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'कुलभूषण जाधव के पासपोर्ट पर आखिर क्यों चुप है भारत?'

पाकिस्तानी मीडिया को देखकर लगता है कि कुलभूषण को फांसी होने से कोई नहीं रोक सकता

Seema Tanwar | Published On: May 16, 2017 09:31 AM IST | Updated On: May 16, 2017 09:31 AM IST

'कुलभूषण जाधव के पासपोर्ट पर आखिर क्यों चुप है भारत?'

द हेग में अंतरराष्ट्रीय अदालत में सुनवाई के बाद पाकिस्तान में भी कुलभूषण जाधव का मामला छाया हुआ है. सभी अखबार और टीवी चैनल बार-बार आपको एक ही तरह की बातें दोहराते सुनाई पड़ते हैं.

कहीं भारत को करारा जबाव दिए जाने की बात हो रही है तो कहीं भारत का भंडाफोड़ होने की बातें लिखी जा ही हैं. कोई अंतरराष्ट्रीय अदालत के अधिकारक्षेत्र पर सवाल उठा रहा है तो कोई हेग की अदालत में जाने के भारत के फैसले पर उसे आइना दिखाने में जुटा है.

अदालत ने भले ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया की आक्रामता को देखकर लगता है कि मानो कुलभूषण को फांसी होने से कोई नहीं रोक सकता.

दाल में काला

दक्षिणपंथी अखबार ‘नवा ए वक्त’ ने अपनी खबर में लिखा है कि पाकिस्तान की तरफ से विदेश मंत्रालय के अधिकारी डॉक्टर फैसल और वकील खावर कुरैशी ने दलीलें पेश कीं और अदालत को बताया कि एक वीडियो में खुद कुलभूषण ने माना है कि वह पाकिस्तान में आतंकवादी साजिश में शामिल रहा है.

अखबार के मुताबिक अदालत में बड़ी स्क्रीन पर कुलभूषण का पासपोर्ट दिखाया गया और पाकिस्तानी पक्ष ने पूछा कि कुलभूषण जाधव के पासपोर्ट पर मुसलमान क्यों लिखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने इस पर चुप्पी साध ली.

‘डॉन’ टीवी चैनल पर पत्रकार नुसरत जावेद भी अपने कार्यक्रम ‘बोल बोल पाकिस्तान’ में कुलभूषण के पासपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान का केस बहुत मजबूत है. उनके मुताबिक, जब आप एक हिंदू होते हुए मुसलमान के नाम से पासपोर्ट हासिल करते हैं तो दाल में कुछ काला है. उनका कहना है कि भारत की मोदी सरकार सिर्फ घरेलू राजनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही अंतरराष्ट्रीय अदालत में गई है ताकि लोगों से कह सके कि हमने तो हर संभावित मंच पर जाकर कोशिश की.

अधिकारक्षेत्र को चुनौती

जंग’ अखबार ने अपनी वेबसाइट पर इस खबर को सुर्खी लगाया है- पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय अदालत के अधिकारक्षेत्र को चुनौती दे दी. अखबार के मुताबिक सुनवाई के दौरान पाकिस्तान ने कहा कि कुलभूषण का मामला कोई आपात मामला नहीं है और वियना कंवेशन के तहत इस पर अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा नहीं चल सकता है.

‘दुनिया न्यूज’ टीवी चैनल के एक कार्यक्रम ‘नुक्ता ए नजर’ में कानूनी मामलों के जानकार बताए जाने वाले बेरिस्टर साद रसूल कहते हैं कि भारत आज अंतरराष्ट्रीय अदालत के जिस अधिकारक्षेत्र और वियना कन्वेंशन का वह हवाला दे रहा है, वह खुद अब से पहले उसे एक बार नहीं बल्कि पांच मानने से इनकार कर चुका है.

इनमें उन्होंने 2000 के एक मामले का जिक्र किया जिसमें उनके मुताबिक भारत ने पाकिस्तानी वायुक्षेत्र में कच्छ के रण में उसी के विमान को मार गिराया था और इसमें कई पाकिस्तानी अफसर मारे गए थे.

उनके मुताबिक पाकिस्तान ने बड़े ही सकारात्मक तरीके से अपनी दलीलें रखीं और अदालत को बताया कि यह मामला सिर्फ जासूसी नहीं है, बल्कि इसके साथ आंतकवाद भी जुड़ा है.

इसी कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार मुजीब रहमान शामी भारत पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हैं. उनका कहना है, 'भारत ने हमेशा यह कहा है कि कुलभूषण जाधव को ईरान से अगवा किया गया था, जहां वह अपना कारोबार कर रहा था. लेकिन ईरान ने कभी इस बात की पुष्टि नहीं की. इससे साफ जाहिर है कि उसे पाकिस्तानी सरजमीन से ही गिरफ्तार किया गया था.'

वह यह भी सवाल पूछते है कि जब भारत कश्मीर समेत हर द्विपक्षीय मुद्दे पर किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्था को सिरे से खारिज करता है तो फिर कुलभूषण के मामले को क्यों अंतरराष्ट्रीय अदालत में लेकर पहुंचा है?

भारत का फंडाफोड़

एक्सप्रेस न्यूज’ चैनल के कार्यक्रम ‘तकरार’ में पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी के नेता अली जैदी कहते हैं कि इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय अदालत में ले जाने से ही साफ हो जाता है कि भारत का भंडाफोड़ हो गया है. उनके शब्दों में, 'भारत पूरी तरह एक्सपोज हो गया है. पहले तो भारत मान ही नहीं रहा था. लेकिन जब सजा हुई तो उसने माना. अब वे वहां चले गए हैं. इससे साफ जाहिर है कि कुलभूषण जाधव भारत में वाकई कोई अहम आदमी है जिसके लिए वहां की सरकार इतने बड़े स्तर पर कोशिश कर रही है.'

लेकिन ‘न्यूज वन’ टीवी चैनल पर विश्लेषक शाहिद मसूद इस बात से खफा दिखे कि पाकिस्तान की सरकार ने इस मुद्दे को सही से राजनयिक मोर्च पर नहीं उठाया. उन्होंने कहा, "भारत अगर ऐसे किसी जासूस को पकड़ लेता तो फिर आप देखते कि पूरी दुनिया में किस तरह हंगामा बरपाता. लेकिन पाकिस्तान ने इस मुद्दे को राजनयिक मोर्च पर उठाया ही नहीं है." इसके अलावा वह प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और भारतीय उद्योगपति सज्जन जिंदल की हालिया मुलाकात पर भी उंगली उठाते हैं.

रोजनामा ‘आज’ ने भी इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय अदालत के अधिकारक्षेत्र को चुनौती देने वाले पाकिस्तानी रुख को प्रमुखता है जबकि कुलभूषण यादव को बुनियादी मानवाधिकार ना दिए जाने की भारत की दलील को ड्रामा बताया है.

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