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भारत को इजरायल से सीखनी चाहिए रेगिस्तान में मछलियां तैराना

इस टेक्नॉलजी की मदद से कहीं भी मीठे और खारे पानी की मछलियां की पैदावार कर सकते हैं.

Subhesh Sharma | Published On: Jul 04, 2017 02:48 PM IST | Updated On: Jul 04, 2017 09:43 PM IST

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भारत को इजरायल से सीखनी चाहिए रेगिस्तान में मछलियां तैराना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिन के इजरायल दौरे के लिए रवाना हो चुके हैं. मोदी इजरायल का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं और उनका ये दौरा कई मायनों में बेहद अहम माना जा रहा है. कहा जा रहा है मोदी इजरायल से भारत के लिए कई नई तकनीक लेकर आएंगे. इजरायल कृषि, वाटर मैनेजमेंट, फार्म फिशिंग आदी में काफी आगे है और दुनिया भर में उसके काम की सराहना होती है.

कैसे हो पाया रेगिस्तान में मछली पालन मुमकिन

फिश फार्मिंग और वो भी रेगिस्तान में... सुनने में ये बात काफी अटपटी लगती है. लेकिन इजरायल ने ये काम कर पूरी दुनिया को हैरत में डाल है. पिछले 10 सालों में ये एक बड़ा कारोबार बन गया है. इजरायल द्वारा रेगिस्तान में फिश फार्मिंग जीएफए एडवांस्ड सिस्टम लिमिटेड द्वारा डेवलप की गई ग्रो फिश एनीवेयर (GFA) टेक्नॉलजी की मदद से मुमकिन हो पाई है. इसकी मदद से आप कहीं भी मीठे और खारे पानी की मछलियां की पैदावार कर सकते हैं.

किसकी मदद ली

इजरायल जीएफए के सीईओ डोटान बार-नोय का कहना है कि एक पुरानी कहावत है कि समुद्र में बहुत मछलियां हैं. लेकिन अब ये बात उतनी सच नहीं रही, जितनी कभी हुआ करती थी. बल्कि आज के समय में साल दर साल समुद्र में मछलियां घटती जा रही हैं. ऐसे में बार-नोय और उनके 30 अन्य साथियों ने मछलियों को बचाने के लिए जीएफए का फॉर्मूला अपनाया. बार-नोय की इस टीम में ज्यादातर इंजीनियर्स, मरीन बॉयोलॉजिस्ट और अन्य टेक्निकल लोग शामिल हैं.

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किसी भी जगह मछली पालन को मुमकिन बनाने के लिए बार-नोय व उनके साथियों ने इजरायली साइंटिस्ट डॉक्टर योसी ताल और हीब्रू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जाप वान रिज्न (जीएफए के इनवेंटर) द्वारा किए गए सराहनीय काम की मदद ली है. जीएफए ने एक ऐसा परिवेश बनाया है, जिसमें मछलियों को बिना पानी बदले और उसे बिना कैमिकली ट्रीट किए बड़ा किया जा सकता है.

कैसे पालते हैं रेगिस्तान में समुद्री मछली

बार-नोय ने ISRAEL21c को बताया कि हम इसे जीरो-डिसचार्ज सिस्टम कहते हैं. जिस पानी में मछलियों को बड़ा किया जाता है हम उसे ट्रीट करने के लिए बॉयोलॉजिकल फिलटर्स और स्पेशली डेवलप्ड बैक्टीरिया का इस्तेमाल करते हैं, ताकि कुछ भी बर्बाद न जाने पाए. इस सिस्टम की मदद से खारे-पानी की मछली को समुद्र से हजारों मीलों दूर यहां तक की रेगिस्तान में भी पाला जा सकता है.

नेगेव रेगिस्तान में इजरायल के बेनजिस सेंटर फॉर डेजर्ट एक्वाकल्चर के प्रमुख और इजरायली साइंटिस्ट सैमुयल एप्पलबौम का कहना है कि हर साल दुनियाभर में रेगिस्तान फार्म्स की मदद से 30 मिलियन टन श्रिम्प और मछलियों की पैदावार होती है, जिससे 40 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा की एक इंडस्ट्री खड़ी होती है. इजरायल में ज्यादातर मछलियों को नेगेव रेगिस्तान में ही पाला जाता है, जहां अगस्त के महीने में तापमान औसतन रूप से 97.5 डिग्री फारेनहाइट रहता है और सालाना वर्षा शून्य के करीब होती है.

कैसे होती है रेगिस्तान में फिश फार्मिंग

रेगिस्तान में मछलियों को पालने के लिए इजरायली लोगों ने जलवाही स्तर से पानी निकाला. आपको बता दें कि ज्यादातर बंजर इलाकों में जलवाही स्तर पर पानी मौजूद होता है. रेगिस्तान की सतह से करीब 50 से 150 फीट नीचे बनी प्राचीन गुफाओं में पानी मौजूद होता है. वहीं समुद्री मछलियों को जिंदा रखने के लिए नमकीन पानी का जुगाड़ ठीक रेगिस्तान में ड्रिल कर के किया जाता है. रेगिस्तान में नमकीन पानी के लिए ये ड्रिलिंग वैसे ही की जाती है, जैसे की ऑयल ड्रिलिंग की जाती हो. रेगिस्तान में ड्रिल कर के निकाला जाने वाला पानी थोड़ा नमकीन होने के साथ गर्म भी होता है. इसका तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस रहता है. इसके अलावा ये पानी किसी भी तरह के पोल्यूटेंट्स से भी मुक्त रहता है.

10 सालों के एक्सपेरिमेंट के बाद पाया गया कि श्रिम्प, कैटफिश, तिलापिआ और स्ट्राइप्ड बास आदि कुछ मछलियां गर्म और थोड़े नमकीन पानी में आसानी से फूलती-फलती हैं. साथ ही गर्म पानी की मदद से कई प्रजातियों का ब्रीडिंग रेट में भी बढ़ोतरी देखने को मिली.

कोस्टल फिश फॉर्म से बेहतर हैं डेजर्ट फॉर्म

ज्यादातर जगहों पर फिश फार्मिंग तालाब या फिर उस जगह पर की जाती है जोकि जल सोत्र के करीब हो. लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि रेगिस्तान में की जाने वाली फिश फार्मिंग समुद्र के तटीय इलाकों में की जाने वाली कोस्टल (तटीय) फिश फार्मिंग से बेहतर होती है. डेजर्ट फार्मिंग में मछलिया सुरक्षित रहती हैं, क्योंकि इसमें इन्हें कोस्टल फार्मिंग के जैसे समुद्री पानी से होने वाले बीमारियों का सामना नहीं करना होता है.

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