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मुंबई की एक खबर जो आपने नहीं पढ़ी होगी लेकिन उसपर पाक में आग लगी हुई है

भारत के चरमपंथ पर पाक परेशान है, जहां ईशनिंदा के आरोप में दिन दहाड़े लोगों को कत्ल कर दिया जाता है.

Seema Tanwar | Published On: Apr 25, 2017 02:10 PM IST | Updated On: Apr 25, 2017 02:10 PM IST

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मुंबई की एक खबर जो आपने नहीं पढ़ी होगी लेकिन उसपर पाक में आग लगी हुई है

बात भारत की हो, तो पाकिस्तान के अखबार छोटी से छोटी खबर को भी मिर्च मसाला लगाकर पेश करते हैं. कई बार तो तिल का ताड़ नहीं, बल्कि पहाड़ बना दिया जाता है.

पता नहीं मुंबई में पाकिस्तानी कपड़े बेचने वाले एक शोरूम पर एमएनएस कार्यकर्ताओं की तोड़फोड़ से जुड़ी खबर पर आपका ध्यान गया या नहीं, लेकिन पाकिस्तानी उर्दू अखबारों ने इस खबर को लेकर आसमान सिर पर उठा रखा है.

जंग, नवा-ए-वक्त, दुनिया, जसारत, औसाफ और रोजनामा पाकिस्तान जैसे सभी बड़े अखबारों ने इस मुद्दे पर संपादकीय लिखा है. उनके संपादकीयों के शीर्षक खास तौर से ध्यान खींचते हैं. आप भी कुछ नमूने देखिए-

भारत में आखिरी हदों को छूता हुआ चरमपंथ

भारत एक और बंटवारे के रास्ते पर

हिंदू गुड़ों का पाकिस्तानी कपड़े बेचने वाले शॉपिंग मॉल पर हमला

भारत: चरमपंथ का एक और मुजाहिरा

चरमपंथ की गहरी जड़ें

हिंसा और तोड़फोड़ कहीं भी हो, उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन आलोचना और निंदा एक बात है और राई को पहाड़ बनाना दूसरी बात. अपनी खुराफात के लिए बदनाम रहे एमएनएस के कार्यकर्ताओं को भले भारत में कोई गंभीरता से न ले, लेकिन वह पाकिस्तान में सभी अखबारों के संपादकीय में छाए हैं.

हैरानी की बात यह है कि भारत के बढ़ते चरमपंथ को लेकर उस देश में अखबारों के पन्ने रंगे जा रहे हैं जहां सिर्फ ईशनिंदा के आरोप में दिन दहाड़े लोगों को कत्ल कर दिया जाता है.

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मशाल खान नाम के एक नौजवान को मरदान में उसके साथ पढ़ने वाले यूनिवर्सिटी छात्रों ने ही कत्ल किया तो इसके चंद दिनों के भीतर तीन बहनों ने ईशनिंदा के आरोप में एक इंसान को मौत के घाट उतार दिया. और फिर कुछ ही दिन बाद चितराल में बौराई भीड़ ने इसी इल्जाम में एक इंसान पर हमला बोल दिया. शुक्र है पुलिस वक्त पर पहुंच गई और उस आदमी जान बचाई ली गई.

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यही नहीं, फरवरी के महीने में दस दिन के भीतर सात आतंकवादी हमले और उनमें 126 जानों के चले जाने से कोई भी आसानी से समझ सकता है कि पाकिस्तान में चरमपंथ की जड़ें कितनी गहरी समा चुकी हैं.

भारत से तुलना

पाकिस्तानी पत्रकार और शायर आतिफ तौकीर मुंबई की घटना को पाकिस्तान में हाथों-हाथ लिए जाने की दो वजहें देखते हैं.

वो कहते हैं, 'पहली बात, भारत में उग्रपंथ या चरमपंथ की कोई भी छोटी बड़ी घटना पाकिस्तान में बड़ी आसानी से बिकती है. दूसरी, ऐसी घटनाएं अकसर पाकिस्तान में फैलते चरमपंथी रुझान को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं. मसलन अगर कोई उग्र भीड़ ईशनिन्दा के आरोप में किसी को मार देती है, तो कह दिया जाता है कि भारत में भी तो गाय के नाम पर लोगों को कत्ल किया जा रहा है. ऐसा सिर्फ पाकिस्तान में ही तो नहीं होता.'

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जाहिर है कि गाय का मुद्दा सीमापार भी गूंज रहा है. इससे इनकार नहीं है कि गाय के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेने वाले तथाकथित गौरक्षकों की दहशत बढ़ी है. इसीलिए इसे लेकर पाकिस्तानी मीडिया के तेवर हमलावर रहते हैं. कहीं इसे मुसलमानों, और दलितों पर जुल्म के रूप में पेश किया जाता है तो कहीं इसे तथाकथित अखंड भारत के सकंल्पों से जोड़ा जाता है.

धुर दक्षिणपंथी पाकिस्तानी अखबार ‘जरासत’ की जरा भाषा देखिए, 'पाकिस्तान बनने के बाद से ही अखंड भारत के नारे ने जोर पकड़ लिया था और जब से आतंकवादी नरेंद्र मोदी भारत का प्रधानमंत्री बना है, यह जुनून और बढ़ गया है.'

वहीं मुंबई की घटना पर अपने संपादकीय में ‘दुनिया’ लिखता है, 'भारत में ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब कहीं न कहीं पाकिस्तान के खिलाफ नफरत भरे प्रदर्शन न होते हों या फिर बेगुनाह कश्मीरियों का खून न बहाया जाता हो.'

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पाकिस्तान की टूट-फूट

पत्रकार आतिफ तौकीर मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान, दोनों ही जगह सक्रिय कट्टरपंथी अपने कदमों से एक दूसरे को फायदा पहुंचाते हैं. लेकिन वह कहते हैं, 'यह बात तो साफ है कि भारत में इस हद तक चरमपंथ नहीं है, जिस हद तक पाकिस्तान में है. चूंकि पाकिस्तान में चरमपंथ को सरकारी संरक्षण प्राप्त है, इसलिए भारत की कोई छोटी घटना भी पाकिस्तान में बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाती है.'

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भारत के कई राज्यों में गोहत्या पर बैन हो या फिर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने का मुद्दा, भारत से जुड़ी हर ऐसी खबर जहां मीडिया के लिए अपनी टीआरपी बढ़ाने का जरिए होती है, वहीं इससे पाकिस्तानी कट्टरपंथियों को भी ताकत मिलती है.

आतिफ तौकीर कहते हैं कि बात गाय के मुद्दे और मुसलमानों पर हमले के मामलों की है तो भारतीय सिविल सोसायटी खूब बोल रही है और पाकिस्तानी सिविल सोसायटी भी इसकी निंदा करती है, लेकिन पाकिस्तान के लिए भारत से ज्यादा बड़ा गंभीर मुद्दा उसकी अंदरूनी टूट-फूट है.

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