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पाकिस्तान से फोकस हटाकर भारत को वर्ल्डपावर जैसा बर्ताव करना होगा

चीन का पिछलग्गू बना पाकिस्तान चाहता है वह भारत को प्रताड़ित करने वाले देश के रूप में प्रदर्शित करे

Sreemoy Talukdar Updated On: Sep 20, 2017 02:58 PM IST

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पाकिस्तान से फोकस हटाकर भारत को वर्ल्डपावर जैसा बर्ताव करना होगा

संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा के सालाना सत्र में भारत ने अपनी पारी की शुरुआत आक्रामक तेवर में की और उत्तरी कोरिया और पाकिस्तान के बीच सांठगांठ की बात कहते हुए एटमी हथियारों के प्रसार का मुद्दा उठाया है. तुक्के के सहारे तीर चलाने की यह कवायद भारत ने बहुत सोच-समझकर की है.

प्योंगयांग(उत्तर कोरिया) अभी एटमी हथियारों के तेज प्रसार में लगा है और पूरी दुनिया इस बात से चिंता में है. भारत इस माहौल को अपने हक में इस्तेमाल करना चाहता है. साथ ही भारत इस तथ्य को भी उभारना चाहता है कि पाकिस्तान सिर्फ एशिया में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अस्थिरता पैदा करना वाला मुल्क साबित हो सकता है.

यूनाइटेड नेशन्स के ह्यूमन राइट्स कांग्रेस में भारत ने जवाब देने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कश्मीर पर जारी पाकिस्तान की गलतबयानियों पर पलटवार किया और पाकिस्तान को 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का चेहरा' बताया. भारत ने आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच से द्विपक्षीय मुद्दों को उठाकर पाकिस्तान अपने बदनीयत सियासी मकसदों को साधना चाहता है.

भारत की ये प्रतिक्रियाएं बिल्कुल उम्मीद के अनुरूप हैं. इनका मकसद पाकिस्तान को राजनयिक रूप से अलग-थलग करना है लेकिन भारत को ध्यान रखना होगा कि कहीं उसे पाकिस्तान से हर छोटी-मोटी बात पर झगड़ने वाला बगलगीर ना समझ लिया जाय.

झगड़ालू पड़ोसी जान पड़ने की यह नीति अब उपयोगी नहीं रही, इससे अब कोई मकसद नहीं सधता. यह नीति एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत के भूराजनीतिक प्रभाव को तो सीमित करती ही है साथ ही भारत दुनिया में अपने नेतृत्व के उस रसूख से भी महरूम होता है जिसका वह वाजिब हकदार है.

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दुनिया अब 1990 के दशक से बहुत आगे निकल चली है. आतंकवाद और इस्लामी कट्टरपंथ से जूझते हुए विश्व को अब पाकिस्तान की चालबाजियों के लिए फुर्सत नहीं है. सीमा पार से जारी आतंकवाद और वैश्विक इस्लामी दावेदारी के उड़नखटोले पर सवार कश्मीर का हिंसक उपद्रव अब दुनिया के लिए गहरी चिंता का विषय है. वैश्विक स्तर पर जारी दो और रुझानों का भी भारत को फायदा पहुंचा है.

पहली बात यह कि भारत के बाजार के विशाल आकार को देखते हुए पश्चिमी मुल्कों ने नैतिकता की जगह अपने व्यावसायिक हितों को कहीं ज्यादा तरजीह देना ठीक समझा है. कार्नेगी इंडिया के डायरेक्टर सी राजामोहन ने द इंडियन एक्सप्रेस के अपने लेख में बताया है, 'उभरते हुए भारत को देखकर अमेरिका और उसके युरोपीय सहयोगी मुल्कों ने व्यावसायिक तथा भूराजनीतिक सरोकारों को मानवाधिकारों तथा परमाणु निरस्त्रीकरण जैसे अपने घोषित उद्देश्यों के ऊपर तरजीह देना शुरू किया है.'

दूसरे, डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में अमेरिका ने अपने कंधे से वह बोझ उतार फेंका है जो उसे दुनिया के जमीर की आवाज बनकर बोलने के लिए मजबूर किया करता था.

अमेरिका के प्रभाव में आती कमी के साथ-साथ शीतयुद्धोत्तर दुनिया के लगभग दो दशकों में कुछ और घटनाएं बड़े हैरतअंगेज ढंग से सामने आई हैं और साफ दिख रहा है कि निरंकुश सत्ताकेंद्रों से उभरते तानाशाही के तेज रुझानों के खिलाफ उदारवादी लोकतांत्रिक देशों और उनकी संस्थाओं को निपटने में नाकामी हासिल हो रही है.

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फॉरेन अफेयर के अपने लेख में बर्लिन स्थित ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के निदेशक थोर्स्टन बेनर ने रूस और चीन जैसे देशों के आगे उदारवादी लोकतांत्रिक मुल्कों की बेबसी का जिक्र करते हुए लिखा है, 'हाल के सालों में निरंकुश राज्यों ने बड़े साहस के साथ पश्चिमी लोकतंत्रों पर असर डालना चाहा है. ये राज्य अपनी शासन-व्यवस्था को मजबूत करने और तानाशाही के रुझानों को चुनौती देने तथा दुनिया को उदारवाद की तरफ खींचने की पश्चिमी देशों की ताकत को कमजोर करने के लिए ऐसा कर रहे हैं.'

अगर इस संदर्भ को ध्यान में रखें तो एक उदारवादी लोकतंत्र, दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों की बुनियाद पर कायम विश्व-व्यवस्था को मानने वाले मुल्क के रूप में भारत एक ऐसी स्थिति में है कि नजीर कायम करते हुए अगुवाई कर सके लेकिन इसके लिए बहुत जरूरी होगा कि भारत अपने को एक नाकाम मुल्क(पाकिस्तान) के साथ नत्थी करना छोड़े.

हो सकता है पाकिस्तान के पास कोई विकल्प नहीं हो क्योंकि पाकिस्तान का वजूद ही भारत-विरोध के आधार पर कायम है कश्मीर इस समस्या के लिहाज से बहुत अहम है लेकिन भारत चाहे तो अपनी नियति को पाकिस्तान से बांधकर देखने के फंदे से खुद को छुड़ा सकता है और उसे ऐसा करना भी चाहिए.

हो सकता है ऐसा करना सहज समझ के उलट जान पड़े लेकिन कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की बड़बोलियों का जवाब देना दरअसल पाकिस्तान के बिछाए फंदे में फंसने जैसा है क्योंकि तब पाकिस्तान चर्चा के केंद्र में आ जाता है जो कि उसकी मंशा भी है जबकि वह एक नाकाम मुल्क है.

पीटीआई के मुताबिक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी मंगलवार के दिन न्यूयार्क पहुंचे और यूएन की आमसभा की बैठक के अपने भाषण में कश्मीर का मुद्दा उठाया. क्या इस बात पर किसी को आश्चर्य करना चाहिए?

चीन का पिछलग्गू बना पाकिस्तान, जो नाकाम होने की कगार पर खड़ा है, चाहता है कि दुनिया उसे भारत के परेशानहाल पड़ोसी के रूप में देखे. और, जब भी भारत पाकिस्तान को चुभते हुए जवाब देता है, दोनों देशों की मीडिया में उबाल आ जाता है. मीडिया का यह उबाल पाकिस्तान को आगे के वक्त के लिए एक बार फिर से थोड़ी ताकत दे देता है, नाकाम मुल्क होने की उसकी असलियत कुछ देर को छुप जाती है.

भारत के लिए पाकिस्तान से अब यह कहना जरूरी नहीं रहा कि तुम आतंकवादियों को तैयार करने वाली अपनी फैक्ट्रियां बंद करो और आतंकवाद फैलाने वालों को उनके किए की सजा दो. यह मामला तो तभी निबट गया जब डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को फटकार लगाई कि वह, 'गड़बड़ी, हिंसा और आतंक फैलाने वालों' को हिफाजती पनाह मुहैया करा रहा है. इस्लामाबाद अब भी इस सदमे से उबरने में लगा है. भारत को इस मौके का जरूर ही फायदा उठाना चाहिए- भारत को फिलहाल यह जताने की जरूरत नहीं रही कि पाकिस्तान क्या चालबाजी कर रहा है. फिलहाल भारत को चाहिए कि वह यूएन के विश्वमंच पर कुछ रचनात्मक विचार सामने रखे.

एटमी हथियारों की बढ़ाने की चाहत में पाकिस्तान और उत्तर कोरिया की सांठगांठ एक ज्यादा दमदार विषय है और इस सिलसिले में जो नई जानकारियां सामने आई हैं उन्हें बुनियाद बनाते हुए इस विचार को गढ़ा गया है.

पाकिस्तानी न्यूक्लियर फिजीसिस्ट परवेज हुदभोय ने हाल में जर्मन मीडिया को बताया कि पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया को 'अप्रत्यक्ष सहायता' मुहैया कराई. एक्यू खान ने निजी पहल पर उत्तर कोरिया को सहायता नहीं दी थी. इस धारणा का खंडन करते हुए परवेज हुदभोय ने जर्मनी की मीडिया डेचे वेले को कहा, 'यह मानना बहुत मुश्किल है कि एक्यू खान ने अकेले अपने दम पर उत्तर कोरिया, लीबिया और ईरान को सारी तकनीक मुहैया कराई क्योंकि पाकिस्तान में यह तकनीक आला दर्जे के हिफाजती इंतजाम के बीच रहती है. इसे खूब पहरेदारी में रखा गया है और फिर सेना की खुफिया शाखा के लोग भी इस पर नजर रखते हैं. सेंट्रीफ्यूज(एटमी हथियार का एक उपकरण) का वजन तकरीबन आधा टन होता है और उसे ऐसे नहीं ले जाया जा सकता है मानो कोई चीज माचिस की डिबिया में रखकर ले जानी हो. सो, जरूर ही ऊंचे स्तर पर हुई मिलीभगत से ऐसा हुआ है.'

Mumbai: Minister of External Affairs, Sushma Swaraj during the innaugural ceremony of Videsh Bhavan in Mumbai on Sunday. PTI Photo by Mitesh Bhuvad(PTI8_27_2017_000160B)

सोमवार को यूएन की बैठक से अलग सुषमा स्वराज की अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और जापान के विदेशमंत्री तारो कोनो से हुई त्रिपक्षीय बातचीत के बाद सोच की इसी लकीर पर जोर दिया गया. भारत का पक्ष था कि उत्तर कोरिया के एटमी हथियारों के विस्तार की कवायद के तार किन जगहों से जुड़े हैं इसकी जांच होनी चाहिए और जो इसमें शामिल हैं उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. भारत के इस सोच को बैठक में समर्थन मिला.

भारत अगर मुद्दे पर ज्यादा जोर ना दे तो यह उसके हक में अच्छा होगा. संयुक्त राष्ट्रसंघ की बैठक में सुषमा स्वराज को दुनिया में भारत की भावी भूमिका की जरूरत को भांपते हुए एक बुनियाद डालनी चाहिए और अपने लिए ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियों की मांग करनी चाहिए. अगर भारत बड़ी ताकत बनकर उभरना चाहता है तो उसे बड़ी भूमिका स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए. पाकिस्तान के साथ नूराकुश्ती लगातार जारी रखने से उसे कुछ खास हाथ नहीं लगने वाला.

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