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कुलभूषण को सजा-ए-मौत: पाक उर्दू मीडिया की खुशी का ठिकाना नहीं

पाकिस्तान के अखबारों ने 'भारत तिलमिला गया' जैसी सुर्खी भी लगाई है

Seema Tanwar | Published On: Apr 11, 2017 08:56 AM IST | Updated On: Apr 11, 2017 09:26 AM IST

कुलभूषण को सजा-ए-मौत: पाक उर्दू मीडिया की खुशी का ठिकाना नहीं

पाकिस्तान में भारत के तथाकथित जासूस कुलभूषण जाधव को मौत की सजा सुनाए जाने की खबर पाकिस्तानी उर्दू मीडिया की सबसे बड़ी खबर है. एक तरफ जहां पाकिस्तान में इस फैसले का चौतरफा स्वागत हो रहा है, वहीं 'भारत तिलमिला गया' जैसी सुर्खी भी कई अखबारों ने लगाई हैं.

सभी पाकिस्तानी अखबारों ने वही कहानी दोहराई है जिसे पाकिस्तान सरकार और मीडिया पिछले एक साल से रट रहे हैं. भारत ने कभी जाधव को अपना जासूस नहीं माना है लेकिन पाकिस्तान बार बार यही कहता रहा है कि जाधव भारतीय नौसेना का एक सेवारत अफसर है और वह पाकिस्तान के खिलाफ विध्वंसक और आतंकवाद की कार्रवाइयों में शामिल रहा है.

जाधव को मार्च 2016 में बलूचिस्तान के इलाके से गिरफ्तार किया गया और पिछले साल एक वीडियो में उसने अपने ऊपर लगे आरोप भी कबूल किए थे.

भारत बेनकाब

रोजनामा 'दुनिया' ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के हवाले से लिखा कि पाकिस्तान को अस्थिर करने वालों से कोई नरमी नहीं बरती जाएगी. जहां उन्होंने सैन्य अदालत की तरफ से जाधव को दी गई मौत की सजा को कानून के मुताबिक बताया है, तो वहीं लगे हाथ यह इल्जाम भी जड़ दिया कि भारत सरकार कुलभूषण की सरपरस्ती कर रही थी.

दुनिया न्यूज की इसी खबर में बलूचिस्तान के गृहमंत्री सरफराज बुगटी ने कुलभूषण को मौत की सजा दिए जाने को पाकिस्तान की जीत बताया है. वहीं ‘जंग’ ने कुलभूषण के साथ साथ सरबजीत सिंह और कश्मीर सिंह की फोटो प्रकाशित करते हुए अपनी खबर को सुर्खी लगाई है- पाकिस्तान में पकड़ा गया कुलभूषण भारत का पहला जासूस नहीं है.

अखबार लिखता है कि भारत पहले भी कई बार बेकनाब हो चुका है और पाकिस्तान के पास ऐसे भारतीय जासूसों की लंबी फहरिस्त हैं जो पाकिस्तान को तोड़ने और देश में फसाद कराने के नापाक मंसूबों के साथ दाखिल हुए. ‘जंग’ के मुताबिक सरबजीत सिंह 1981 में पाकिस्तान में घुसा, कश्मीर सिंह 35 साल पाकिस्तान में रहा और 2008 में वापस भारत पहुंच गया जबकि रवींद्र कौशिक 1975 में पाकिस्तान आया और जासूसी करता रहा.

चौतरफा स्वागत

‘नवा ए वक्त’ ने मुख्य विपक्षी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के मुखिया बिलावल जरदारी भुट्टो के इस बयान को तवज्जो दी है कि वह वैसे तो मौत की सजा के खिलाफ हैं, लेकिन कुलभूषण का मामला अलग है.

‘जसारत’ अखबार ने इस खबर पर पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की प्रतिक्रिया छापी है. अखबार के मुताबिक कुलभूषण को पाकिस्तान की सरजमीन से पकड़ा गया है और उसका मुकदमा फील्ड मार्शल कोर्ट मार्शल में कानून के मुताबिक चला है जबकि कई पाकिस्तानी तो बिना ट्रायल ही भारतीय जेलों में कैद हैं.

मुशर्रफ ने जहां कुलभूषण को मौत की सजा दिए जाने को स्वागतयोग्य फैसला बताया है, वहीं यह भी कहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री पाकिस्तान से बातचीत नहीं करना चाहते.

नवा ए वक्त’ के अनुसार धार्मिक पार्टी जमात ए इस्लामी पाकिस्तान के प्रमुख सीनेटर सिराजुल हक ने भी कुलभूषण को दी गई मौत की सजा का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खेलने वालों और निर्दोष लोगों के कातिलों के साथ सख्ती से निपटने जाने की जरूरत है.

अब्दुल बासित बने हीरो

भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त भी पाकिस्तानी मीडिया में छाए हुए हैं. रोजनामा ‘पाकिस्तान’ की सुर्खी है- कुलभूषण जाधव को मौत की सजा दिए जाने पर भारत का विरोध खारिज, पाकिस्तानी हाई कमिश्नर अब्दुल बासित ने खरी खरी सुना दी.

अखबार के मुताबिक भारतीय विदेश मंत्रालय में तलब किए जाने पर अब्दुल बासित ने कहा है कि पाकिस्तान ने एक आतंकवादी को मौत की सजा देकर कोई गलत काम नहीं किया है.

रोजनामा ‘खबरें’ ने भी लिखा है कि अब्दुल बासित ने भारतीय सरकार साफ साफ से कह दिया है कि एक तो आप दहशतगर्दी करते हैं और ऊपर से बुलाकर विरोध भी जताते हैं. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अपनी सुरक्षा से प्यारा कुछ नहीं है.

वहीं रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ का कहना है कि कुलभूषण की सजा पर भारत की सरकार तिलमिला उठी है. अखबार ने भारतीय मीडिया की रिपोर्टों का हवाला देते हुए लिखा है कि भारत ने अपनी जेलों में सजा पूरी कर चुके पाकिस्तानी कैदियों को रिहा करने से इनकार कर दिया है. अखबार ने इस फैसले को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए भारत की आलोचना की है.

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