S M L

इजरायल में मोदी: भारत का राष्ट्रहित और पीछे छूटता फिलिस्तीन का मुद्दा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा फिलिस्तीन को लेकर भारत के ताजा रुख को रेखांकित करती है

Prabhakar Thakur Updated On: Jul 05, 2017 03:16 PM IST

0
इजरायल में मोदी: भारत का राष्ट्रहित और पीछे छूटता फिलिस्तीन का मुद्दा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यथास्थिति वाली व्यवस्था को तोड़ने के लिए जाने जाते हैं. इसके बहुत से उदाहण हैं. चाहे सार्क देशों के नेताओं को अपने शपथ ग्रहण पर बुलाना हो या रेडियो पर मन की बात प्रोग्राम शुरू करना या ताजा-ताजा जीएसटी की शुरुआत संसद में आधी रात के कार्यक्रम के जरिये करना. मोदी ने इन सभी जगहों पर पुरातन व्यवस्था को तोड़ा.

एक बार फिर मोदी वो करने जा रहे हैं जो आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं किया. भारत की अब तक की इजरायल नीति को बदलते हुए वो इजरायल गए हैं.

यह भारत की वर्षों पुरानी फिलिस्तीन समर्थन नीति के मुताबिक नहीं है. आजादी के बाद से ही भारत फिलिस्तीन राष्ट्र का समर्थक रहा है. 1947 में संयुक्त राष्ट्र में भारत ने फिलिस्तीन के बंटवारे का विरोध किया था. यही नहीं 1974 में भारत फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था और 1988 में 'फिलिस्तीन स्टेट' को मान्यता दी थी.

1992 से ही बढ़ने लगी इजरायल से करीबी

दूसरी ओर 1950 में इजरायल को मान्यता देने के बाद भी भारत ने लंबे समय तक उससे दूरी बना कर रखी. 1992 में नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान भारत ने पहली बार इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए.

ध्यान रहे कि 1991 में शीत युद्ध का अंत हो गया था और USSR टूट चुका था. इसके साथ ही भारत का अमेरिका समर्थित इजरायल के करीब आना स्वाभाविक था. इतना ही नहीं, 1999 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इजरायल ने भारत को तोप के लिए गोला-बारूद सप्लाई किये. modi netanyahu

फिलिस्तीन की कीमत पर इजरायल के साथ भारत की नजदीकी लंबे समय से चली आ रही थी. 1992 के बाद अलग-अलग सरकारों के दौरान भारत इजरायल को लेकर अपना रुख नरम कर चुका था पर खुल कर दिखाने में हिचकिचाता था. 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद भारत ने इजरायल से अपनी करीबी जगजाहिर कर दी है. इजरायल के पीछे सबसे बड़ी ताकत अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी तो सब जानते ही हैं.

स्वायत्त फिलिस्तीन अब प्राथमिकता नहीं

ऐसे में फिलिस्तीनी संघर्ष को भारत का समर्थन किसी कोने में सरका दिया गया है. एक वक्त अरबों को नाराज ना कर देने के चलते इजरायल का समर्थन ना करने वाला भारत आज कुछ ऐसा नहीं करना चाहता जिससे इजरायल नाराज हो जाए. कहने को तो भारत आज भी फिलिस्तीन के 'सेल्फ-डेटरमिनेशन' का समर्थन करता है पर बदले भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत ने अपने हित के मुताबिक साथी चुन लिया है.

2014 में जब इजरायली फौज हमास के मामूली हथियारों के जवाब में गाजा पर अत्याधुनिक बम बरसा रही थी तब भारत ने इस मसले पर इजरायल को सख्त संदेश देने से परहेज किया. इजरायल पर इस युद्ध के दौरान युद्ध-अपराधों के आरोप लगे.

इन अपराधों पर 2015 में UNHRC की रिपोर्ट पर जब संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग हुई तो 41 देशों ने इजरायल के खिलाफ मतदान किया जबकि भारत उन 5 देशों में था जिसने खुद को वोटिंग से अलग रखा था. इजरायली राजदूत ने इसके लिए भारत को धन्यवाद कहा.

इसके साथ ही भारत का संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन को लेकर स्टैंड बदल चुका था. इससे पहले संयुक्त राष्ट्र में आए हर प्रस्ताव पर भारत फिलिस्तीन के पक्ष में खड़ा होता था. इसके बाद 2016 और 2017 में भी भारत ने ऐसा ही किया.

2014 के बाद नेताओं के दौरों का सिलसिला लगातार जारी

यही नहीं, भारत के बड़े-बड़े नेताओं ने एक के बाद एक इजरायल के कई दौरे किये हैं. गृहमंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इजरायल जाकर रिश्ते मजबूत किये.

अब बारी खुद प्रधानमंत्री की है. ऐसे में खास बात ये कि चली आ रही परंपरा को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री फिलिस्तीन नहीं जाएंगे. गौरतलब है कि मई में ही फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने भारत का दौरा किया था.

इजरायल ने इस दौरे से महज तीन महीने पहले अपना अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा किया. भारत ने इजरायल के साथ 2 बिलियन डॉलर के मिसाइल सौदे पर मुहर लगा दी. ध्यान रहे कि इजरायली हथियारों का सबसे बड़ा ग्राहक भारत ही है.

मोदी के दौरे में 'पासिंग कमेंट' से ज्यादा की उम्मीद नहीं

इजरायल  के साथ लगातार मजबूत होते रक्षा संबंधों के साथ तो अब फिलिस्तीन की स्वनिर्धारण का मुद्दा कहीं लुप्त हो चुका है. खुद अरब देश भी ईरान को 'काबू में रखने' और अमेरिका से नजदीकी के चलते फिलिस्तीन मद्दे पर नरम रुख अपना रहे हैं. इसलिए प्रधानमंत्री के इजरायल दौरे के दौरान फिलिस्तीन मुद्दे पर खास जोर देंगे इसकी संभावना कम ही है.

1967 में हुए अरब-इजरायली युद्ध में इजरायल की भारी जीत के पचास साल बीत चुके हैं और आज भारत का इजरायल और फिलिस्तीन को लेकर नजरिया बदल चुका है. भारत को पता है कि दुनिया में ताकत का केंद्र कहां है और दीर्घकालिक विदेश और रक्षा नीति को नए सिरे से ढालने की जरुरत है.

भारत ने उपनिवेशवाद और गुलामी के अपने डरावने अनुभव के चलते फिलिस्तीनी संघर्ष का समर्थन किया था. आज भारत दुनिया में खुद को एक नई पहचान देना चाहता है. इन सबके बीच फिलिस्तीनी संघर्ष का मुद्दा कहीं पीछे छूट गया लगता है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi