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क्या नवाज शरीफ ‘भारत के जासूस’ को बचा रहे हैं?

पाकिस्तान का उर्दू मीडिया सरकार को किसी भी दबाव में न आने की नसीहत दे रहा है.

Seema Tanwar Updated On: Mar 06, 2017 08:26 AM IST

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क्या नवाज शरीफ ‘भारत के जासूस’ को बचा रहे हैं?

पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव नाम के जिस व्यक्ति को भारत का जासूस मान कर पकड़ रखा है, अब उसके खिलाफ वहां मुकदमा शुरू होना है. ऐसे में, वहां का उर्दू मीडिया जहां एक तरफ सरकार को किसी भी दबाव के आगे न झुकने की नसीहत दे रहा है, वहीं उसे ‘भारत का भंडाफोड़’ होने की उम्मीद भी है. और सवालों में नवाज शरीफ भी हैं.

यह गिरफ्तारी पिछले साल मार्च में हुई थी, लेकिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज के ताजा बयान से यह मामला फिर गर्मा गया है. पाकिस्तानी सीनेट में उन्होंने कहा कि कुलभूषण को भारत को हरगिज नहीं सौंपा जाएगा और उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा.

जालसाज भारत

रोजनामा ‘असास’ लिखता है कि इस मामले में किसी तरह की सुस्ती न दिखाई जाए और प्राथमिकता के आधार पर कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए. अखबार कहता है कि कुलभूषण के नेटवर्क से जुड़ी जो कामयाबी हासिल हुई हैं उन्हें देश के साथ भी साझा किया जाए.

असास ने भी कई पाकिस्तानी अखबारों की तरह कुलभूषण की गिरफ्तारी को चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर परियोजना के खिलाफ भारत की कथित साजिशों से जोड़ा है. अखबार के मुताबिक ध्यान इस बात का भी रखना होगा कि कि भारत किसी पाकिस्तानी नागरिक को पकड़कर और उसे जासूस साबित करके कुलभूषण की रिहाई के लिए दबाव बनाने की चाल चल सकता है क्योंकि जो देश सर्जिकल स्ट्राइक के झूठे दावे कर सकता है, वह कोई भी जालसाजी कर सकता है.

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भारत होगा बेनकाब?

वैसे इस मामले में सवाल नवाज शरीफ को लेकर भी कम नहीं उठे हैं. ‘जंग’ लिखता है कि कुलभूषण ने माना कि वह भारत का जासूस है, बलूचिस्तान और कराची मे उसके अलगावादियों से संपर्क है और उसकी वीडियो को पूरे देश ने देखा.

लेकिन अखबार आगे लिखता है कि वीडियो सामने आने के महीनों बाद भी न तो कुलभूषण को अदालत में पेश किया गया और न ही प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण में इस बात का जिक्र करना जरूरी समझा. इससे यह शक पैदा होने लगा कि कहीं शरीफ खानदान भारत में अपने कारोबारी हितों को देखते हुए तो कुलभूषण के मामले पर चुप्पी नहीं बरत रहे हैं. जंग के मुताबिक बात बढ़ती देख सरताज अजीज ने दिसंबर में सफाई दी कि सरकार इस बारे में सबूत जुटा रही है क्योंकि अभी तक उसके पास इस बारे में सिर्फ बयान ही बयान हैं. अखबार कहता है कि अगर अदालत में अब कुलभूषण के खिलाफ ठोस सबूत पेश किए जाते हैं तो इस देरी को ‘देर आए दुरस्त आए’ कहा जाएगा और आतंकवाद की सरपरस्त ताकत की हैसियत से दुनिया के सामने भारत का चेहरा बेनकाब होगा.

‘औसाफ’ लिखता है कि भारत की तरफ से कुलभूषण को सौंपे जाने का दबाव हरगिज न माना जाए और ना किसी अन्य वैश्विक ताकत की बात इस बारे में सुनने की कोई जरूरत है. अखबार लिखता है कि जरूरत इस बात की है कि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव और अमेरिकी अधिकारियों को इस बारे में सबूत दिखाकर भरोसे में लिया जाए और प्रभावशाली कूटनीति से काम लिया जाए. अखबार को उम्मीद है कि नवाज शरीफ इस बारे में कोई दमदार नीति अपनाएंगे.

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आतंक के खिलाफ

वहीं रोजनामा ‘दुनिया’ और ‘नवाए वक्त’ ने नवाज शरीफ के इस बयान को तवज्जो दी है कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में रंग, समुदाय या इलाके के आधार पर कोई फर्क नहीं किया जाएगा और जब तक उनका सफाया नहीं होता जाता, ऑपरेशन रद्द उल फसाद जारी रहेगा.

इस बयान की वजह बताते हुए दुनिया लिखता है कि ऑपरेशन जर्बे अज्ब के बाद विदेशों से नहीं बल्कि देश के अंदर भी आवाजें उठने लगी थीं कि बाकी सूबों में फौज और अर्धसैनिक बलों के अभियान चल रहे हैं लेकिन पंजाब में कभी ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई. नवाए वक्त ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के इस बयान का जिक्र भी किया है कि उनकी जान और लहू का एक एक कतरा पाकिस्तान के लिए है. अखबार कहता है कि एक सुरक्षित, शांत और स्थिर पाकिस्तान के मकसद में जो भी रुकावटें आएं उन सब का सफाया करके ही आतंकवाद और चरमपंथ का खात्म किया जा सकता है.

वहीं रोजनामा ‘पाकिस्तान’ लाहौर में पाकिस्तान सुपर लीग का फाइनल मैच होने से बहुत खुश है और अखबार को लगता है कि इससे पाकिस्तान के लिए विश्व क्रिकेट के दरवाजे खुल जाएंगे.

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