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पहली बरसी पर पाक मीडिया ने बुरहान वानी को फिर हीरो बनाया

पाकिस्तानी उर्दू अखबारों ने बुरहान को एक “शहीद” बताते हुए महिमांडित किया

Seema Tanwar | Published On: Jul 10, 2017 08:58 AM IST | Updated On: Jul 10, 2017 08:58 AM IST

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पहली बरसी पर पाक मीडिया ने बुरहान वानी को फिर हीरो बनाया

हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी की पहली बरसी को पाकिस्तान मीडिया ने उसे फिर हीरो की तरह पेश करने और भारत के खिलाफ जहर उगलने के एक और मौके के तौर पर लिया है.

सभी अखबारों ने कश्मीरी चरमपंथी कमांडर बुरहान को एक “शहीद” बताते हुए महिमांडित किया है और हमेशा की तरह भारत पर कश्मीरियों के मानवाधिकार हनन और अत्याचार ढाने के आरोप लगाये हैं.

कुछ पाकिस्तानी उर्दू अखबारों को उम्मीद है कि बुरहान वानी की मौत ने कश्मीरियों की आवाज को वजन दिया है और अब उनकी तमन्नाएं पूरी होने से कोई नहीं रोक सकता. वहीं कुछ अखबार अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर कश्मीर समस्या से मुंह मोड़ने का आरोप भी लगा रहे हैं.

भड़कते शोले

जंग’ लिखता है कि कश्मीरियों के आंदोलन में जो शिद्दत आज है, वैसी 1990 के दशक में भी नहीं थी.

अखबार कहता है कि बुरहान वानी की “शहादत” के बाद घाटी में कश्मीरियों की आजादी की जद्दोजहद तेज हो गई है और भारत की विपक्षी पार्टियां भी सरकारी अत्याचार की निंदा कर रही हैं और पाकिस्तान के साथ बातचीत के जरिए इस समस्य को हल करने के लिए मोदी सरकार पर जोर डाल रही हैं.

अखबार लिखता है कि भारतीय गृह मंत्रालय ने भी माना है कि बीते 27 साल में कश्मीर घाटी में 40,961 लोग मारे गए हैं जबकि निष्पक्ष सूत्रों के मुताबिक यह संख्या कई गुना ज्यादा हो सकती है. अखबार का कहना है कि कश्मीरियों की संघर्ष में आई तेजी से बखूबी अंदाजा होता है कि यह अब अपने अंजाम तक पहुंचने से पहले रुकने वाली नहीं है.

नवा ए वक्त’ लिखता है कि भारतीय हुकमरानों को लगता है कि वे जुल्म के हथकंडों से आजादी के भड़कते शोलों को ठंडा कर रहे हैं, लेकिन भारतीय सेना का अत्याचार शोलों को और भड़का रहा है.

अखबार ने बुरहान वानी की शान में कसीदे पढ़ते हुए लिखा है कि वह अपनी कौम के नौजवानों में जिहाद का जज्बा जगाने के लिए बंदूक के साथ साथ इंटरनेट का बखूबी इस्तेमाल करता था. अखबार ने ‘द हिंदू’ अखबार का हवाला देते हुए लिखा है कि जिस बात ने बुरहान वानी को भारत सरकार के लिए मोस्ट वांटेड बना दिया, वह कश्मीरी युवाओं में उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता थी जिसमें दिन ब दिन इजाफा हो रहा था.

‘नवा ए वक्त’ की भी यही राय है कि बुरहान वानी की शहादत के बाद कश्मीरियों के आजादी के आंदोलन को एक नया उत्साह मिला है और शुरू में जो टैम्पो बन गया था वह एक साल से लगातार जारी है.

खामोश विश्व बिरादरी

उधर, रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि संयुक्त राष्ट्र और विश्व बिरादरी निहत्थे कश्मीरियों पर भारतीय फौज के जुल्मों को न सिर्फ देख रही है, बल्कि खामोश भी है.

अखबार लिखता है कि पिछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी गये थे, तो खुद को मानवाधिकारों का अल्मबरदार समझने वाले अमेरिका ने मोदी से यह कहने की जहमत भी नहीं उठायी कि वह कश्मीरियों के स्वनिर्धारण के अधिकार और संयुक्त के प्रस्तावों का सम्मान करें. अखबार लिखता है कि चीन, तुर्की और एकाध मुस्लिम देश को छोड़ कर कोई भी इस समस्या को हल करने के लिए भारत पर दबाव नहीं डालता.

रोजनामा ‘औसाफ’ की टिप्पणी है कि अगर भारत की कट्टरपंथी नरेंद्र मोदी सरकार समझती है कि वह दुनिया भर में कश्मीरियों की आवाज को दबा देगी तो यह उसकी खाम ख्याली है.

अखबार के मुताबिक कश्मीर को दुनिया से अलग थलग करने की नीति को कश्मीरी अपने पांवों से कुचल देंगे और आजादी हासिल करके ही रहेंगे जो उसका जायज हक है.

अखबार कहता है कि यह भारत की जनता को तय करना है कि वह लंबे समय से चले आ रहे कश्मीर के मुद्दे को सुलझाकर दक्षिण एशिया में शांति से रहना चाहती है या फिर इस्राएल जैसे शातिराना सोच रखने वालों से मिलकर खुद को मुसलमानों से अलग थलग करना चाहती है.

पाबंदियां बेअसर

रोजनामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि बुरहान वानी की पहली बरसी पर भारतीय सेना और पुलिस की तरफ से लगाई गई पाबंदियों से बेपरवाह कश्मीरियों ने भरपूर प्रदर्शन और आजादी समर्थक रैलियां निकालीं और साबित कर दिया कि कश्मीर की आजादी के आंदोलन को अब रोका नहीं जा सकता है.

लेकिन इस अखबार ने भी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी पर कश्मीर मुद्दे की अनदेखी का आरोप लगाते हुए लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपने जमीर की आवाज सुन लें तो कश्मीर में 70 साल से जारी अत्याचार का खात्मा हो जाएगा.

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