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क्या सेहवान हमले के लिए सिर्फ आईएस जिम्मेदार?

आईएसआईएस जिस तरह से मोर्चे पर डटा है, उनका सामना ठोस योजना बनाकर पूरी सैन्य ताकत और सर्जिकल सूक्ष्मता के साथ किया जाए.

Shantanu Mukharji | Published On: Feb 20, 2017 11:29 PM IST | Updated On: Feb 20, 2017 11:29 PM IST

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क्या सेहवान हमले के लिए सिर्फ आईएस जिम्मेदार?

16 फरवरी को पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सेहवान में शाहबाज़ कलंदर के मशहूर दरगाह के ऊपर हुए जानलेवा धमाके में करीब 100 जायरीन मारे गए.

यहां मूल रूप से शिया अनुयायी इबादत के लिए आते हैं.

इस घटना के बाद से पाकिस्तान जिस तरह से थर्रा उठा है, वैसे पहले कभी नहीं हिला था. शिया और गैर-सुन्नी हमेशा से ही आतंकी हिंसा के निशाने पर रहे हैं और यह घटना कोई अपवाद नहीं है.

सेहवान के आतंकी हमले में जो बात सबसे मायने रखती है वह यह है कि आईएस ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है.

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ऐसा करते हुए उन्होंने इस पाक स्थान पर अपने कदमों के निशान छोड़ते हुए बहुत साफ तौर पर यह संदेश दिया है कि आईएस पाकिस्तान के दरवाजे तक पहुंच चुका है और वह भविष्य में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकता है.

इस आतंकी हमले का जो तत्काल रूप से असर हुआ है उसने स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा से जुडी संस्थाओं की चिंता बढ़ा दी है. इससे यह बात भी साफ होती है कि उनका खुफिया तंत्र कितना खोखला है.

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शाहबाज़ कलंदर में सुरक्षा बल

सुरक्षा बलों की अक्षमता

ये भी कि आतंक से जुड़े किसी तरह के संकट से निपटने के लिए उनकी तैयारी कितनी कम है और अल्पसंख्यक शिया समुदाय के हितों की रक्षा को लेकर उनकी सजगता भी कितनी कम है.

सुरक्षा बलों ने तत्काल कार्रवाई कर करीब 100 संदेहास्पद आतंकियों को मार गिराया है. घटना के बाद 24 घंटे से भी कम समय में इतनी बड़ी संख्या में ‘आतंकियों’ को मार गिराना यह साबित करता है शायद यह कार्रवाई घबराहट में की गई है.

या फिर इस तात्कालिक कार्रवाई के जरिए लोगों में भरोसा बहाल करने की कोशिश की गई कि सुरक्षा बलों ने आतंकियों से बदला ले लिया है.

हालांकि, यह सवाल तब भी रह ही जाता है कि अगर 100 संदेहास्पद आतंकवादी पहले से मौजूद थे और उनकी सूची सरकार के पास मौजूद थी तो उनको इस कत्लेआम से पहले ही क्यों नहीं या तो पकड़ लिया गया या फिर रास्ते से हटा दिया गया?

इससे यह संदेह भी पैदा होता है कि इतने अधिक मारे गए लोगों में कुछ निर्दोष लोग भी मारे गए होंगे?

बहस तो चलती ही रहेगी लेकिन, फिलहाल पाकिस्तान की राजनीति और वहां के तंत्र के ऊपर यह सवाल उठाया जा रहा है कि वहां किसी आतंकी घटना से निपटने के लिए आतंक विरोधी ढांचा क्यों नहीं है.

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डॉन अखबार ने एक संपादकीय में हमले पर सवाल खड़े किए हैं

अखबार ने उठाया सवाल

18 फरवरी को प्रमुख दैनिक समाचारपत्र ‘डॉन’ ने अपने संपादकीय में यह सवाल पूछा है कि हाल में बमबारी की जो घटनाएं हुई उनको क्यों होने दिया गया?

अखबार ने पूछा, क्या उनको जानबूझकर करवाया गया था या वे महज अवसरवादी संयोग की तरह थे. यह सच में बहुत गंभीर आरोप है.

सवाल राष्ट्रीय कार्य योजना की मौजूदगी को लेकर भी उठाये जा रहे हैं, लोग उसे एक मजाक बता रहे हैं.

पाकिस्तान की जनता नवाज़ शरीफ की सरकार से भी जवाब मांग रही है, क्योंकि देश की जनता बहुत संयम के साथ लंबे समय से इस बात का इंतजार कर रही है कि कब इन आतंकी घटनाओं का ये सिलसिला थमेगा.

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सभी तरह के आश्वासनों और सेना एवं सुरक्षा बलों द्वारा की गई तमाम सैन्य कार्रवाईयों के बदले में पाकिस्तान की जनता को हत्याओं और ज्यादा हत्याओं के सिवा कुछ भी हासिल नहीं हुआ है.

पाकिस्तानी सेना अफगानिस्तान में जड़ जमा चुके आतंकी संगठनों के ऊपर इस बात को लेकर उंगली उठा रही है क्योंकि अब वे संगठन पाकिस्तान को ही निशाना बनाने में लग गए हैं.

कुछ भीतरी सूत्र जो अपनी पहचान सामने नहीं लाना चाहते हैं उनके अनुसार, संघ शासित कबाइली इलाकों के उपर नजर रखी जा रही है, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि यही इलाका आतंक का केंद्र है.

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इस हमले में 100 से ज्यादा ज़ायरीनों की मौत हो गई

अलकायदा-हक्कानी संगठन

यह बात सब जानते हैं कि अलकायदा, हक्कानी संगठन, तालिबान और उनसे जुड़े संगठनों के इन इलाकों में ठिकाने हैं और वे आतंक को बढ़ावा दे रहे हैं. संघ शासित कबाइली इलाके बहुत पिछड़े हुए हैं और ऐसा दिखाई नहीं देता है कि इस्लामाबाद की तरफ से इन इलाकों के हालात को बेहतर करने के लिए कोई कदम उठाया गया हो.

यहां की अनुमानित जनसंख्या करीब 60 लाख है, जिसमें केवल 16 प्रतिशत लोग शिक्षित हैं और दुःख की बात यह है कि इनमें शिक्षित महिलाओं का आंकड़ा एक प्रतिशत से भी कम है.

पिछड़े लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा और विकास की जरूरत है. क्योंकि उनके जीवन स्तर को सुधारने की प्रगतिशील कोशिश की जाए तो हो सकता है कि उससे आतंकी घटनाओं में कमी आए.

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इसके अलावा, मानवाधिकार उल्लंघन के अनगिनत मामले हैं. बजाय मानवाधिकारों की रक्षा के उपायों को मजबूत बनाने के पाकिस्तान की सरकार एएसीपीआर जैसे कानून लागू कर रही है जो उनके लिए सही नहीं है और उल्टा असर पैदा करने वाली भी है.

अगर संघशासित कबायली इलाकों में बेहतरी के कुछ ठोस काम किये जाए तो इस बात की उम्मीद बढ़ जा सकती है कि बड़े पैमाने पर आतंक की घटनाओं में कमी आए.

इस बात की पूरी संभावना है कि अब पाकिस्तान, अफगानिस्तान के ऊपर इस बात के लिए दबाव बनाएगा कि वह उन आतंकियों के ऊपर कार्रवाई करे जिनके बारे में पाकिस्तान को शक है कि वे ही इन आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है.

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आतंकी संगठन आईएसआईएस ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी

अफगानिस्तान-भारत दोस्ती

पाकिस्तान का यह संदेह इस बात से भी पैदा हो रहा है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए अफगानिस्तान-भारत के नजदीक आ रहा है. भारत-अफगान के बेहतर होते संबंधों के कारण पकिस्तान की भौंहें तनी हुई हैं और वह एक पड़ोसी को दूसरे से अलग करने के लिए कुछ भी करेगा.

इसके ऊपर ध्यान रखने की जरुरत है. अफगानिस्तान में भारत के जो संसाधन हैं वे खतरे में हो सकते हैं, क्योंकि उनके बारे में यह गलत धारणा है कि उनको किसी खास मकसद के तहत वहां रखा गया है.

हाल ही में लाहौर और सेहवान में हुए आतंकी हमलों के कारण पाकिस्तान की आईएसआई और सेना, भारत को परेशान करने के लिए पाकिस्तान में कोई खतरनाक योजना बना सकती है.

ऐसा करके पाकिस्तान अपने लोगों का ध्यान देश के असल मुद्दों से हटाकर दूसरी तरफ कर सकती है.

आईएसआईएस जिस तरह से मोर्चे पर डटा है, वैसे स्थिती में ये जरूरी हो जाता है कि इनका सामना ठोस योजना बनाकर पूरी सैन्य ताकत और सर्जिकल सूक्ष्मता के साथ किया जाए.

ऐसा नहीं करने पर मुमकिन हो कि उसका शिकंजा प्रभावी तरीके से देश के दूसरे हिस्सों में भी फैलता चला जाए और देश को खतरनाक अंजाम भुगतने पड़ें.

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