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भारत ने बदली पहले एटमी हथियार इस्तेमाल न करने की नीति!

पाक का उर्दू मीडिया भारत और इजरायल के बीच रक्षा समझौते से चिढ़ा हुआ है

Seema Tanwar | Published On: Apr 10, 2017 08:32 AM IST | Updated On: Apr 10, 2017 08:32 AM IST

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भारत ने बदली पहले एटमी हथियार इस्तेमाल न करने की नीति!

पाकिस्तान के उर्दू अखबारों को पढ़कर लगता है कि ‘कहीं खुशी, कहीं गम’. खुशी इस बात की, कि सऊदी अरब के नेतृत्व में मुसलमान देशों का एक सैन्य गठबंधन बन रहा है और इसकी कमान पाकिस्तान के पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल राहील शरीफ को सौंपी जा रही है.

गम इस बात का, कि भारत और इजरायल के बीच दो अरब डॉलर का रक्षा समझौता हुआ है. इसके अलावा, एटमी हथियारों का पहले इस्तेमालना करने के भारत के रुख में बदलाव की अटकलबाजियों ने भी पाकिस्तानी मीडिया को चिंता में डाल दिया है.

रोजनामा ‘औसाफ’ लिखता है कि भारत ने इजरायल के साथ जो दो अरब डॉलर का रक्षा समझौता किया है, उसका निशाना इस क्षेत्र में पाकिस्तान के सिवाय कोई और देश हो ही नहीं सकता.

भारत की जंगी तैयारियां

अखबार लिखता है कि इजरायल इस समझौते के तहत भारत को जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, लॉन्चर और दूसरे साजोसामान के अलावा भारत में बन रहे पहले विमानवाहक समंदरी बेड़े में मिसाइल डिफेंस सिस्टम लगाने में भी मदद करेगा.

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अखबार के मुताबिक भारत की यह जंगी तैयारियां सारी दुनिया को, और खास कर सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्यों देशों को भी नजर आ रही हैं लेकिन उसे रोकने की तरफ किसी का ध्यान नहीं है.

अखबार लिखता है कि अमेरिकी मीडिया में यह बात आ चुकी है कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ एटमी हथियारों के इस्तेमाल की पहल कर सकता है और इसीलिए पाकिस्तान को हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.

खतरे की घंटी

रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नफीस जकारिया के इस बयान को तवज्जो दी है कि भारत पहले एटमी हथियारों का इस्तेमाल न करने के जिस सिद्धांत यानी डॉक्टरीन का प्रचार करता फिरता है, वह झूठ के सिवाय कुछ नहीं है.

अखबार लिखता है कि भारत एक अर्से से अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने में जुटा है लेकिन हैरत की बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र और विश्व बिरादरी की जुबान पर ताला लगा है.

अखबार कहता है कि भारत का जंगी जुनून पाकिस्तान समेत पूरे क्षेत्र के खतरे की घंटी है और अगर उसे रोका नहीं गया तो इससे बर्बादी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा.

रोजनामा ‘दुनिया’ ने भी भारत और इजरायल के बीच दो अरब डॉलर के रक्षा समझौते को भारत का जंगी जुनून बताया है और कहा है कि यह किसी भी देश के साथ इजरायल का सबसे बड़ा रक्षा समझौता है.

भारत के एटमी डॉक्टरीन में बदलाव की अटकलों पर अखबार की राय है कि यह बात किसी से नहीं छिपी है कि एटमी हथियारों से होने वाले विस्फोट किसी एक इलाके तक सीमित नहीं होते हैं और इसीलिए भारत ने अगर पाकिस्तान के खिलाफ परमाणु हथियार इस्तेमाल किया तो इसके विनाशकारी प्रभावों से वह भी नहीं बच पाएगा.

मुस्लिम नाटो

राहील शरीफ़

उधर, ‘उम्मत’ ने अपने संपादकीय में सऊदी अरब के नेतृत्व में बनने वाले मुसलमान देशों के सैन्य गठबंधन की शान में कसीदे पढ़े हैं. अखबार ने हाल में पाकिस्तान के दौरे पर आए सऊदी अरब के धार्मिक मामलों के मंत्री शेख सालेह बिन अब्दुल अजीज के हवाले से लिखा है कि इस गठबंधन का बनना मुसलमानों की फतह है.

अखबार लिखता है कि उन्होंने यह कह कर तो पाकिस्तानियों का दिल ही जीत लिया कि सऊदी अरब पाकिस्तान को अकेला छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता.

दूसरी तरफ ‘नवा ए वक्त’ ने लिखा है कि इस गठबंधन यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि यह मुस्लिम दुनिया के ही एक देश के खिलाफ बन रहा है. अखबार का इशारा सऊदी अरब के प्रतिद्वंद्वी और शिया बहुल देश ईरान की तरफ है.

अखबार लिखता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इस बात की पुष्टि की है कि जनरल राहील शरीफ इस सैन्य गठबंधन की कमान संभालने के बाद ईरान की चिंताओं को दूर करेंगे.

‘नवा ए वक्त’ के मुताबिक इस गठबंधन में ईरान को शामिल करना इसकी सबसे बड़ी कामयाबी होगी और भविष्य में किसी भी मुसलमान देश के खिलाफ अंदरूनी और बाहरी हमला होने की स्थिति में यह गठबंधन दमदार जबाव देगा.

तीसरा विश्व युद्ध

वहीं ‘जंग’ ने सीरिया में हुए एक रासायनिक हमले के बाद सीरियाई ठिकानों पर अमेरिकी हवाई हमलों के बाद दुनिया में तीसरा विश्व युद्ध भड़कने की आशंका जताई है.

अखबार लिखता है कि सीरिया में अमेरिका और रूस एक दूसरे सामने आ गए हैं और इस मुद्दे पर मुसलमान देशों के बीच भी मतभेद बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे में आशंका पैदा हो गई है कि अगर हालात को तत्काल नहीं संभाला गया तो तीसरे विश्व युद्ध का खतरा हकीकत बन सकता है.

अखबार कहता है कि संयुक्त राष्ट्र को तुरंत और प्रभावी कदम उठाने चाहिए और अमेरिका को कोई भी एकतरफा कदम उठाने की बजाय सभी मामले संयुक्त राष्ट्र में हल करने चाहिए.

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