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रोमां: रोहिंग्या मुसलमानों से कम दर्दनाक नहीं भारतीय बंजारों की कहानी

कला के क्षेत्र में दुनिया के कुछ सबसे बड़े नाम रोमां समुदाय से जुड़े हुए हैं. पाब्लो पिकासो, अंतोनियो सोलारियो, चार्ली चैपलिन, इली नताशे और एल्विस प्रेस्ले जैसे कई रोमा हुए हैं जिन्होंने कला, संगीत, विज्ञान, खेलकूद और राजनीति में अपना मुकाम बनाया है

Animesh Mukharjee Updated On: Sep 05, 2017 10:27 AM IST

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रोमां: रोहिंग्या मुसलमानों से कम दर्दनाक नहीं भारतीय बंजारों की कहानी

कश्मीर से विस्थापित हुए पंडित, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू और रोहिंग्या के मुसलमानों के साथ उनकी नस्ल के चलते हो रहे भेदभाव, उनके साथ हो रही हिंसा के बारे में हम सबने सुना है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाति, धर्म और नस्ल के आधार पर नरसंहार होते रहे हैं.

भारत का विभाजन या जर्मनी में यहूदियों का हॉलोकास्ट मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है. आज भी दुनिया के कई हिस्सों में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं. आइए एक-एक करके इन पर नज़र डालते हैं.

यूरोप में एक बंजारा समुदाय है 'रोमां'. इस समुदाय को यूरोप का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय माना जाता है. सिंती और रोमां बंजारों का इतिहास भारत के साथ जुड़ता है. रोमां समुदाय के लोग आज से लगभग 1500 साल पहले भारत से भटकते हुए यूरोप पहुंच गए थे. एक धारणा ये भी है कि ये लोग भारत के योद्धा थे जो इस्लामिक आक्रमणकारियों को खदेड़ते हुए इतनी दूर निकल गए कि वहीं बस गए.

इनकी अपनी एक भाषा है जिसकी कोई लिपि नहीं है. साथ ही रोमां समुदाय का रहन-सहन यूरोपियन शैली से बिलकुल अलग है. इन सब कारणों के चलते रोमां लोगों को भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है.

फ्रांस में एक रोमां बस्ती खाली करवाने के बाद उसकी जांच करते सुरक्षा बल. फोटो- रॉयटर्स

फ्रांस में एक रोमां बस्ती खाली करवाने के बाद उसकी जांच करते सुरक्षा बल. फोटो- रॉयटर्स

पूरे यूरोप में फैले हुए

इस समय यूरोप भर में करीब 11 करोड़ सिंती-रोमां रहते हैं. अकेले जर्मनी में ही ये 70,000 के आस-पास हैं. सर्बिया, हंगरी, बुल्गारिया, रोमेनिया और स्पेन में भी बड़ी तादाद में रोमां हैं. हालांकि बिलकुल सही आंकड़ें मौजूद नहीं हैं क्योंकि भेदभाव के डर से रोमां अपनी पहचान छिपा कर रखते हैं.

बहुत ज़्यादा है भेदभाव

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहूदियों के बाद रोमां ही सबसे ज़्यादा हिंसा का शिकार हुए थे. आज भी स्वीडन जैसे देशों में रोमां समुदाय के लोगों को पुलिस ने हिंसक माना हुआ है. फ्रांस में रोमां बस्तियां जला देने की कई घटनाएं हुई हैं. कुछ साल पहले ही एक लियानार्डा दिबरानी नाम की रोमां लड़की को स्कूल से निकाल दिया था क्योंकि उसका परिवार फ्रांसीसी तौर तरीकों से मेल-जोल नहीं बिठा पाया था.

इसी तरह की एक और कहानी सुनने में आती है, जहां एक प्रोफेशनल फुटबॉल खिलाड़ी की लोकप्रियता उसकी रोमां पहचान के सामने आने पर अचानक से कम हो गई थी.

बड़े-बड़े नाम जुड़े हैं रोमां समुदाय से

कला के क्षेत्र में दुनिया के कुछ सबसे बड़े नाम रोमां समुदाय से जुड़े हुए हैं. पाब्लो पिकासो, अंतोनियो सोलारियो, चार्ली चैपलिन, इली नताशे और एल्विस प्रेस्ले जैसे कई रोमां हुए हैं, जिन्होंने कला, संगीत, विज्ञान, खेलकूद और राजनीति में अपना मुकाम बनाया है लेकिन इससे इस समुदाय की परेशानियां कम नहीं होती. रोमां समुदाय के लोग प्रसिद्ध होने पर भी अपनी नस्लीय पहचान छिपाने की ही कोशिश करते हैं.

एक से दूसरी जगह विस्थापित होते रोमां परिवार

एक से दूसरी जगह विस्थापित होते रोमां परिवार. फोटो- रॉयटर्स

भारत वापस भेजने की उठती है मांग

यूरोप के लोग अक्सर रोमां लोगों को भारत वापस भेजने की मांग करते हैं. ये मांग व्यवहारिक रूप से पूरी नहीं हो सकती क्योंकि न तो रोमां लोगों का वर्तमान रहन-सहन भारत से किसी भी तरह से मिलता है न ही हमारे यहां दो करोड़ लोगों को समाहित कर लेने की जगह है.

हालांकि इस तरह की मांग करने वालों को वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता है और अलग वजहों से ऐसी बातों को समर्थन भी मिलता है. हमारे यहां भी तो लोग ऐसी ही मांग करते हैं.

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