S M L

मैनचेस्टर आतंकी हमला: समस्या की जड़ तक गए बगैर इलाज नामुमकिन

हम जब तक आतंकवाद की जड़ का पता नहीं लगाएंगे. हम जब तक ये नहीं मानेंगे कि इसकी जड़ें कट्टरवादी इस्लाम से जुड़ी हैं

Sreemoy Talukdar | Published On: May 25, 2017 04:08 PM IST | Updated On: May 25, 2017 04:08 PM IST

0
मैनचेस्टर आतंकी हमला: समस्या की जड़ तक गए बगैर इलाज नामुमकिन

मैनचेस्टर में आतंकी हमले को दो दिन बीत चुके हैं. हम अब तक इस हमले से जुड़े कई सवालों के जवाब नहीं हासिल कर सके हैं. मैनचेस्टर अरेना में हुआ आतंकी हमला पश्चिमी सभ्यता के दिल में हुआ अटैक था. इसके जरिए हर उस चीज को निशाना बनाया गया जो पश्चिमी सभ्यता के प्रतीक हैं.

इस आतंकी हमले में 22 जिंदगियां मौत के मुंह में समा गईं. इनमें से एक सैफी रोज रूसोस सिर्फ 8 बरस की थी. अभी तो वो अपनी जिंदगी ठीक से शुरू भी नहीं कर पाई थी इसी तरह ओलिविया कैम्पबेल महज 15 साल की थी.

इस हमले के बाद अभी भी साठ के करीब बच्चे और किशोर मौत से जंग लड़ रहे हैं. यानी मरने वालों का आंकड़ा और बढ़ सकता है.

हमें बार-बार बताया जाता है कि आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता. आतंकवादी सिर्फ नफरत का संदेश लाते हैं. उनके दिल स्याह होते हैं. वो सिर्फ लोगों को मारना चाहता हैं. हमें बताया जाता है कि आतंकवादियों की कोई जड़ नहीं होती. वो खुदा को नहीं मानते वो सिर्फ मारने वाली मशीनें हैं.

राजनेता हों या विचारक, पत्रकार हों या लेखक- तरक्कीपसंद खयाल रखने वालों की जमानत बार-बार, हर आतंकी हमले के बाद यही बात दोहराती है. वो अपने तर्कों के वाहियातपने को मानने को राजी नहीं हैं.

क्या कोई किसी को बिना किसी मकसद के मार सकता है? क्या इंसान बहुत से लोगों का एक साथ बेमकसद ही कत्ल करते हैं? कत्ल सिर्फ एक जुर्म नहीं. ये कानून के खिलाफ उठाया गया कदम भर नहीं है. ये कुदरत के कानून के खिलाफ भी है. ये एक मनोविकार वाली घटना है.

अगर हमारे आतंकियों के बारे में तरक्कीपसंद ख्याल, लिबरल जमात के विचार सही हैं तो हमें मानवता के इतिहास पर फिर से गौर करना होगा. ये सोचना कि इंसान बिना मतलब ही किसी को मार देते हैं. ये बात तो इस सिद्धांत के खिलाफ है कि इंसान समझदार जीव है. वो सोच-समझकर फैसला लेता है. फिर तो अब तक का इतिहास ही बेकार हो जाएगा.

ये भी पढ़ें: संदिग्ध के भाई और बहन को लीबिया पुलिस ने गिरफ्तार किया

लिबरल जमात की सोच को कई बार चुनौती दी गई है. सलमान रश्दी, सैम हैरिस, माजिद नवाज, अली अहमद रिजवी या अयान हिरसी अली ने कई बार इस सोच को चुनौती दी है. जब भी ऐसा हुआ है तो लिबरल जमात ने खुद को कुतर्कों के किले में कैद करके लिया है.

ये जमात आतंकवादियों को पीड़ित बताने लगते हैं. इस तरह से वो आतंकवादियों के बेगुनाह लोगों को मारने के पाप को जायज ठहराते हैं. फिर लिबरल जमात ये तर्क देती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. कोई विचारधारा नहीं होती.

फिर तमाम नए लफ्ज गढ़े जाते हैं जिनके जरिए आतंकवादियों की हरकतों को छुपाने की कोशिश होती है. जैसे कि पाकिस्तान ने अजमल कसाब के बारे में कहा कि वो, 'नॉन स्टेट एक्टर' था. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे हिंसक उग्रवाद का नाम दिया. ओबामा का मानना था कि आतंकवाद को किसी विचारधारा से जोड़ने का मतलब आतंकियों के हाथों में खेलना था. तर्क सही था. मगर इसके नतीजे उल्टे हुए.

हमने आतंकवाद को ईमानदारी से नहीं देखा, सोचा-समझा. हमने अपनी सोच के दरवाजे बंद कर लिए. हम देख ही नहीं पा रहे हैं कि आतंकवाद की जड़ कहां है. आतंकवाद इसीलिए नहीं रोका जा सका क्योंकि आतंकवाद को ओबामा ने इस्लामिक आतंकवाद कहने से इनकार कर दिया.

Barack Obama

ऐसा माना जाता है कि इस्लामी आतंकवाद को लेकर ओबामा का रवैया नर्म था

ओबामा प्रशासन की गलती

ओबामा प्रशासन इसके बदले में आतंकियों से जुड़े समुदाय को पीड़ित बताता रहा. नतीजा ये कि आज हम जब भी आतंकवाद का मसला उठाते हैं पीड़ित समुदाय की बात होने लगती है. जुल्मो-सितम के किस्से दोहराए जाते हैं. ये सोच हमें बहुत नुकसान पहुंचा रही है.

जेफरी टेलर ने क्विलेट में लिखा कि, 'कोई भी भाषण शब्दों से बनता है. हम कौन से शब्दों को इस्तेमाल करते हैं, किस तरह इस्तेमाल करते हैं ये बात बेहद अहम है. बकवास राजनीति के इतिहास में ओबामा प्रशासन का इस्लामिक आतंकवाद को हिंसक उग्रवाद कहना बेहद उलझा हुआ शब्दजाल है. ये कायरता है. ये आतंकवादियों की विचारधारा की तरफ से आंखें मूंद लेना है.

हिंसक उग्रवाद कहकर आतंकवाद को जड़विबीन, खोखला बताना है. 'ये झूठ इस तरह से प्रचारित किया गया कि इसके आगे डोनाल्ड ट्रंप का इस्लामिक आतंकवाद कहना बेहद साहसिक बात लगने लगी.'

सिर्फ विचाराधारा के मामले में हमें बेईमानी से नुकसान नहीं हुआ. ब्रिटिश सरकार की साल 2008 की एक रिपोर्ट कहती है कि युवाओं को इस्लामिक उग्रवाद से दूर करने की कोशिशों को राजनैतिक भाषा से नुकसान पहुंचा है. तमाम नेता अपने आपको बचाने के लिए ऐसे शब्द चुनते हैं जो मिशन को झटका देने वाले होते हैं.

ये भी पढ़ें: कौन था सुसाईड बॉम्बर सलमान आबिदी

ब्रिटेन ने मुस्लिम समुदाय को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के लिए लाखों पाउंड खर्च किए. उन्हें समझाया कि वो उग्रवादी विचारधारा और गतिविधियों का विरोध करें. वो दूसरे लोगों को भी ऐसा करने के लिए समझाएं. लेकिन ये कोशिश नाकाम हुई. वजह ये थी कि युवाओं को हिंसक विचारधारा से दूर करने का लक्ष्य क्या था..कहां पर ताकत लगानी थी ये किसी को पता ही नहीं था.

ब्रिटिश सरकार की रिपोर्ट कहती है कि सीधे-सीधे इस्लाम का नाम लेने से दो समुदायों के बीच तनाव बढ़ सकता था. ये खामख्याली सिर्फ शब्दजाल तक सीमित नहीं. बहुत से लोगों को ये भी भरोसा है कि हम बार-बार जो पीड़ित होने की बातें करते हैं वो वजह खत्म कर दें तो उग्रवाद भी खत्म हो जाएगा.

क्योंकि अगर इसे उल्टा करके देखें तो यू लगेगा कि किसी भी पीड़ित को आतंकवादी होने का अधिकार है. यानि अगर कोई पीड़ित है तो वो आतंकवादी बन जाए?

कई लोग इसके लिए राजनैतिक दलों की दमघोटूं नीतियों को दोषी मानते हैं

कई लोग आतंकवाद के लिए राजनैतिक दलों की दमघोटूं नीतियों को दोषी मानते हैं

दमघोंटू नीतियां

पश्चिमी देश लंबे वक्त से खुद को दमघोंटू कोने में धकेले हुए हैं. वो इस्लामिक आतंकवाद नहीं कहना चाहते. इसीलिए वो शब्दजाल बुनते हैं. वो डरते हैं कि कहीं सीधे इस्लाम का नाम लेने से मुस्लिम समुदाय खुद को एक बार फिर से न पीड़ित समझ ले. नतीजा ये कि आतंकवाद अपना विस्तार करता जा रहा है. यूरोप आज इसी खामख्याली की खूनी कीमत चुका रहा है.

आखिर कौन सा ऐसा दर्द है जो किसी आदमी को अपने पेट में बम लपेटकर एक कंसर्ट के बीच खुद को उड़ा देने के लिए प्रेरित करता है. वो उन लोगों के बीच जाकर अपने आप को उड़ा लेता है जो बेगुनाह हैं और महज संगीत का लुत्फ लेने के लिए जमा हुए हैं?

गेट स्टोन इंस्टीट्यूट की पत्रिका में पीटर हसी 2013 के बोस्टन धमाकों के बारे में लिखते हैं, 'द न्यूयॉर्क टाइम्स ने सरकार पर इल्जाम लगाया है कि वो बम धमाके करने वाले परिवार को अमेरिकी समाज की मुख्यधारा से नहीं जोड़ सकी. इसका तो ये मतलब हुआ कि अगर वो मुख्यधारा से नहीं जुड़ सके तो वो जाकर बोस्टन मैराथन में बम फोड़ दें.

उसके बाद उन बमबाजों की खूबियां गिनाई जाने लगीं. वो दिलकश थे. लड़कियों के बीच लोकप्रिय थे. फिर आतंकवाद की सफाई में नया तर्क आया. साफ है कि बम धमाके करने वाले दोनों भाई किसी आतंकवादी गुट के सदस्य नहीं थे. वो अपने आप में ही धमाके करने की साजिश रच रहे थे. क्योंकि अमेरिका ने उन्हें नहीं अपनाया. न्यूयॉर्क टाइम्स के कहने का मतलब ये था कि, 'धमाके उन्होंने किए मगर गलती हमारी थी'.

ये भी पढ़ें: मैनचेस्टर हमलावर की हुई पहचान, और हो सकते हैं हमले

ब्रिटिश पुलिस ने बताया है कि मैनचेस्टर में धमाका करने वाला सलमान आबिदी नाम का 22 बरस का एक युवक था. वो ऐसे ही आतंकवादियों की जमात का हिस्सा लगता है. ब्रिटिश हो या फ्रेंच समाज दोनों ही कई संस्कृतियों का मेल हैं. फिर भी इन देशों में लगातार आतंकवादी हमले हो रहे हैं. आखिर क्यों?

हम जब तक ईमानदारी से इस सवाल का सामना नहीं करेंगे. इसके जवाब नही तलाशेंगे, हम बार बार आतंकवाद के शिकार होंगे.

सलमान आबिदी के मां-बाप लीबिया से आए शरणार्थी थे. वो गद्दाफी की तानाशाही से बचने के लिए लीबिया से भागे थे. आबिदी के बारे में बताया जा रहा है कि ब्रिटेन में ही पैदा हुआ और वहीं उसकी परवरिश हुई थी. लेकिन वो कई बार लीबिया गया था. अभी वो पिछले हफ्ते ही वहां से लौटा था.

London : Emergency services at the scene outside the Palace of Westminster, London, Wednesday, March 22, 2017. London police say they are treating a gun and knife incident at Britain's Parliament "as a terrorist incident until we know otherwise." The Metropolitan Police says in a statement that the incident is ongoing. It is urging people to stay away from the area. Officials say a man with a knife attacked a police officer at Parliament and was shot by officers. Nearby, witnesses say a vehicle struck several people on the Westminster Bridge. AP/ PTI(AP3_22_2017_000240B)

धमाके के बाद  की प्रतीकात्मक तस्वीर

कट्टरपंथ से प्रभावित

ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ के मुताबिक आबिदी हाल ही में कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित हुआ था. हालांकि, ये साफ नहीं कि ऐसा कब हुआ. वो एक स्थानीय मस्जिद में इबादत के लिए जाता था. इस मस्जिद पर जिहादियों के लिए पैसे जुटाने का आरोप लगा था.

द टेलीग्राफ ने सलमान आबिदी की पड़ोसी लीना अहमद से बात की. 21 बरस की लीना ने बताया कि कुछ महीनों पहले सलमान जोर-जोर से सड़क पर कलमा पढ़ रहा था. वो अरबी भाषा में कलमा पढ़ रहा था. वो कह रहा था कि खुदा एक है और मुहम्मद साहब उसके पैगंबर हैं. एक और पड़ोसी ने बताया कि आबिदी और उसका परिवार बेहद धार्मिक हैं.

तमाम सबूत इशारा करते हैं कि वो ऐसा मुसलमान था जिसकी धर्म में गहरी आस्था थी. फिर भी मैनचेस्टर के मेयर ने मारे गए लोगों की याद में आयोजित कार्यक्रम में कहा कि आबिदी मुस्लिम समुदाय की नुमाइंदगी नहीं करता.

बीबीसी से बातचीत में मेयर एंडी बर्नहम ने कहा, 'ये उग्रवादी कार्रवाई थी. ये किसी समुदाय से नहीं जुड़ी है. ये किसी धर्म से नहीं जुड़ी है. ये मैनचेस्टर की पहचान नहीं. बहुत से लोग इसका ठीकरा मुस्लिम समुदाय पर फोड़ना चाहेंगे. मगर मुझे लगता है ये कहना गलत होगा.'

ये भी पढ़ें: मैनचेस्टर के अरियाना ग्रांडे के कॉन्सर्ट में धमाका

मैनचेस्टर ये मेयर ने पूरी ईमानदारी से वो बात कही जिस पर वो यकीन करते हैं. वो शायद इस बयान से तमाम समुदायों को इस मुश्किल घड़ी में एकजुट करना चाहते थे. वो भी दूसरे नेताओ की तरह आतंकवाद को जड़ से रहित बताना चाह रहे थे. वरना फिर कई मुश्किल सवाल खड़े होते. मेयर बर्नहम की नीयत ठीक थी. लेकिन उनके जैसे बयानों से ही हम अब तक आतंकवाद का उपाय नहीं खोज सके हैं.

हम जब तक आतंकवाद की जड़ का पता नहीं लगाएंगे. हम जब तक ये नहीं मानेंगे कि इसकी जड़ें कट्टरवादी इस्लाम से जुड़ी हैं तब तक हम आतंकवाद का मुकाबला नहीं कर सकेंगे. हम वही पीड़ितों वाली दास्तानें सुनते सुनाते रहेंगे. हम बार-बार यही दोहराते रहेंगे कि आतंकवाद का मुस्लिम समुदाय से कोई ताल्लुक नहीं.

मशहूर लेखक सलमान रश्दी ने पिछले साल एक भाषण में कहा था, 'इस्लाम में एक ऐसा बदलाव आया है जो हिंसक है और बेहद ताकतवर भी. हमें इससे निपटना होगा. लेकिन इससे निपटने से पहले हमें इसे इसके सही नाम से बुलाना होगा'.

मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहम की तरह ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने भी कहा कि आतंकवाद को जीतने नहीं देंगे. हमले के बाद दिए भाषण में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने कहा कि ब्रिटेन के लोगों की सोच, उनके जज्बात आतंकवादियों के इरादों से ज्यादा मजबूत हैं. इसीलिए आतंकवादी कभी जीत नहीं सकेंगे. जीत हमारी ही होगी.

हमने ब्रिटेन के लोगों की अच्छी सोच को उस वक्त देखा जब अलग अलग समुदायों के लोग पीड़ितों के प्रति संवेदना जताने के लिए इकट्ठे हुए. मुहब्बत और एकता के ऐसे इजहार के बावजूद थेरेसा-मे ब्रिटेन की पहली ऐसी प्रधानमंत्री बन गईं जिन्हें ब्रिटिश सड़कों पर पांच हजार सैनिक तैनात करने पड़े.

इसके लिए थेरेसा-मे ने  ब्रिटेन पर खतरे के लेवल को एक स्तर और बढ़ाकर बताया. उन्होंने इसका नाम 'ऑपरेशन टेंपरर' रखा. इसके तहत ब्रिटेन में आतंकवादी हमलों की आशंका में हर कोने पर सैन्य बल तैनात किए गए हैं.

भले ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री कहें कि आतंकवाद कभी नहीं जीतेगा. लेकिन आतंकवादी अगर ब्रिटिश समाज में इतनी हलचल...इतनी आशंका और डर पैदा करने में कामयाब हुए हैं, अगर ब्रिटिश सरकार को ऐहतियातन सेना तैनात करनी पड़ी है तो इसका यही मतलब है कि आतंकवादी तो अपने मकसद में कामयाब हुए हैं. वो जीत गए हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi