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झगड़ा अरब दुनिया का, फिक्र में दुबला होता पाकिस्तान

पाकिस्तानी मीडिया को मुस्लिम दुनिया में एकता की जरूरत पर उपदेश देने एक और मौका मिल गया है

Seema Tanwar | Published On: Jun 08, 2017 07:38 AM IST | Updated On: Jun 08, 2017 10:23 AM IST

झगड़ा अरब दुनिया का, फिक्र में दुबला होता पाकिस्तान

अरब दुनिया में पैदा हुए ताजा संकट की तपिश पाकिस्तान की मीडिया में भरपूर तरीके से महसूस की जा रही है. कुछ अखबार मुस्लिम जगत में मतभेदों की बढ़ती खाई से परेशान हैं तो कहीं सऊदी अरब को आइना दिखाया जा रहा है. कुल मिलाकर पाकिस्तानी मीडिया को मुस्लिम दुनिया में एकता की जरूरत पर उपदेश देने और अमेरिका का हौव्वा खड़ा करने का फिर एक मौका मिल गया है.

जंग’ लिखता है कि अरब और मुस्लिम दुनिया के अहम देश कतर से जिस तरह सात मुस्लिम देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मिस्र, लीबिया, यमन और मालदीव ने रिश्ते तोड़ लिए, वह पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए हैरत और चिंता का सबब है.

अखबार लिखता है कि मुस्लिम दुनिया पहले ही बहुत मुश्किलों से घिरी है, मसलन यमन, सीरिया और लीबिया में गृहयुद्ध छिड़ा है, जबकि मुसलमान एक तरफ आतंकवादी संगठनों के हमलों में तो दूसरी तरफ सरकारों की कार्रवाइयों में भी मारे जा रहे हैं, इसलिए मुस्लिम दुनिया में एकता और एकजुटता की जरूरत है.

अखबार की राय है कि कतर से अगर कोई शिकायत भी है, तो उन्हें बातचीत से हल किया जाए ताकि मुस्लिम दुनिया में विभाजन और न बढ़े और एकता की तरफ कदम बढाए जा सकें. अखबार पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों से इस दिशा में फौरन कदम उठाने को कहता है.

‘बेबुनियाद आरोप’

अरब जगत के मौजूदा हालात को ‘नवा ए वक्त’ ने भी मुस्लिम दुनिया के लिए अफसोसनाक और चिंताजनक बताया है.

अखबार लिखता है कि सऊदी अरब ने आतंकवाद से निपटने और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर कतर से लगने वाली अपनी सरहदों को बंद करने का एलान किया है जबकि कतर ने इस फैसले को अनुचित बताते हुए कहा है कि उस पर आतंकवादी गुटों का समर्थन करने के आरोप बेबुनियाद हैं.

अखबार ने इस मामले में पाकिस्तान के तटस्थ रहने को दुरुस्त करार देते हुए लिखा है कि सिर्फ इसी तरह पाकिस्तान अरब मुल्कों में पैदा होने वाले मतभेदों को खत्म करने में अपनी भूमिका अदा कर सकता है.

रोजनामा ‘इंसाफ’ लिखता है कि सऊदी अरब खुद लंबे समय तक अल कायदा, हमास और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठनों का समर्थक रहा है जबकि आज वह कतर पर इन संगठनों का साथ देने का आरोप लगाते हुए उससे रिश्ते तोड़े रहा है.

अखबार लिखता है कि इन संगठनों को मुस्लिम देशों और इलाकों में शैतानी ताकतों के वजूद और दबदबे के खिलाफ प्रतिरोध के लिए शुरू किया गया था. अखबार के मुताबिक ओसामा बिन लाने ने साफ कर दिया था कि अगर अमेरिका और ब्रिटेन सऊदी अरब से अपनी फौजें और निवेश हटा लें तो उनके संगठन अल कायदा का अमेरिका से कोई झगड़ा नहीं होगा.

अखबार ने हमास को इस्राएल के खिलाफ प्रतिरोध और फलस्तीनी राष्ट्र के गठन के लिए संघर्ष का प्रतीक बताया है जबकि मुस्लिम ब्रदरहुड उसकी नजर में घमंड में चूर शासकों के वहशी जुल्मों का विरोध करना वाला संगठन है.

तनाव के लिए कौन जिम्मेदार?

वहीं ‘जसारत’ भी अपने संपादकीय में सऊदी अरब को आइना दिखाते हुए लिखता है कि उसने अफगान जिहाद का भरपूर समर्थन किया था और लाखों टन खजूर, गोश्त, सूखा दूध और अन्य राहत सामग्री क्या अमेरिकी फौजियों के लिए भिजवाई जाती थी?

साथ ही अखबार ने सवाल पूछा है कि क्या अमेरिका ने स्ट्रिंगर मिसाइलें पाकिस्तानी फौज को दी थीं या अफगान फौज को? उसके मुताबिक ये सारे काम अलग अलग समय पर चरमपंथियों की मदद के लिए किए गए थे. अखबार के मुताबिक इस्राएल का चरमपंथ तो हर हद को पार कर चुका है लेकिन उसका खुला समर्थन अमेरिकी राष्ट्रपति करता है. अखबार ने अरब दुनिया के ताजा संकट को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के हालिया मध्य पूर्व दौरे का नतीजा बताया है.

अखबार की राय है कि पाकिस्तान और तुर्की को तुरंत कोशिश करनी चाहिए और इसमें कुवैत, ईरान और क्षेत्र के दूसरे देशों को भी शामिल किया जाए वरना अमेरिका मुस्लिम दुनिया में विभाजन के अपने एजेंडे को जल्द ही अंजाम तक पहुंचा देगा.

वहीं रोजनामा ‘पाकिस्तान’ ने मुस्लिम दुनिया में बढ़ते मतभेदों का जिक्र करते हुए लिखा है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंध खत्म हो चुके हैं और जल्द उनके बहाल होने की उम्मीद भी नहीं है, ऐसे में कतर से सात देशों के संबंध तोड़ लेने से मध्य पूर्व में एक नया संकट खड़ा हो जाएगा.

अखबार के मुताबिक कतर एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और वह गैस का उत्पादन करने वाला एक बड़ा देश है. इसके अलावा अखबार ने 2022 में कतर में विश्व कप फुटबॉल होने की बात भी कही है.

अखबार कहता है कि कतर पर आतंकवादियों का समर्थन करने के जो आरोप लगे हैं, उनमें कितनी सच्चाई है, ये तो कतर की सरकार ही बता पाएगी, लेकिन सात देशों के कदम से यह जरूर साबित हो गया है कि मुसलमान देशों में एकता फिलहाल एक ऐसा सपना है जो आसानी से साकार नहीं हो सकता.

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