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हॉलीवुड फिल्मों की तरह मंगल पर उतरेगा मानव, लाल ग्रह पर होने वाला है मंगल

साल 2030 तक मंगल पर नासा मानव मिशन भेजने में जुट चुका है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval | Published On: Mar 24, 2017 05:50 PM IST | Updated On: Mar 24, 2017 06:14 PM IST

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हॉलीवुड फिल्मों की तरह मंगल पर उतरेगा मानव, लाल ग्रह पर होने वाला है मंगल

धरती के लिये रहस्य तो ब्रह्मांड की कायनात में एक खामोश सा अफसाना मंगल ग्रह. वैज्ञानिकों की नजर में वो लाल ग्रह जो अपनी आग अरबों साल से अपनी राख में छुपाए बैठा है. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक एक वो ग्रह जिसका धरती से सीधा रिश्ता है. धरती से 40 करोड़ दूर इस ग्रह पर इंसान भेजने की हसरत साल 2030 तक पूरी हो सकती है.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगल ग्रह पर इंसान भेजने के लिये नासा को तकरीबन 20 अरब डॉलर की सौगात दी है. ट्रंप ने नासा के अंतरिक्ष प्रोग्राम्स के लिये 19.5 बिलियन डॉलर की मंजूरी दी है.

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, ‘करीब छह दशकों से नासा लाखों अमेरिकियों को दूर की दुनिया और यहां धरती पर उससे बेहतर जिंदगी के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता रहा है. मुझे इस बिल पर दस्तखत करके खुशी हुई. लंबे समय बाद ऐसे किसी बिल पर दस्तखत हो रहे हैं, जो नासा के खास मिशन स्पेस में इंसान को भेजना, स्पेस साइंस और टेक्नोलॉजी के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को बताता है.’

ट्रंप का बिल पर दस्तखत करना आसमान में जमीन की तलाश में जुटे नासा के लिये हौसला बढ़ाने वाला कदम है. न सिर्फ नासा बल्कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिये मंगल ग्रह को लेकर कौतूहल न सिर्फ रिसर्च बल्कि एक चुनौती भी है. मंगल पर जीवन की तलाश में धरती पर कई थ्योरियां समय समय पर सुलझाने का दावा किया जाता रहा है.

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नासा ने हाल ही में मंगल ग्रह पर खारे पानी की मौजूदगी का सबूत दिया था. नासा के मुताबिक मंगल ग्रह अभी भी भौगोलिक रूप से सक्रिय है क्योंकि वहां बहता हुआ पानी मौजूद है. इस नई खोज ने मंगल पर जीवन की संभावना को जोर दे दिया है.  दरअसल इस रिसर्स से पहले तक मंगल पर मीथेन गैस की मौजूदगी पर सवाल उठते थे.

आखिर ऐसी क्या वजह है कि धरती की नजर इस लाल ग्रह पर ही टिकी हुई है. आखिर क्यों नासा ने मंगल ग्रह को लेकर मानव मिशन की तैयारियां शुरु की हैं? आखिर क्यों अब तक लगभग 45 मंगल अभियान शुरू किए जा चुके हैं?

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दरअसल वैज्ञानिकों के मुताबिक मंगल पर कभी घना वायुमंडल था. बादल गरजते थे तो घनघोर बारिश भी होती थी. मंगल पर बहती नदियां थीं तो झील-तालाब और समंदर भी थे. लेकिन लाखों साल के बाद मंगल पर सबकुछ मिटता चला गया. आज मंगल एक बंजर जमीन में तब्दील हो चुका है. मानो इसका कोना कोना किसी ने जला डाला हो और तभी ये आज तक लाल ही दिखाई देता है. हालांकि वैज्ञानिक तथ्य कहते हैं कि मंगल की मिट्टी के लौह खनिज में जंग लगने की वजह से वातावरण और मिट्टी लाल दिखती है.

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मंगल की सतह पर धूल भरे तूफानों का उठना आम बात है.  कभी-कभी यह तूफान पूरे मंगल तक को ढक लेता है. मंगल पर बहुत बड़े और बेहद पुराने ज्वालामुखी भी हैं. लेकिन ये ज्वालामुखी निष्क्रिय हैं. मंगल पर गहरी खाई हैं जो धरती की सबसे बड़ी खाई से भी बहुत ज्यादा बड़ी हैं. मंगल का गुरुत्वाकर्षण धरती के गुरुत्वाकर्षण का एक तिहाई है.

सूर्य से दूरी के हिसाब से बुध, शुक्र और पृथ्वी के बाद मंगल चौथा ग्रह है. सौरमंडल के आठ ग्रहों में बुध के बाद मंगल सबसे छोटा ग्रह है. मंगल के दो चंद्रमा हैं, फोबोस और डेमोस हैं. फोबोस चंद्रमा डेमोस से थोड़ा बड़ा है. फोबोस मंगल की सतह से सिर्फ छह हजार किलोमीटर ऊपर परिक्रमा करता है. हॉलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्म अवतार को देखकर मंगल की खूबसूरती का अंदाजा लगाया जा सकता है. चांदनी रात में सीना तानें पहाड़ों के दरम्यान झांकते दो – दो चांद इंसानी कल्पनाओं को अनंत आकाश में ले जाने के लिये काफी है.

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हालांकि मंगल पर जीवन की तलाश में सबसे बड़ी बाधा वहां का वातावरण है. मंगल के वायुमंडल में ज्यादातर कार्बन डाइआक्साइड गैस है. थोड़ी-सी नाइट्रोजन और आर्गन गैस है. ऐसे में इंसान अगर पहुंच भी गए तो उनके लिये सांस लेना नामुमकिन है .

मंगल और धरती करीब दो साल में एक दूसरे के सबसे करीब होते हैं. दोनों के बीच की दूरी तब सिर्फ पांच करोड़ 60 लाख किलोमीटर होती है. मंगल का एक दिन 24 घंटे से थोड़ा ज्यादा होता है. मंगल सूरज की एक परिक्रमा धरती के 687 दिन में करता है. मंगल का एक साल धरती के 23 महीने के बराबर हैं.

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मंगल ग्रह को पुराणों में धरती पुत्र भी कहा गया है. मंगल ग्रह के साथ जुड़े मिथक में ग्रीक और रोम की पुराणिक कथाएं भी जीवंत हैं. नारंगी-लाल रंग की वजह से प्राचीनकाल में रोम और यूनान के लोग मंगल को युद्ध का देवता मानते थे.

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इंसानी कोशिश का सपना है कि मंगल पर आशियाना बसाया जा सके. लेकिन इसके अलावा रहस्य की परतों में लिपटे इस लालग्रह की खोज की एक बड़ी वजह ये भी है कि आखिर मंगल ग्रह कैसे खाक में मिल गया. ये जानना चाहते हैं कि आखिर मंगल पर कभी जीवन था या नहीं और था तो फिर कैसे एक बसी बसाई सभ्यता और प्रजाति खत्म हो गई. कहीं भविष्य में धरती के साथ भी ऐसी कोई ब्रह्मांड की आपदा न घट जाए जो इंसानों की प्रजाति को ही समाप्त कर डाले.

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मंगल ग्रह को लेकर कॉन्सपिरेसी थ्योरियां भी लगातार आती रहती हैं. एलियंस के वजूद को लेकर रिसर्च कर रहे यूएफओ हंटर्स हमेशा ही नासा के स्पिरिट रोवर की भेजी गई तस्वीरों में एलियंस होने का दावा करते आए हैं. कभी मंगल ग्रह पर एलियंस का घर दिखने का दावा किया गया तो कभी एलियंस के स्केलेटन, छोटे एलियंस, खुले बालों वाली महिला, मिलिट्री बंकर, केकड़ा और तमाम चीजें देखने के दावे किए गए.

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कभी रोवर क्यूरियोसिटी में लगे कैमरों से मंगल की सतह से उठती रहस्यमयी रोशनियां कैद की गई हैं.  यूएफओ साइटिंग्स डेली नाम की वेबसाइट चलाने वाले स्कॉट सी. वेरिंग का दावा है कि ये सूरज की रोशनी नहीं बल्कि वहां मौजूद एलियंस हैं. मंगल ग्रह की इंटेलिजेंट लाइफ इन रोशनियों का इस्तेमाल कर रहे हैं. एलियन हंटर्स ने तो ये तक आरोप लगाया कि मंगल ग्रह से मिल रही एलियंस की जानकारियों को नासा छुपा रहा है. हालांकि नासा ऐसी तमाम थ्योरीज और दावों को हमेशा खारिज करता आया है.

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साल 1960 से अब तक लगभग 45 मंगल अभियान शुरू किए जा चुके हैं और इनमें से एक तिहाई असफल रहे हैं. पहला मिशन मेरिनर-4 था. अभी भी तीन उपग्रह मार्स ओडिसी, मार्स एक्सप्रेस और मार्स ऑर्बिटर मंगल के चक्कर काट रहे हैं. मार्स स्पिरिट और अपॉर्च्यूनिटी हाल में ही निष्क्रिय हुए हैं इसके बावजूद मंगलग्रह की कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल सकी है. लेकिन अंतरिक्ष में एक मंगल उड़ान के साथ भारत कामयाब मंगल मिशन शुरु करने वाले उन चंद देशों में शामिल हो गया जिनकी अंतरिक्ष टेकनॉलॉजी हर रोज कामयाबियों के नए आसमान तैयार करती है. रूस, अमेरिका, जापान, चीन और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद भारत ने दुनिया की छठी अंतरिक्ष शक्ति से सम्पन्न देशों की फेहरिस्त में अपना नाम दर्ज कराया है. ऐसे में नासा को ट्रंप की मिली अरबों डॉलर की सौगात ब्रह्मांड के महामिशन यानी मंगल पर इंसान को भेजने की कल्पनाओं को उड़ान दे सकती है. बहरहाल ब्रह्मांड के इस लाल ग्रह पर मंगल हो ...बस यही कामना है.

 

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