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यूएन की रिपोर्ट: दुनिया में 6 करोड़ 56 लाख लोगों का अपना कोई ठिकाना नहीं

दुनिया में शरणार्थियों और विस्थापितों की बढ़ रही है संख्या

FP Staff Updated On: Jun 19, 2017 07:54 PM IST

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यूएन की रिपोर्ट: दुनिया में 6 करोड़ 56 लाख लोगों का अपना कोई ठिकाना नहीं

बीबीसी की एक रिपोर्ट की मानें तो, पूरी दुनिया के लगभग 6 करोड़ 56 लाख लोगों के पास अपना कोई ठिकाना नहीं. इतनी बड़ी संख्या में लोग अपनी जड़ों से विस्थापित हैं.

हैरानी की बात है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को लेकर एक देश बसाया जाए तो जनसंख्या में वो ब्रिटेन और अन्य देशों से आगे निकल जाएंगे.

बीबीसी ने संयुक्त राष्ट्र के रिफ्यूजी एजेंसी के हवाले से बताया है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए हुए लोगों की संख्या 6 करोड़ 56 लाख के आस-पास है. हालांकि इनकी वजहें अलग-अलग हैं. इनमें से कुछ रिफ्यूजी हैं, कुछ शरणार्थी (असाइलम सीकर) हैं तो कुछ आंतरिक रूप से विस्थापित हैं.

क्या है फर्क?

रिफ्यूजी: ऐसे लोग जिन्हें, युद्ध, गृहयुद्ध, आपदा या अशांति जैसी वजहों से दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ती है. इनकी अपनी कोई राष्ट्रीयता नहीं होती.

शरणार्थी (असाइलम सीकर): असाइलम सीकर वो लोग होते हैं, जो किन्हीं वजहों से अपना देश छोड़कर किसी और देश में एक बेहतर जीवन की तलाश में कानूनी रूप से शरण मांगते हैं. असाइलम के तहत उन्हें निश्चित या अनंत समय के लिए शरण दी जाती है. हालांकि असाइलम सीकिंग से नागरिकता नहीं मिल जाती.

विस्थापित: ऐसे लोग जो अपनी जड़ों से तो दूर हो गए हैं, लेकिन उन्होंने कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं की है.

ये रहे आंकड़े:

- दुनिया में 2 करोड़ 25 लाख रिफ्यूजी हैं.

- 28 लाख लोग दूसरे देशों में एक बेहतर जीवन के लिए शरण की तलाश में हैं.

- 4 करोड़ 3 लाख लोग अपने ही देश में विस्थापित हो चुके हैं.

कहां से आ रहे हैं ये विस्थापित लोग?

- सीरिया से 55 लाख.

- अफगानिस्तान से 25 लाख.

- दक्षिणी सूडान से 14 लाख.

कहां मिल रही है छत?

- तुर्की ने 29 लाख लोगों को शरण दी है.

- पाकिस्तान में 14 लाख शरणार्थी रह रहे हैं.

- ईरान में 97 लाख 94 हजार शरणार्थी हैं.

- इथोपिया में 79 लाख 1 हजार 6 सौ लोगों ने शरण ली है.

- लेबनान में 1 लाख और

- युगांडा में 94 हजार 8 सौ शरणार्थी हैं.

यूएन के रिफ्यूजी एजेंसी के हाई कमिश्नर फिलिप्पो ग्रैंडी ने इन आंकड़ों और विस्थापना की बढ़ती स्थिति को अंतरराष्ट्रीय नीतियों के असफलता के तौर पर देखा हैं.

उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि 'ऐसा लगता है कि ये दुनिया शांति बहाल करने में नाकाम रही है. आप देख रहे हैं कि दुनिया में कई संघर्ष सालों से चल रहे हैं, नए संघर्ष शुरू हो रहे हैं और इन स्थितियों में विस्थापना की स्थिति बन रही है. जबरदस्ती की विस्थापना एक कभी न खत्म होने वाले युद्ध का प्रतीक है.'

ग्रैंडी ने उम्मीद जताई कि इस नई वार्षिक रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े दुनिया के बड़े देशों को सोचने पर मजबूर करेंगे. आखिर हम गरीब देशों से ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वो खुद मुश्किल परिस्थितियों में रहते हुए इन लाखों की संख्या में शरणार्थियों की मदद करें? अब अमीर और संसाधन संपन्न देशों से उम्मीद है कि वो इस दिशा में कुछ करेंगे.

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