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अमेरिका ने रोकी मदद, तो पाक मीडिया को लगी 'मिर्ची'

पाकिस्तान के उर्दू मीडिया ने कहा, दुश्मन भारत के साथ खड़ा अमेरिका हमारा दोस्त नहीं

Seema Tanwar Updated On: Jul 24, 2017 11:01 AM IST

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अमेरिका ने रोकी मदद, तो पाक मीडिया को लगी 'मिर्ची'

अमेरिका ने पाकिस्तान को पांच करोड़ डॉलर की वित्तीय मदद क्या रोक ली, पाकिस्तानी मीडिया को अमेरिका पर चढ़ाई करने का एक और मौका मिल गया है. भारत भी उनके निशाने पर है जिसके अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्ते पाकिस्तानी मीडिया को बहुत चुभते हैं.

अमेरिका ने पाकिस्तान पर अफगान तालिबान के हक्कानी नेटवर्क धड़े के खिलाफ कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है और साझा कार्रवाइयों के लिए हुए खर्चों का भुगतान करने से इनकार कर दिया है. अमेरिका ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान बदस्तूर आंतकवादियों की शरणस्थली बना हुआ है और उसे उनके खिलाफ और कड़े कदम उठाने होंगे. अमेरिका की तरफ से फिर “डू मोर” की मांग पर चिढ़ते हुए पाकिस्तान अखबार अमेरिका को एहसानफरामोश बता रहे हैं. उनके मुताबिक जब मतलब पड़ा तो अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और अब पल्ला झाड़ रहा है.

पाकिस्तान की ‘कुरबानियां’

कराची से छपने वाला ‘जंग’ लिखता है कि यह बहुत ही अजीब बात है कि अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान की कुरबानियों को स्वीकार भी करता है और दूसरी तरफ ऐसे कामों की मांग भी करता है जो अफगानिस्तान में बरसों जमे होने के बावजूद अमेरिका और 40 अन्य देशों की सेनाएं मिलकर भी नहीं कर पाईं.

अखबार लिखता है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अपने 50 हजार से ज्यादा आम नागरिक और छह हजार से ज्यादा सैनिक गंवाए हैं और खरबों रुपयों का नुकसान भी झेला है. अखबार की राय में, पाकिस्तान से ऐसी मांग करना उचित नहीं है जो उसके अख्तियार भी न ही क्योंकि हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान में मौजूद है और सक्रिय है.

औसाफ’ लिखता है कि अमेरिका और उसके सहयोगी आतंकवाद का पूरी तरह सफाया नहीं कर सके हैं जबकि अमेरिकी आग के शोलों ने पूरे पाकिस्तान और खास तौर से खैबर पख्तूनख्वाह को अपनी चपेट में ले लिया है.

अखबार लिखता है कि भारत ने भी अमेरिका की शह पर इस्राएल की मदद से पाकिस्तान पर एक तरह से जंग थोप रखी है और पाकिस्तान को आतंरिक रूप से अस्थिर करने के लिए देश में आतंकवादी दाखिल कर रहा है.

अखबार कहता है कि अमेरिका को भारत के साथ अपने गठजोड़ पर फिर से विचार करना चाहिए और वह क्षेत्र में ताकत के संतुलन को न बिगाड़े. अखबार की राय में भारत के साथ अमेरिका के गहरे होते रिश्ते जंग के खतरे को और बढ़ा रहे हैं.

ट्रंप-मोदी मुलाकात के मायने

नवा ए वक्त’ ने भी अमेरिका की तरफ से ग्रांट रोके जाने पर संपादकीय लिखा और पाकिस्तान के प्रति अमेरिका की सख्त होती नीति के पीछे भारत से उसकी बढ़ती दोस्ती को बताया है.

अखबार लिखता है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वॉशिंगटन दौरे के समय अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें अपने साथ बिठाकर पाकिस्तान से मांग की थी कि वह अपनी सरजमीन का इस्तेमाल किसी अन्य देश के खिलाफ हमलों के लिए ना होने दे.

अखबार के मुताबिक ट्रंप ने कश्मीरी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन को आतंकवादी भी करार दिया जिसका मोदी ने स्वागत किया. अखबार कहता है कि अमेरिका की इस तरह की नीति तो पाकिस्तान के साथ उसकी दोस्ती की बजाय दुश्मन का संकेत देती है.

अखबार ने पाकिस्तान की विदेश नीति को नये सिरे तैयार करने की जरूरत पर जोर देते हुए लिखा है कि "हमारे दुश्मन भारत के साथ खड़ा अमेरिका हमारा दोस्त कैसे हो सकता है?"

‘उम्मत’ ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान और मुसलमानों का दुश्मन बताते हुए लिखा है कि पांच करोड़ डॉलर की रकम रोककर ट्रंप ने पाकिस्तान के खिलाफ अपने सख्त रवैये को ही दोहराया है.

अखबार की राय में, यह एक तरफ कठपुतली अफगान सरकार और दूसरी तरफ भारत को खुश करने की नीति है. अखबार कहता है कि पाकिस्तान ने अमेरिका को कई बार याद दिलाया है कि उस पर इल्जाम लगाकर और उसके सहयोग के बिना अफगानिस्तान में कभी शांति कायम नहीं हो सकती. अफगानिस्तान के हालात के लिए अखबार ने वहां अमेरिका, भारतीय और इस्राएल की खुफिया एजेंसियों की तथाकथित इस्लाम विरोधी गतिविधियों को जिम्मेदार बताया है.

दोतरफा रवैया

रोजनामा ‘वक्त’ ने अमेरिकी में पाकिस्तानी राजूदत एजाज चौधरी के इस स्पष्टीकरण को अपने संपादीय में जगह दी है कि जो फंड रोके गए हैं, वह अमेरिकी मदद नहीं है बल्कि आतंकवाद के खिलाफ होने वाले खर्चों की रकम है.

पाक-अमेरिकी रिश्तों को अमेरिका की दोहरी नीति का शिकार बताते हुए अखबार ने लिखा है कि अमेरिका किसी का नहीं बल्कि सिर्फ अपने हितों का दोस्त है. अखबार की राय में, पाकिस्तान से डू मोर की मांग, ड्रोन हमले, पाकिस्तान-ईरान गैस लाइन परियोजना का विरोध और भारत के साथ असैन्य परमाणु समझौता अमेरिका के एकतरफा रवैया को जाहिर करते हैं और अब भी उसका रवैया ऐसा ही है जिसे भारतीय लॉबी और बढ़ावा देने में जुटी है.

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