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देशभक्ति का नया पैमाना: राष्ट्रगान जोश में गाओ, वर्ना जेल जाओ

फिलीपींस के नये कानून की चर्चा पूरी दुनिया में है.

Rakesh Kayasth | Published On: Jun 30, 2017 04:25 PM IST | Updated On: Jun 30, 2017 04:27 PM IST

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देशभक्ति का नया पैमाना: राष्ट्रगान जोश में गाओ, वर्ना जेल जाओ

सार्वजनिक प्रदर्शन वाली देशभक्ति आजकल पूरी दुनिया में कुंलाचे भर रही है. खुद को दूसरों से ज्यादा देशभक्त साबित करने की होड़ मची है. सरकारें बाकायदा देशभक्ति के सार्टिफिकेट बांट रही हैं.

लेकिन फिलीपींस में कहानी इससे भी आगे बढ़ चुकी है. फिलीपींस की सरकार अपने नागरिकों की देशभक्ति के नाप-तौल के लिए कानून लाने जा रही है. सरकारी जांच में अगर देशभक्ति की मात्रा कम निकली तो नागरिक को जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी.

राष्ट्रगान में जोश ना दिखाना अपराध होगा

फिलीपींस की संसद के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स बाकायदा बिल लेकर आई है. जिसमें यह कहा गया है कि सार्वजनिक जगह पर नेशनल एंथम गाते वक्त नागरिकों को पर्याप्त जोश दिखाना पड़ेगा. अगर जोश में कमी पाई गई तो मुकदमा दायर किया जाएगा. नागरिकों पर हर्जाना लगेगा और उसे अधिकतम एक साल की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है.

यह नया कानून फिलहाल फिलीपींस की सीनेट के पास विचाराधीन है. सीनेट की मंजूरी मिलते ही बिल कानून बन जाएगा और नेशनल एंथम के कथित अपमान के लिए नागरिकों को मुर्गा बनाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा.

चीन में फिलिपींस के राष्ट्रपति रॉड्रिग दुर्तेते के साथ राष्ट्रगान पढ़ते फिलिपिनो समुदाय के लोग.

चीन में फिलिपींस के राष्ट्रपति रॉड्रिग दुर्तेते के साथ राष्ट्रगान पढ़ते फिलिपिनो समुदाय के लोग.

देशभक्ति कौन नापेगा?

नेशनल एंथम चाहे कहीं का भी हो, वह पूरे जोश में गाया जाता है. लेकिन जोश मापक कानून पहली बार लाया जा रहा है. सवाल ये है कि जोश कम है या ज्यादा यह तय करने का पैमाना क्या है? सार्वजनिक तौर पर जब नेशनल एंथम गाया जा रहा हो तो फिर हर आदमी को अटेंशन में होना चाहिए.

लेकिन फिलीपींस में कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो खुद नेशनल एंथम गाने के बदले  दूसरों की देशभक्ति नाप रहे होंगे. ये लोग शायद सरकारी कर्मचारी होंगे, क्योंकि इनका काम दूसरों की गलती निकालना होगा इसलिए उन्हें देशभक्ति के प्रदर्शन में छूट दी जाएगी.

इस कानून के साथ कई और विचित्रताएं हैं. मसलन किसी नागरिक पर यह चार्ज लगाया जाता है कि उसने जोश में राष्ट्रगान नहीं गाया तो वह साबित करने का आधार क्या होगा? क्या हर नागरिक की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी या फिर सरकारी कर्मचारी के कह देने भर से मान लिया जाएगा कि फलां नागरिक ने राष्ट्रगान गाते वक्त जोश नहीं दिखाया?

लाई डिटेक्टर क्यों नहीं लगवाती सरकार?

सिर्फ सरकारी अमला देशभक्त है और राष्ट्र के प्रति बाकी नागरिकों की निष्ठा सवालों के  घेरे में है. यही बुनियादी सोच इस कानून के पीछे है. अब अगला सवाल ये हो सकता है कि नागरिक ने जोश तो दिखाया लेकिन उसका जोश असली था या नकली ये कैसे तय हो? ये भी तो हो सकता है कि नागरिक राष्ट्रगान गाते वक्त एक्टिंग कर रहा हो. तो क्या नागरिक का दिल पढ़ने के लिए सरकारें लाई डिटेक्टर का सहारा लेंगी?

देशभक्ति के सार्वजनिक प्रदर्शन का यह पागलपन थाईलैंड में भी है. थाईलैंड में हर रोज सुबह 8 बजे और शाम 6 बजे लाउडस्पीकर पर राष्ट्रगान बजाया जाता है. उस वक्त सबको अटेंशन में खड़ा होना पड़ता है. राष्ट्रगान के अपमान के कुछ मुकदमे भी दर्ज हुए हैं. वहां के राष्ट्रवादी लगातार इस बात की मांग कर रहे हैं जब राष्ट्रगान बज रहा हो तो ट्रैफिक रोकने का कानून बनाया जाये. कानून बन भी जाता. लेकिन सरकार शायद ये सोचकर रुक गई कि चलती ट्रैफिक में जब अचानक ब्रेक लगेगा और हादसे होंगे तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

देशभक्ति के सार्वजनिक प्रदर्शन में भारत आगे

मुझे याद है, पिछले साल मुंबई के एक मल्टीप्लेक्स में एक महिला ने किसी फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान एक बुजुर्ग की पिटाई कर दी. बाद में पता चला कि वह महिला बॉलीवुड के किसी फ्लॉप विलेन की बीवी थी और उसकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि राष्ट्रगान के वक्त वह बुजुर्ग खड़ा क्यों नहीं हुआ. जाहिर सी बात है जब जन-गण-मन बजाया जा रहा होगा तब उन महिला का ध्यान राष्ट्रगान पर नहीं बल्कि आसपास के लोगों पर रहा होगा.

अमेरिका में भारतीय राष्ट्रगान के दौरान पीएम मोदी.

अमेरिका में भारतीय राष्ट्रगान के दौरान पीएम मोदी.

आधा भारत आजकल यही कर रहा है. आप ईमानदारी से टैक्स दें या ना दें, ट्रैफिक नियमों का पालन करें या ना करें, देशभक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन कीजिये, बाकी सारे पाप धुल जाएंगे. राष्ट्रीय प्रतीकों की अपनी एक गरिमा होती है. बेजा प्रदर्शन से यह गरिमा धूमिल होती है. लेकिन अंध-राष्ट्रवाद के माहौल में कोई भी यह समझने को तैयार नहीं है. मुझे कभी यह समझ में नहीं आया कि सिनेमा देखने से पहले ही राष्ट्रगान बजाया जाना क्यों जरूरी है. एक कैजुअल माहौल में लोग पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक लेकर जिस तरह राष्ट्रगान के लिए खड़े होते हैं, उससे हमारे नेशनल एंथम का मान किस तरह बढ़ता है?

सिर्फ आम नागिरक दें देशभक्ति का प्रमाण

शो से पहले राष्ट्रगान बजाया जाना पहले सिर्फ महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में अनिवार्य था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे पूरे भारत में लागू कर दिया गया है. जब यह फैसला आया उस समय कोई फिल्म फेस्टिवल चल रहा था. आयोजकों ने अदालत से पूछा कि फेस्टिवल में तो एक के बाद एक करके कई शो होते हैं, तो क्या राष्ट्रगान हर शो से पहले बजाना पड़ेगा. कोर्ट ने कहा- बिल्कुल. हर शो से पहले बजाया जाना अनिवार्य है.

इसके बाद उसी अदालत में किसी ने एक जनहित याचिका दाखिल की, जिसमें यह कहा गया कि अदालतें संविधान की रक्षक हैं, इसलिए कोर्ट रूम में भी नेशनल एंथम बजाया जाना चाहिए. जवाब में माननीय न्यायालय ने कहा- आपकी याचिका विचार योग्य नहीं है, इसे खारिज किया जाता है.

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