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अरुणाचल प्रदेश के 6 इलाकों के नाम बदलने के पीछे चीन का खेल क्या है?

अरुणाचल प्रदेश में कई जगहों का नाम बदलकर चीन ने अपने दावे को मजबूती देने की कोशिश की है.

Sujan Dutta Updated On: Apr 21, 2017 05:12 PM IST

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अरुणाचल प्रदेश के 6 इलाकों के नाम बदलने के पीछे चीन का खेल क्या है?

अरुणाचल प्रदेश पर भारत और चीन का विवाद थोड़ा और पेचीदा हो गया है. इस बार ऐसा हुआ है चीन के नए दांव से. चीन ने अरुणाचल प्रदेश में छह ठिकानों के नाम बदल दिए हैं. अरुणाचल प्रदेश को चीन दक्षिणी तिब्बत कहकर इस पर अपना दावा करता रहा है.

अब तक ये विवाद नक्शे का रहा था. मगर अब अरुणाचल विवाद में जबान और संस्कृति के मुद्दे भी जुड़ गए हैं. बीजिंग ने अरुणाचल में छह जगहों के नाम बदलने का कदम दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा के बाद उठाया है.

चीन ने दलाई लामा के अरुणाचल दौरे पर कड़ा ऐतराज जताया था. तिब्बती धर्म गुरू 13 अप्रैल को अरुणाचल दौरा पूरा करके लौटे थे.

चीन के सरकारी मीडिया में जिन छह जगहों के नाम बदलने की खबर आई है, उनमें पहला नाम है 'वो-ग्याईलिंग'. शायद इसका ताल्लुक उर्ग्येनलिंग मठ से है. ये मठ तवांग शहर के करीब है. ये सीधे-सीधे अरुणाचल के कामेंग इलाके पर चीन के दावे को दोहराने का कदम है.

तिब्बत के छठें दलाई लामा (1683-1706) बेहद रंग-बिरंगी शख्सीयत के मालिक थे. उन्हें महिलाओं और शराब में खास दिलचस्पी थी. वो कविताएं लिखते थे. संगीत की धुनें तैयार करते थे. छठें दलाई लामा के बारे में कहा जाता है कि वो उर्ग्येनलिंग मठ में ही पैदा हुए थे. वो अरुणाचल प्रदेश के मोनपा कबीले से बताए जाते हैं.

अब 14वें दलाई लामा यानी मौजूदा दलाई लामा अभी 13 अप्रैल को ही तवांग से वापस गए हैं. चीन ने बड़े कड़े शब्दों में उनके अरुणाचल आने का विरोध किया था. हालांकि, ये विरोध चीन के विदेश मंत्रालय की बयानबाजी तक ही सीमित रहा था.

लेकिन अब ऐसा लगता है कि चीन ने विरोध के लिए ये नया कदम उठाया है. हालांकि, अभी तक चीन ने फौजी ताकत का इस्तेमाल नहीं किया है. लेकिन अरुणाचल पर उसने अपने दावे को नाम बदलकर और मजबूती देने की कोशिश की है.

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arunachal

जिन जगहों के नाम बदले गए हैं वो ज्यादातर घाटी और पानी वाले इलाके हैं

नागरिक मंत्रालय का फैसला

चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि नाम बदलने का फैसला चीन के नागरिक मंत्रालय की वेबसाइट पर जारी किया गया है न कि विदेश मंत्रालय की तरफ से.

पूर्व राजनयिक फुंचोक स्तोब्दान तिब्बती मामलों के जानकार हैं. वो कई देशों में राजदूत रहे हैं. वो 'इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस' नाम के थिंक टैंक से जुड़े हैं. उन्होंने विदेशी मुद्दों पर कई किताबें लिखी हैं.

स्तोब्दान कहते हैं कि चीन ने जिन इलाकों के नाम बदले हैं वो पहाड़ियां और दर्रे हैं. इनमें से दो का ही ताल्लुक कस्बों से है. पहला तो उर्ग्येनलिंग है और दूसरा मेचुका. मेचुका में हाल ही में भारतीय वायुसेना ने अपना एडवांस लैंडिंग ग्राउंड अपग्रेड किया है. मेचुका में अब सेना के मालवाही जहाज उतर सकेंगे और उड़ान भर सकेंगे.

चीन के सरकारी मीडिया के मुताबिक इन जगहों के नाम अंग्रेजी हिसाब से रख दिए गए थे. इन्हें वो-ग्याइनलिंग और मैनकुका कहा जाएगा. स्तोब्दान बताते हैं कि मेचुका का मतलब आग का मुंह होता है.

स्तोब्दान कहते हैं कि चीन ने जिस 'मिला-री' का नाम बदला है, उसमें से री का मतलब तिब्बती भाषा में पहाड़ होता है. इस जगह का नाम तिब्बती संत 'मिला रेस्पा' के नाम पर रखा गया है.

इसी तरह क्वोडेंगार्बो-री का मतलब होता है सफेद स्तूप वाला पहाड़. स्तोब्दान को नहीं पता कि अरूणाचल में किस जगह को चीन ने ये नाम दिया है. लेकिन वो ये जरूर कहते हैं कि इस नाम के साथ भी 'री' जुड़ा है तो ये भी पहाड़ी जगह ही होगी.

'बुमो-ला' का नाम बुमला है. ये तवांग शहर से आधे घंटे की दूर पर है. इसी रास्ते से 1962 की जंग में चीन की सेना अरुणाचल में घुसी थी. आज यहीं पर भारत और चीन की सेनाओं की बैठकें होती हैं.

यहां पर सरहद की पहचान के लिए पत्थरों का ढेर लगाया गया है. इस जगह को 'हीप ऑफ स्टोन्स' भी कहा जाता है. इसके दोनों तरह सेनाओं की इमारतें हैं. इन्हें झोपड़ियां कहकर बुलाया जाता है. यहीं पर आधिकारिक बैठकें होती हैं.

यहां अक्सर दोनों देशों की सेनाएं मिल-बैठकर एक दूसरे का अभिवादन करती हैं. खान-पान की चीजों का लेन-देन करती हैं. जैसे की स्वतंत्रता दिवस और दीवाली पर भारत की सेना चीन के फौजियों को तोहफे और मिठाइयां देती है.

विवाद होने पर इसी जगह पर दोनों एक-दूसरे की शिकायतें करते हैं. दोनों सेनाएं यहीं पर एक दूसरे के इलाके में घुसपैठ के सबूत दिखाती हैं.

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DalaiLama

चीन बौद्ध धर्मगुरू दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा से नाराज है

ऐतिहासिक महत्व

चीन ने जिन जगहों के नाम बदले हैं..उनमें आखिरी नाम है 'नामकापुब-री'. शायद इसका ताल्लुक अरुणाचल के 'नामका-चू' से है. ये जगह तवांग से साठ किलोमीटर पश्चिम में है. भारत के लिए इसका ऐतिहासिक महत्व है.

'नामका-चू' एक नदी है. वो यहां एक गहरे खड्ड के बीच से गुजरती है. 1962 के सितंबर-अक्तूबर के महीने में भारतीय सेना की इन्फैंट्री ब्रिगेड यहीं पर चीन की सेना से हार गई थी. इस टुकड़ी के अगुवा ब्रिगेडियर जेपी दलवी युद्ध बंदी बना लिए गए थे.

ये कहा जा सकता है कि इसी ठिकाने पर पंडित नेहरू की 'फॉरवर्ड पॉलिसी' यानी आगे बढ़ने की नीति की शुरुआत हुई थी. चीन से लड़ाई के लिए नेहरू की यही नीति जिम्मेदार बताई जाती रही है. इसी इलाके में बने थगला रिज से 1962 के जंग की शुरूआत हुई थी.

ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने अपनी किताब, 'इंडियाज चाइना वार' में इस जगह का जिक्र किया है. चीन का दावा था कि थागला रिज उनके इलाके में है. वहीं भारत का कहना था कि ये मैकमोहन लाइन के इस पार पड़ता है इसलिए भारत का हिस्सा है.

ये सरहद अंग्रेजों ने तय की थी. भारत की फॉरवर्ड पॉलिसी के तहत सेना को इस लाइन से आगे जाकर चौकियां बनाने को कहा गया था. चीन इसी बात पर भड़क उठा था और उसने हमला कर दिया था.

आज अहम बात ये है कि हम इन ऐतिहासिक बातों को याद रखें. दलाई लामा के अरुणाचल दौरे से ये पुरानी यादें ताजा हो गई हैं. ऐसा नहीं है कि नाम बदलने का दांव सिर्फ चीन ने चला है. भारत ने भी साल 1987 में नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी नेफा का नाम बदलकर अरुणाचल प्रदेश कर दिया था.

स्तोब्दान कहते हैं कि भारत ने अरुणाचल के कई ठिकानों के नाम संस्कृत या हिंदी में रख दिए हैं. इसीलिए चीन अब उन जगहों के नाम तिब्बती भाषा में रख रहा है.

भारत और चीन सिर्फ विदेश नीति के तहत ही नाम बदलते हों ऐसा नहीं है. दोनों देशों ने अपने कई शहरों के नाम भी बदले हैं. भारत ने बम्बई को मुंबई कर दिया. चीन ने पेकिंग को बीजिंग बना दिया.

चीन ने अपने सबसे बड़े नेता 'माओ त्से तुंग' का नाम 'माओ जे डॉन्ग' भी रखा. यानी ये सिलसिला बरसों से चला आ रहा है और आगे भी चलेगा इसकी पूरी उम्मीद है.

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