो सके. माल्या को दिसंबर तक जमानत पहले ही मिल चुकी है. अगर जांच एजेंसियां ऐसा नहीं कर सकीं, तो केस और खिंचेगा.

साल भर बाद भी भारत की जांच एजेंसियां अगर केस जीत जाती हैं, तो भी बैंक, किंगफिशर से कर्ज वसूली नहीं कर पाएंगे. हर गुजरते दिन के साथ कर्ज की कीमत बढ़ती जा रही है. हजारों करोड़ की रकम पर ब्याज बढ़ता जा रहा है. अगर दिसंबर में भारत प्रत्यर्पण का मुकदमा जीत भी लेता है, तो भी कागजी प्रक्रिया पूरी करने में कई महीने और लगेंगे.

तब तक किंगफिशर की जो जब्त संपत्ति बैंकों के पास है, वो किसी काम की नहीं बचेगी. याद रहे कि बैंक अब तक किंगफिशर हाउस तक नहीं बेच पाए हैं. मुंबई के बीचो-बीच स्थित इस संपत्ति का खरीदार तक बैंकों को नहीं मिल सका है. वहीं गोवा में किंगफिशर विला को भी उसकी असल कीमत से काफी कम दाम पर बेचा गया. बैंक तो किंगफिशर ब्रांड बेचकर भी पैसा वसूल नहीं कर सकेंगे. कोई कारोबारी एक डूबी हुई कंपनी में आखिर क्यों पैसा लगाना चाहेगा? खास तौर से तब जबकि उस ब्रांड की मीडिया में पहले से ही काफी फजीहत हो चुकी हो.

बैंक तो हार चुकी माल्या से लड़ाई

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, किंगफिशर को दिए गए कर्ज के चलते स्टेट बैंक को करीब नौ सौ करोड़ रुपए का झटका लगने वाला है.

किंगफिशर से कर्ज की लड़ाई बैंक पहले ही हार चुके हैं. इसके लिए बैंक खुद जिम्मेदार हैं, जिन्होंने एक डूबती हुई एयरलाइन को बिना सोचे-समझे कर्ज दिया. खास तौर से तब और जब वो जानते थे कि अपने पूरे कार्यकाल में एयरलाइन कभी भी मुनाफे में नहीं रही. बैंकों ने बिना जरूरी जब्ती संपत्ति के ये कर्ज बांटा.

उन्होंने ये भी नहीं देखा कि अगर कर्जदार पैसा नहीं लौटा सका, तो वो वसूली किससे करेंगे? असल में कर्ज देते वक्त बैंकों ने सिर्फ रंगीले कारोबारी विजय माल्या के वादे पर यकीन करके कर्ज दिया था.

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