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भारत के लिए बढ़ती परेशानी, खाड़ी देश कर रहे हैं लामबंदी

घमासान खाड़ी के छोटे मगर रसूखदार मुल्क कतर को बिरादरी से बाहर करने को लेकर है

FP Staff | Published On: Jun 07, 2017 12:14 AM IST | Updated On: Jun 07, 2017 12:14 AM IST

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भारत के लिए बढ़ती परेशानी, खाड़ी देश कर रहे हैं लामबंदी

खाड़ी देशों के मोहल्ले में इन दिनों खासा घमासान मचा है. घमासान खाड़ी के छोटे मगर रसूखदार मुल्क कतर को बिरादरी से बाहर करने को लेकर है.

गल्फ को ऑपरेशन काउंसिल यानी जीसीसी के सऊदी अरब और यूएई जैसे चौधरियों ने कतर का हुक्का-पानी बंद करने का ऐलान किया है. कतर पर आरोप है कि वह सीरिया और इराक में अलकायदा, आईएसआईएस को आर्थिक रसद दे रहा है.

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के अलावा मिस्र, बहरीन, मॉरिशस, मालदीव समेत कुल आठ मुल्क अब तक कतर के खिलाफ पाबंदियों का ऐलान कर चुके हैं. इसका नतीजा यह हुआ है कि कतर को हवाई उड़ानों में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि सऊदी समेत कई मुल्कों ने अपना एयरस्पेस कतर एयरवेज के लिए बंद कर दिया है.

इस समस्या की तात्कालिक जड़ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया खाड़ी दौरे में है, जिसके बाद इस इलाके में उथल-पुथल बढ़ गई है. बीते दिनों इस्लामिक मुल्कों के सम्मेलन में भाग लेने सऊदी अरब की राजधानी रियाद पहुंचे थे.

सऊदी के सुल्तानों ने ट्रंप के स्वागत में खासी गर्मजोशी दिखाई. अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी जेहादी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में इस्लामिक मुल्कों को अगुवाई करने को कहा.

आतंकवाद की जड़ों को सींचने वालों के खिलाफ ठोस कार्रवाई

साथ ही ट्रंप ने सऊदी अरब समेत अन्य मुल्कों से इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साथ देने और आतंकवाद की जड़ों को सींचने वालों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने को कहा. अमेरिका और सऊदी अरब के बीच बड़े निवेश और कारोबारी समझौते भी हुए.

राहत के तौर पर ट्रंप ने ये भी भरोसा दिया कि अमेरिका व्यवहारिक कूटनीति की राह पर चलेगा. वो किसी को ये नहीं बताएगा की उनको अपना मजहब कैसे मानना चाहिए, क्या पहनना चाहिए या मुल्क कैसे चलना चाहिए. एक तरह से सऊदी जैसे मुल्कों को मानवाधिकार, महिला अधिकार और लोकतंत्र के मुद्दे पर किसी अमेरिकी दखल या नसीहत का डर नहीं होगा.

इस्लामिक मुल्कों के सम्मेलन में विरोध के निशाने पर खास तौर पर ईरान नजर आया. ट्रंप ईरान के साथ अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए करार को अमेरिकी हितों के खिलाफ समझौता करार दे चुके हैं. ईरान को लेकर फिलहाल ट्रंप प्रशासन और सऊदी अरब समेत खाड़ी मोहल्ले के कई मुल्कों के हित साझा होते हैं.

ऐसे में ईरान और तुर्की के करीबी माने जाने वाले कतर के लिए परेशानी लाजमी थी. कतर यूं तो छोटा मुल्क है मगर उसके पास तेल और गैस का बड़ा भंडार है. सऊदी अरब के प्रभाव के खिलाफ भी कतर बागी अंदाज में खड़ा होता रहा है.

ये सभी मुल्क है खिलाफ

वैसे यह पहला मौका नहीं है कि अरब कुनबे में कतर को लेकर सवाल उठाए गए हों. ईरान से दोस्ती, मिस्र में मोरसी सरकार को समर्थन, मुस्लिम ब्रदरहुड की हिमायत, हिजबुल्लाह और हमास जैसे संगठनों से हमदर्दी को लेकर कतर को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है. ये सारे वो नाम हैं जिनके खिलाफ कई मुल्क खड़े हैं. मसलन इजराइल और सऊदी अरब ईरान के खिलाफ एक खेमे में हैं. लिहाजा अबकी बार संकट थोड़ा गहरा है क्योंकि लामबंदी तगड़ी है.

यह संकट इतनी जल्दी खड़ा हो जाएगा इसकी उम्मीद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी नहीं की होगी. कतर में सीधे अमेरिकी हित भी जुड़े हैं. 9/11 हमले के बाद सऊदी अरब के साथ रिश्तों में आई खटास के बाद अमेरिका अपने सैन्य ठिकाने को सऊदी के प्रिंस सुल्तान एयर बेस से कतर के अल-उदैद एयर बेस ले गया था.

अमेरिकी सेंट्रल कमांड का ये ठिकाना सीरिया में आईएसआईएस के खिलाफ बमबारी में काम आ रहा है. इसके अलावा कतर में अमेरिकी निवेश भी खासा बड़ा है.

भारत के हित

अरब मोहल्ले के इस घमासान से यूं तो भारत दूर है लेकिन उसकी रुचि वाजिब है. कतर के साथ भारत के न केवल गहरे कारोबारी रिश्ते हैं बल्कि वहां सबसे बड़ी विदेशी आबादी भारतीयों की है. इस मामले को लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ये स्पष्ट कर चुकी हैं कि भारत हालात पर नजर रखे हुए है. हालांकि उसका सीधा संबंध तभी होगा जब कतर के इस संकट में भारतीय फंस जाते हैं या प्रभावित होते हैं.

कतर में भारतीय निवेश भी काफी है. भारतीय कंपनी एल और टी 74 करोड़ डॉलर की लागत वाली निर्माण योजना से जुड़ी है.

भारत और कतर का आपसी कारोबार करीब 16 अरब डॉलर का है. भारत के रिश्ते सऊदी अरब से भी अच्छे हैं और कतर से भी. ऐसे में भारत इस मामले में केवल किनारे का दर्शक ही है. मगर ये चिंता जरूर है कि अगर लहरों ने किनारा तोड़ा तो चिंता के सबब ज़्यादा होंगे.

वैसे खाड़ी के इस संकट में भारत की दिलचस्पी की एक वजह इस पूरे मामले में पाकिस्तान की मुश्किल भी है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ रियाद में 18-20 मई को हुए इस्लामिक मुल्कों के सम्मेलन में जो बर्ताव हुआ वो तो सबने देखा. शरीफ को बोलने का मौका भी नहीं दिया गया.

पाकिस्तान के लिए उससे भी ज़्यादा बड़ा संकट इस्लामिक मुल्कों के सैन्य गठबंधन की अगुवाई को लेकर है. इसका नेतृत्व पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहील शरीफ के हाथ में है जिसको लेकर पाकिस्तान के भीतर ही काफी आलोचना हो रही है.

इतना ही नहीं जिस तरह से इस्लामिक सैन्य गठबंधन ईरान विरोधी मोर्चा बनता जा रहा है उसको लेकर तेहरान और इस्लामाबाद के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. डर इस बात का भी है कि कहीं जरा सी चिंगारी बड़े टकराव की आग ने सुलगा दे.

साभार न्यूज़ 18 

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