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सिक्किम: लंबी चलेगी भारत-चीन की 'हाथापाई', जानिए वजह क्या है

शी को यह महसूस करना चाहिए कि भारत की सख्ती उसकी चतुराई का हिस्सा है.

Prakash Katoch | Published On: Jul 05, 2017 12:51 PM IST | Updated On: Jul 05, 2017 01:25 PM IST

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सिक्किम: लंबी चलेगी भारत-चीन की 'हाथापाई', जानिए वजह क्या है

चीन विरोधी गठजोड़ के रूप में भारत-अमेरिका संबंध विकसित हो रहा है. डोका ला में बीजिंग का आक्रामक रुख माहौल परखने के लिए हो सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाल ही में रूस में दिए गए इस बयान ने सबका ध्यान खींचा था कि भारत-चीन सीमा पर पिछले 40 साल से एक भी गोली नहीं चली है.

ताजा गतिरोध जाहिर तौर पर 16 जून को शुरू हुआ था. इसके बाद विदेश मंत्रालय ने 29 जून को एक बयान जारी करते हुए कहा था, '16 जून 2017 को चीनी सेना ने डोकलाम इलाके में डोकला से भूटान की ओर जोम्पेलरी आर्मी कैम्प तक सड़क निर्माण शुरू किया. भूटान और चीन के बीच सीमा पर बातचीत जारी है और हमारे बीच 1988 और 1998 का लिखित समझौता है, जिसमें कहा गया है कि जब तक कि लंबित सीमा का मसला हल नहीं हो जाता, दोनों पक्ष शांति बनाए रखेंगे और अपनी-अपनी सीमा पर शांति बरकरार रखेंगे ताकि सीमा पर मार्च 1959 की स्थिति को बनाए रखा जा सके. 

समझौते भी कहते हैं कि दोनों पक्ष सीमा पर यथास्थिति बदलने के लिए एकतरफा कार्रवाई या ताकत के इस्तेमाल से खुद को दूर रखेंगे. भूटान ने चीनी पक्ष को जमीनी और कूटनीतिक दोनों स्तर पर यह बता दिया है कि भूटानी इलाके में सड़क की ओर हो रहा निर्माण सीधे तौर पर समझौतों का उल्लंघन है और इससे दोनों देशों के बीच सीमा को तय करने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है. भूटान को उम्मीद है कि डोकलाम इलाके में 16 जून 2017 से पहले की स्थिति बरकरार रहेगी.'

China Pakistan

1962 के युद्ध के बाद सिक्किम सबसे बड़ा गतिरोध नहीं

लेकिन वर्तमान गतिरोध निश्चित रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सबसे लंबा नहीं है. 1986 में अरुणाचल प्रदेश में वांगडुंग इलाके में चीन के कब्जे की घटना के बाद भारत ने तब सुमदोरोंग चु के चारों ओर कब्जा कर लिया था. तभी डेंग जियोपिंग ने घोषणा की कि भारत को सबक सिखाने का ये सही समय है. कुछ इसी तरह उन्होंने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को वियतनाम पर हमले का निर्देश दिया था, लेकिन इस घटना में उन्हें जीवन भर का सबक मिल गया.

जबरदस्त ताकत का प्रदर्शन करते हुए डेंग जियोपिंग के निर्देश पर हथियारों के साथ 53वें ग्रुप आर्मी के 20 हजार पीएलए की टुकड़ियां और 13 ग्रुप आर्मी के जवान एक साथ आगे बढ़े. भारत ने भी वांगडुंग के आसपास वायुसेना की निगरानी में तीन टुकड़ियों को आगे बढ़ाते हुए प्रतिक्रिया दी. इसके अलावा पूर्वी सेक्टर में करीब 10 डिविजन सैनिकों को इकट्ठा किया गया जिनमें अरुणाचल प्रदेश में 50 हजार टुकड़ियों को मजबूती देने के लिए इंडियन एयर फोर्स के विमान लगाए गए.

इस दरम्यान भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चेकरबोर्ड पर जबरदस्त अभ्यास किया, जो अक्टूबर 1986 में शुरू होकर मार्च 1987 तक चला. यह अभ्यास पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान की ओर हुए ‘ब्रास टैक्स’ अभ्यास के अलग था. इस दौरान भारत ने कूटनीतिक कदम भी बढ़ाए ताकि चीन से भिड़ा जा सके. हालात को देखते हुए अगस्त 1987 में वांगडुंग में विरोधी सेनाओं के फील्ड कमांडर आपस में मिले और अपनी चौकियों को दूर करने पर सहमत हुए. 1987 के नवंबर महीने में टकराव खत्म करने के मकसद से सीमा को लेकर 8 दौर की वार्ता हुई जिसका वास्तव में पालन भी हुआ. तनातनी के बाद आखिरकार रिश्ते सामान्य बनाने के इरादे से चीन ने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को न्योता दिया.

Indian army soldiers are seen after snowfall at India-China trade route at Nathu-La

लंबा खिंच सकता है सिक्किम गतिरोध

इसलिए कहा जा सकता है कि वर्तमान गतिरोध डेढ़ साल तक चली वांगडुंग की घटना से परे है. इसमें आश्चर्य भी नहीं होगा अगर ये तनातनी वांगडुंग की घटना से भी लम्बा खिंचे. ऐसा इसलिए भी है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीनी गणतंत्र का अपने लिए ऐसी आभा बनाई है जो अजेय है और इस पर किसी तरह की आंच आए वे इसे हरगिज बर्दाश्त नहीं कर सकते. 16 जून को चीन ने टी-जंक्शन से 2 किलोमीटर दूर दक्षिण में जिस अतिक्रमण को अंजाम दिया, उसे प्रयोग के तौर पर किया गया हो या जानबूझ कर, इसमें शी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता.

यहां ये जानना जरूरी है कि मार्च 2017 को चीन में हुए कम्युनिस्ट पार्टी के 19वें राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्ण अधिवेशन में प्रतिनिधियों ने लगातार यह कहा कि उनकी बड़ी प्राथमिकता पार्टी की केंद्रीय कमेटी का निर्णय मानने की होगी जिसमें शी जिनपिंग पार्टी के केंद्र में रहेंगे. 

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन दशक में दो बार होता है जो पिछली बार 2012 में हुआ था. इससे पता चलता है कि सीपीसी के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव दूर की कौड़ी है. उम्मीद की जा रही थी कि पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी के ज्यादातर सदस्य इस महाधिवेशन में रिटायर हो जाएंगे.

शी जिनपिंग मामले को यूं ही नहीं जाने देंगे

25 सदस्यों वाले पोलित ब्यूरो और 200 से ज्यादा सदस्यों वाली केंद्रीय कमेटी में 70 फीसदी सदस्य रिटायर होने वाले थे, जिसके लिए सदस्यता अभियान ने जोर पकड़ा. लेकिन इन सबके बीच शी पार्टी के कोर में लाए गए, जो माओ-त्से तुंग के व्यक्तित्व के करीब हैं. वह किसी भी तरह की कमजोरी दिखाना बर्दाश्त नहीं कर सकते. वास्तव में वह खुद हिटलर, हरक्युलस और सुपरमैन के बीच कहीं स्थापित होना चाहेंगे.

xi-jing

चीन 23 देशों के क्षेत्रों पर दावा करता है जबकि उसकी सीमा सिर्फ 14 देशों के साथ मिलती है. कुल मिलाकर इस पूरे मामले में हम एक लंबा गतिरोध देखते हैं यहां तक कि सिक्किम में वर्तमान गतिरोध से भी बड़ा और लंबा. ऐसी आशंका है कि चीन सभी मोर्चों पर दबाव बढ़ाएगा. हिन्द महासागर में हरकत में आए चीनी जहाज और पनडुब्बियां इसके संकेत भी दे रहे हैं.

मामले में चीनी मीडिया की बयानबाजी और तेज हो सकती है, जो लगातार ये बात  कर रहे हैं कि भारत को शासन का नियम सिखाना जरूरी है. सच्चाई ये है कि वांगडुंग की घटना के दौरान भी हम चीन और पाकिस्तान के किसी दुस्साहस के लिए तैयार थे. कोई कारण नहीं कि आज हम इसके लिए तैयार न रहें. शी को यह महसूस करना चाहिए कि भारत की सख्ती उसकी चतुराई का हिस्सा है.

(लेखक रिटायर्ड लेफ्टिनेन्ट जनरल हैं)

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