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लद्दाख में चीनी सैनिकों की पत्थरबाजी डोकलाम पर खंभा नोंचने से कम नहीं

क्या चीन धीमी होती अर्थव्यवस्था के बीच भारत से जंग का जोखिम उठा सकेगा?

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Aug 16, 2017 08:50 PM IST

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लद्दाख में चीनी सैनिकों की पत्थरबाजी डोकलाम पर खंभा नोंचने से कम नहीं

जब देश आजादी की सत्तरहवीं सालगिरह मना रहा था तब लद्दाख में चीनी सैनिक घुसपैठ का दूसरा मोर्चा खोल रहे थे. भारत और चीन की सेना के बीच लद्दाख में पेंगोंग झील के पास टकराव इस कदर बढ़ा कि पत्थरबाजी शुरू हो गई.

भारतीय सीमा से बाहर खदेड़े जाने पर भड़के चीनी सैनिकों ने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया. लेकिन भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को पीछे धकेल कर ही दम लिया. दोनों देशों के बीच सीमा विवाद से उपजे तनाव पर ये अपने आप में पहली अप्रत्याशित घटना है.

पंद्रह अगस्त की सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच चीनी सैनिक पेंगोंग झील के पास चीनी सैनिकों की पेंगोंग झील के पास फिंगर फोर और फिंगर फाइव में भारतीय सीमा में घुस आए थे. हालांकि इसकी एक वजह खराब मौसम को भी माना जा रहा है. लेकिन भारतीय जवानों के रोकने पर चीनी सैनिक भड़क उठे और पत्थरबाजी करने लगे.

ड्रैगन की डोकलाम से ध्यान भटकाने की साजिश

चीनी सैनिकों का पत्थर फेंकना डोकलाम विवाद की खीज झलकाता है. साथ ही ये हरकत भारतीय सेना को उकसाने के लिए भी दिखाई देती है क्योंकि जिस तरह से चीन ने अचानक हमला किया वो उसकी सोची समझी रणनीति का ही हिस्सा लगती है. चीन चाहता है कि इससे भारतीय सीमा से सटी चीनी सीमा पर तनाव बढ़ा कर भारत का मन भटकाया जाए.

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पेंगोंग की घटना को देखते हुए ये माना जा सकता है कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा के अलावा दूसरे मोर्चों पर भी भारत के खिलाफ साजिश रच रहा है. साल 2005 के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि चीनी सेना 15 अगस्त को सीमा पर दोनों देशों के बीच होने वाली बैठक में शामिल नहीं हुई.

1990 के दशक में भी दोनों देशों के बीच इस इलाके को लेकर तनाव हो गया था. चीन ने इस इलाके में सड़क बना कर इसे अक्साई चीन का हिस्सा बता डाला था. लेकिन भारत ने बाद इस इलाके को अपने कब्जे में वापस ले लिया था. इस बार फिर चीन की ये हरकत साबित करती है कि वो डोकलाम विवाद के मुद्दे पर भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहता है.

चीन जानता है कि भारत के साथ उसका सीमा विवाद हजारों किमी दूरी के कई हिस्सों में फैला हुआ है. ऐसे में वो भारत को परेशान करने के लिए किसी भी इलाके में घुसपैठ कर उस पर अपना दावा कर सकता है.

हालांकि पेंगोंग झील का तकरीबन 60 फीसदी हिस्सा चीन के कब्जे में है. हिमालय की ये झील 134 किमी लंबी है जो कि लद्दाख से तिब्बत पहुंचती है. चीनी सैनिक इसी झील के फिंगर फोर इलाके में घुसपैठ कर रहे थे.

चीन के उकसावे का भारत दे रहा संयमित जवाब

एक तरफ चीनी सैनिकों की घुसपैठ तो दूसरी तरफ चीनी मीडिया लगातार भारत को युद्ध की धमकी दे रहा है. डोकलाम से भारत पर सेना हटाने का दबाव बढ़ाया जा रहा है. चीन ने अपनी मीडिया और पीएलए के जरिए मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ दिया है.

China

लेकिन भारत का साफ कहना है कि वो युद्ध नहीं चाहता है बल्कि कूटनीतिक तरीके से मसले का हल चाहता है क्योंकि भूटान के ट्राइंजक्शन पर यथास्थिति बनाए रखना जरूरी है. जबकि चीन सीमा पर यथास्थिति बनाए रखने की भारत और भूटान के साथ हुई संधि को ठुकरा कर डोकलाम पर अपना दावा ठोक रहा है.

भारत का रुख साफ है कि दोनों देश पहले विवादित इलाके से अपनी फौज को पीछे हटाएं और उसके बाद बातचीत से मामले को सुलझाएं. लेकिन चीन बार-बार भारत पर अपनी सीमा में घुसपैठ का आरोप लगा कर युद्ध के लिए ललकार रहा है.

दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को दो पड़ोसी एशियाई महाशक्ति के बीच दबदबा बनाए रखने की लड़ाई के तौर पर भी देख सकते हैं क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा है कि एक तीसरे देश भूटान की जमीन पर भारत और चीन आमने-सामने खड़े हैं. चीन इसी वजह से तिलमिलाया हुआ है कि जब विवाद भूटान के साथ है तो फिर भारत सीधे दखल क्यों दे रहा है.

जबकि भारत के पास संधि का मजबूत आधार है तभी कूटनीतिक तौर पर भारत मनोवैज्ञानिक बढ़त लिये हुए है. उसका ही नतीजा है कि अमेरिका ने इस मामले में दोनों देशों को मुद्दे को बातचीत से सुलझाने की सलाह दी है. अमेरिका की ये प्रतिक्रिया चीन के लिये इशारा है ताकि चीन डोकलाम और भारत के मुद्दे पर किसी गलतफहमी में ना रहे.

अगले सुपरपावर के सैनिकों की हैसियत पत्थर फेंकने की ही!

डोकलाम मुद्दे पर अमेरिका की प्रतिक्रिया की ये धीमी लेकिन गंभीर शुरुआत है. इससे एक अंतर्राष्ट्रीय दबाव चीन पर बढ़ना शुरू हो सकता है.

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वहीं दूसरी तरफ आईएमएफ की ताजा रिपोर्ट भी चीन को चेता रही है कि अगर उसने सुधार के निर्णायक कदम नहीं उठाए तो उसकी अर्थव्यवस्था की कमर टूट सकती है. दुनिया भर में आए वित्तीय संकट के बाद चीन में आर्थिक विकास की दर धीमी हुई है.

उस हालत में जब चीन धीमी होती अर्थव्यवस्था से निपटने की कोशिश कर रहा है तो वो भारत के खिलाफ सीमित जंग का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा. सुपरपावर चीन के सैनिक अगर अब पत्थर फेंकने पर मजबूर हो गए हैं तो ये पीएलए की हताशा का सबसे बड़ा सबूत है.

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