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लाहौर उपचुनाव: नवाज शरीफ की पार्टी के लिए पंजाब में पैदा हो रहीं नई चुनौतियां

नवाज़ शरीफ के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद से बाहर होने के बाद साफ तौर से उपचुनाव नतीजे सत्ताधारी पीएमएल-एन के लिए सांत्वना बनकर आए हैं.

Saral Sharma Updated On: Sep 21, 2017 02:20 PM IST

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लाहौर उपचुनाव: नवाज शरीफ की पार्टी के लिए पंजाब में पैदा हो रहीं नई चुनौतियां

17 सितंबर को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (पीएमएल-एन) ने नेशनल असेंबली-120 (NA-120) लाहौर (III) उपचुनाव जीत लिया है. 28 जुलाई को पनामा पेपर्स केस में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के अयोग्य घोषित कर दिए जाने के बाद यह विधानसभा सीट खाली हुई थी.

हालांकि, चुनावी दौड़ में कई राजनीतिक पार्टियां थीं, लेकिन मुख्य मुकाबला इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ और शरीफ की पीएमएल-एन के बीच हुआ.

पीएमएल-एन ने बरकार रखी सीट

पीएमएल-एन उम्मीदवार और शरीफ़ की पत्नी बेगम कुलसुम ने 61,745 वोट हासिल किए, जबकि पीटीआई की यास्मीन राशिद को दूसरा स्थान मिला जिन्हें 47,099 वोट हासिल हुए. उम्मीदों के उलट वोट देने बहुत कम लोग घरों से बाहर निकले और विभिन्न मतदान केंद्रों पर चुनावी शिकायतों की खबरों के बीच तकरीबन 33 फीसदी मतदान हुआ.

हालांकि, पीटीआई 13,268 वोटों से चुनाव हार गई, कुल मिलाकर इस निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी का प्रदर्शन पिछले चुनावों के मुकाबले सुधरा है. जबकि, पीएमएल-एन के लिए जीत का अंतर 2013 के आम चुनाव के मुकाबले और भी कम हो गया है.

फिर भी उपचुनाव में यह जीत ऐसे अहम मौके पर आई है जब पार्टी शरीफ के अयोग्य घोषित हो जाने के बाद 2018 के लिए नेतृत्व संकट के बीच चुनावी रणनीति बनाने में जुटी है. नवाज़ और उनके भाई शहबाज़ (पाकिस्तान के पंजाब प्रॉविन्स के मुख्यमंत्री भी) के बीच मतभेद की खबरें भी आ रही हैं.

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एनए-120 उपचुनाव को दोनों ही पार्टियों पीएमएल-एन और पीटीआई के बीच 2018 के आम चुनाव को देखते हुए लिटमस टेस्ट माना जा रहा था. हालांकि नतीजे से आने वाले चुनाव का रुख पूरी तरह पता नहीं चलता, फिर भी पीएमएल-एन के लिए यह ‘आशानुरूप’ जीत राहत भरी है. इससे कहीं ज्यादा यह चुनाव नतीजा यह इशारा करता है कि पीटीआई सत्ताधारी पीएमएल-एन को पाकिस्तान पंजाब प्रॉविंस में कड़ी चुनौती देने जा रही है जो शरीफ का घरेलू चुनावी मैदान है. अगले साल होने वाले चुनाव को देखते हुए बहुत छोटे अंतर से मिली जीत सत्ताधारी पार्टी के लिए खतरा है.

हालांकि पीएमएल-एन दशकों से यह सीट जीतती चली आ रही है, इस उपचुनाव का पार्टी के लिए खासा महत्व था जिसमें समर्थकों के पास शरीफ के खिलाफ सर्वोच्च अदालत के आदेश को खारिज कर देने का मौका था.

पीएमएल-एन के लिए यह सकारात्मक नतीजा है क्योंकि यह परिणाम ऐसे समय में आया है जब अदालत ने भ्रष्टाचार के आरोपों पर शरीफ परिवार के सदस्यों के खिलाफ कार्यवाही शुरू की है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल में पनामा केस फैसले पर दो पुनीरीक्षण याचिकाओं को नामंजूर कर दिया. परिणामस्वरूप यह संभव है कि नवाज़ मुख्य धारा की राजनीति से अनिश्चितकाल के लिए बाहर ही रहें. उनके लिए पहले ही यहां से पतन की शुरुआत है. उनकी गैरमौजूदगी में पीएमएल-एन का मुख्य काम चेहरा तलाश करना है जो नवाज़ की राजनीतिक धरोहर को आगे ले जा सके और पार्टी के लिए भविष्य में चुनाव जीत सकें.

मरियम नवाज़.

मरियम नवाज़.

मरियम का टेस्ट था ये उपचुनाव

उपचुनाव को शरीफ की बेटी मरियम शरीफ के लिए भी टेस्ट के दौर पर देखा गया, जिन्होंने अपनी मां कुलसुम के लिए पार्टी के अभियान का नेतृत्व किया, जो फिलहाल लंदन में इलाज करा रही हैं.

मरियम को नवाज़ का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता है. चुनाव के दौरान, उन्होंने अपने पिता के समर्पण और राष्ट्र के लिए वचनबद्धता की प्रशंसा की और मतदाताओं से आग्रह किया कि वे अदालत के अयोग्यता संबंधी फैसले को खारिज करें. यह पहला मौका था जब उन्होंने पार्टी के चुनाव अभियान को करीब-करीब अकेले संभाला- हमज़ा शरीफ़, उसके चचेरे भाई और शहबाज़ के बेटे ने अभियान में हिस्सा नहीं लिया- और अपेक्षित सफलता हासिल की.

चुनाव नतीजे के बाद पार्टी का विश्वास उन्होंने हासिल किया, जो उन्हें 2018 के चुनावों में उनके लिए बड़ी भूमिका की अनुमति दे सकती है. पहले से ही वह भविष्य में नवाज़ के विकल्प के तौर पर देखी जा रही है.

पीटीआई के लिए अभी बाकी है लंबा सफर

हालांकि, पीएमएल-एन की जीत आश्चर्यजनक नहीं है, अहम सवाल ये था कि क्या पीटीआई शरीफों को उनके ही घरेलू पिच पर परास्त करेगी? हार के बावजूद पीटीआई ने कड़ी टक्कर दी और जीत के अंतर को बहुत कम कर दिया. पार्टी नवाज़ की अयोग्यता के बाद सकारात्मक परिणाम की उम्मीद कर रही थी जिससे वह अपने भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे को अगले चुनाव से पहले और मजबूत कर पाती.

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हालांकि, उपचुनाव एनए-120 में विपरीत नतीजे और इसके साथ लगातार राजनीतिक निराशा, ख़ैबर-पख्तूनख्वा प्रॉविन्स में सत्ताधारी पीटीआई का कुशासन और इमरान ख़ान के खिलाफ अवमानना- इन सबका असर पार्टी की समग्र छवि पर पडे़गा. इसे अगर समय रहते सही नहीं किया जाता है तो इससे 2018 में पार्टी की संभावना पर इसका चुनावी असर पड़ेगा. इसके अलावा पार्टी ने उपचुनाव को शरीफों के खिलाफ जनादेश के रूप में बदलने की कोशिश की, लेकिन यह कोशिश काम नहीं आई और उन्हें इसका फायदा नहीं मिला.

दिलचस्प बात ये है कि ख़ान ने चुनाव के दौरान इस बार सक्रिय भागीदारी नहीं दिखलाई. शायद इसकी वजह पाकिस्तान का चुनाव आयोग है जिसने सांसदों को चुनाव अभियान पर प्रतिबंध का कोड लागू कराया है. इसके बावजूद उन्होंने लाहौर में सार्वजनिक सभा की और एनए-120 चुनाव क्षेत्र के बाहर रैली की ताकि राशिद को समर्थन दिया जा सके. कहा जाता है कि दोनों ही समय में बहुत कम लोगों की उपस्थिति देखी गई जिससे पता चलता है कि लाहौर में पार्टी का प्रभाव बहुत सीमित है. इन सबके बावजूद कुल मिलाकर ओवरऑल चुनाव का नतीजा पीटीआई को खुश होने का कुछेक मौका दे सकता है.

दक्षिणपंथी ताकतों का उभार

अप्रत्याशित घटना के तौर पर दो दक्षिणपंथी उम्मीदवार शेख मोहम्मद अज़हर हुसैन रिज़वी जो तहरीक-ए-लब्बाइक या रसूल अल्लाह पार्टी और मोहम्मद याकूब शेख, एक स्वतंत्र नॉमिनी जिन्हें आतंकी संगठन जमात-उद-दावा जैसे आतंकी संगठन का समर्थन है. राजनीतिक दल जो संयुक्त राष्ट्र में पंजीकृत हैं कि पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग, मुख्यधारा की पार्टियों को नजरअंदाज करते हुए बढ़ रहे हैं. मिल्ली मुस्लिम लीग, मुख्यधारा की पार्टियों को नजरअंदाज करना जैसे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और जमात-ए-इस्लामी तीसरे और चौथे स्थान के लिए पदक की दौड़ में बने हुए हैं.

मील्ली मुस्लिम लीग के मोहम्मद याकूब शेख.

मिल्ली मुस्लिम लीग के मोहम्मद याकूब शेख.

उपचुनाव के बाद जमात-उद-दावा पार्टी का उभार और मुख्यधारा की पार्टी पीपीपी के मुकम्मल रूट जो दिख रहा है उसमें पंजाब की राजनीति की दो प्रमुख घटनाएं हैं. पीपीपी का बुरा प्रदर्शन सुझाता है कि पंजाब में पार्टी के प्रवेश की कोशिश निकट भविष्य में सफल होती नहीं दिख रही है.

कमजोर शीर्ष नेतृत्व, अन्तरमुख होती प्रॉविन्शियल राजनीति और सक्षम स्थानीय नेताओं का भूमिगत हो जाना पीपीपी के लिए मुख्य कारण हैं जिस वजह से पंजाब में अप्रभावी हो गए. इसी तरह परंपरागत जमात-ए-इस्लामी पार्टी के लिए परिस्थिति चिंताजनक है जिसे दयनीय 592 वोट मिले. आंकड़ें बताते हैं कि महज मुट्ठी भर लोग ही जमात की राजनीति का समर्थन कर रहे हैं.

राजनीतिक संघर्ष और भ्रष्टाचार के मामलों के बावजूद द पीएमएल-एन के पास अब भी बड़ी संख्या में पंजाब की घरेलू पिच पर भारी समर्थन है. लेकिन कब तक पार्टी अपने वोट बैंक को बनाए रख सकती है और उसका राजनीतिक उत्ताराधिकार किसे मिलेगा? लेकिन नवाज़ की अनुपस्थिति में कब तक यह आधार वोट बचाए रखा जा सकेगा? ये कुछेक महत्वूपर्ण सवाल बनने जा रहे हैं जो आने वाले महीनों में हमारे दिमाग को झकझोरने वाले हैं.

हाल के नतीजे के बाद पीटीआई और दूसरे विपक्षी पार्टियों ने जल्द ही अगले साल आम चुनाव के लिए तैयारी शुरू कर देगी. नए राजनीतिक गठबंधन चुनाव में फिर से खड़े हो सकते हैं. एक साझा विपक्ष लगता है कि दूर की कौड़ी है. साझा विपक्ष लगता है कि दूर की कौड़ी है खासकर ऐसे समय में जबकि आदर्श और राजनीतिक मतभेदों को मुख्यधारा में जगह नहीं मिल पा रही है.

नवाज़ शरीफ के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद से बाहर होने के बाद साफ तौर से उपचुनाव नतीजे सत्ताधारी पीएमएल-एन के लिए सांत्वना बनकर आए हैं. लेकिन पीटीआई का मजबूत प्रदर्शन और दक्षिणपंथी पार्टियों का उदय पंजाब में पीएमएल-एन और इस तरह 2018 के चुनाव के लिए देशव्यापी नजरिए से गंभीर चुनौती है. अब भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि एनए-20 का नतीजा देशभर में, और खासकर पंजाब प्रॉविन्स में दोहराएगा.

(सरल शर्मा इन्स्टीट्यूट ऑफ पीस एन्ड कॉन्फ्लिक्ट्स स्टडी (IPCS) में अनुसंधानकर्ता हैं.)

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